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खडूर साहिब उपचुनाव: कइयों की प्रतिष्ठा दांव पर

राजीव खन्ना | Updated on: 23 January 2016, 8:55 IST
QUICK PILL
  • खडूर साहिब उपचुनाव एक ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब अकाली दल अपनी राजनीतिक जमीन को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है.
  • कांग्रेस विधायक रमनजीत सिंह सिक्की ने बीते साल \r\nप्रकाश सिंह बादल की अकाली दल सरकार के विरोध में इस सीट से इस्तीफा दे दिया था.

जब पंजाब की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में एक वर्ष के आस-पास का समय बचा हुआ है तब खडूर साहिब में होने वाले उपचुनाव ने राज्य का राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है.

पिछले कुछ दिनों में घटे राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस सीट पर होने वाला चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव पर गहरा असर डालेगा.

यह सीट कांग्रेस विधायक रमनजीत सिंह सिक्की द्वारा पिछले 18 अक्टूबर को सत्तारूढ़ प्रकाश सिंह बादल की अगुवाई वाली शिरोमणी अकाली दल सरकार के विरोध में खाली कर दी गई थी.

उनका आरोप था कि राज्य में सिक्खों की पवित्र पुस्तकों के अपमान की घटनाओं से निबटने में अकाली सरकार पूरी तरह विफल रही. अकालियों का गढ़ माने जाने वाले इस सीट को सिक्की ने दिग्गज अकाली नेता रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा को हरा कर जीती थी.

अकालियों का गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में सिक्की ने दिग्गज अकाली नेता रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा को हरा कर जीती थी

इसके बाद से सिक्की राज्य में कांग्रेस पार्टी का एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे थे. एक समय पंजाब में आतंकवाद की धुरी के रूप में कुख्यात रहा यह क्षेत्र अब विधानसभा चुनावों का ट्रेलर सरीखा हो चला है. खडूर साहिब सिख इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

यह सिखों के पवित्र शहर अमृतसर और तरनतारन के बीच स्थित एक गांव है. कहा जाता है कि सिखों के दस गुरुओं में से आठ ने इस स्थान का दौरा कर इसे पवित्र किया था.

सिखों के दूसरे गुरु अंगद ने इस स्थान पर 13 वर्ष तक निवास किया और गुरु नानक देव की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया. यह उपचुनाव एक ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब अकाली दल अपनी राजनीतिक जमीन को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है.

बीते कुछ महीनों के दौरान अकालियों पर भ्रष्टाचार, नशीले पदार्थों की तस्करी, शासन करने में अक्षमता, पुलिस की मनमानी जैसे आरोप लगते रहे हैं. जनता ने जगह-जगह इनका विरोध किया है. विरोध प्रदर्शनों के दौरान अकाली नेताओं को काले झण्डे दिखाए जा रहे हैं.

खडूर साहिब सिखों का एक ऐसा महत्वपूर्ण तीर्थ है जहां से अकालियों की हार-जीत का बड़ा संदेश जाएगा. अगर अकाली जीतते हैं तो वे पंजाब की जनता को यह संदेश देन में सफल होंगे कि उनका मूल मतदाता आधार अभी भी उनके साथ है और पंथिक राजनीति अभी भी उनके एजेंडे में है.

खडूर साहिब सिखों का एक ऐसा महत्वपूर्ण तीर्थ है जहां से अकालियों की हार-जीत का बड़ा संदेश जाएगा

चूंकि सिक्की ने राज्य में पवित्र पुस्तकों के अपमान को मुद्दा बनाकर इस्तीफा दिया था और उनका मानना था कि जनता सरकार की कार्रवाइयों से असंतुष्ट है. ऐसे में इस सीट पर अकाली अगर जीतते हैं तो वे जनता को यह संदेश ददेने में सफल होंगे कि राज्य की जनता इन घटनाओं को लेकर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से संतुष्ट हैं.

