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#JatReservation खट्टर की राह में लगी आरक्षण की आग

राजीव खन्ना | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • हरियाणा की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में जाति की भूमिका को देखते हुए खट्टर सरकार के लिए इस समस्या से निपटना बेहद मुश्किल होगा. हरियाणा की राजनीति में जाटों की भूमिका बेहद प्रभावशाली है.
  • खट्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती जाटों के अलग-अलग समूहों से निपटने की है. समस्या यह है कि जाट आंदोलन के एक से अधिक नेता हैं और यह समूह राज्य के जाट बहुल इलाकों में फैला हुआ है.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पूरी तरह से परेशानियों के भंवरजाल में फंस चुके हैं. शिक्षा संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर जाट आंदोलन तेज हो चुका है और खट्टर के सामने इससे निकलने का रास्ता नहीं सूझ रहा है. जाट ओबीसी सूची