इस निर्चाचन क्षेत्र के मतदाताओं को अपनी मजबूत सिख पंथिक भावनाओं के लिये जाना जाता है. यहा तक कि कांग्रेस ने भी ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से गुरेज नहीं किया है जिन्हें पंथिक वफादारी और पृष्ठभूमि के लिये जाना जाता है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार रहे हरमिंदर सिंह गिल अखिल भारतीय सिख छात्र संगठन के पूर्व कार्यकर्ता रहे हैं.

आकाली दल ने खडूर साहिब लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा के बेटे रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. राज्य के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने अपने उम्मीदवार के पक्ष में बेहद आक्रामक चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है. उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को यह आदेश दे रखा है कि उनका उम्मीदवार भारी अंतर से चुनाव जीते.

इस जीत के माध्यम से पार्टी राज्य में अपने खिलाफ फैली सत्ता विरोधी लहर को दूर करना चाहती है. दूसरी तरफ कांग्रेस ने अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया.

इस दौरान पार्टी प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह को उन अटकलों पर विराम लगाना होगा जिसके मुताबिक कांग्रेस यह चुनाव नहीं लड़ना चाहती. दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा था कि सिक्की दोबारा चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं.

लेकिन सिक्की ने एक बयान जारी करके बताया है कि अगर पार्टी पार्टी चाहेगी तो वे चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने कहा, ‘‘चूंकि मैं दरबार साहिब की सेवा में लगा हुआ हूं इसलिये मैं इस मुद्दे को लेकर पार्टी अध्यक्ष अमरिंदर से मिलने या बात करने की स्थिति में नहीं हूं.

उनका कहना है कि वे हर साल इन महीनों के दौरान सेवा में व्यस्त रहते हैं ऐसे में वे अपने इस नियमित कार्यक्रम को नहीं छोड़ सकते. उन्होंने कहा, ‘‘प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और आलाकमान जो भी निर्णय लेगी मैं उसका पालन करूंगा.’’

सिक्की को अमरिंदर सिंह के वफादारों में माना जाता है. इस बीच अमरिंदर सिंह के पूर्ववर्ती प्रताप सिंह बाजवा के एक वफादार भूपिंदर सिंह बिट्टू भी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में इस सीट से उपचुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं.

कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर चाहते हैं की पार्टी इस अप्रासंगिक उपचुनाव पर अधिक ध्यान केंद्रित न करे

इस उपचुनाव में कांग्रेस की जीत का सीधा फायदा कुछ ही दिनों पहले पार्टी की कमान संभालने वाले अमरिंदर को मिलेगा. हालांकि खबरें यह भी हैं कि पार्टी के चुनाव रणनीतिकार प्रशाांत किशोर की इस बात में अधिक रुचि नहीं है कि पार्टी इस अप्रासंगिक उपचुनाव पर अधिक ध्यान केंद्रित करे.

उनका मानना है कि इसकी बजाय पार्टी को आने वाले कुछ महीनों के बाद होने वाली बड़ी लड़ाई पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिये. आम आदमी पार्टी (आप) राज्य में तीसरी प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में उभरकर सामने आई है और उन्होंने बीते उपचुनावों की तरह इस चुनाव में भाग न लेने का फैसला किया है.

वे भी अपना सारा ध्यान आने वाले विधानसभा चुनावों के लिये मजबूत नींव तैयार करने में लगाना चाहते हैं. दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद उनकी नजर पंजाब विधानसभा चुनावों में जीत पर टिकी हुई है. आप से अलग हुए भाई बलदीप और सुमैल सिंह संधु इन चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

आप के पूर्व नेताओं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के नेतृत्व वाले संगठन स्वराज अभियान ने इस लड़ाई में भाई बलदीप का समर्थन देने का फैसला किया है.एक वर्ष से भी कम का कार्यकाल होने के बावजूद खडूर साहिब की यह लड़ाई दो राजनतिक धुरंधरों कांग्रेस और शिरोमणी अकाली दल के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है.

First published: 23 January 2016, 8:55 IST
 
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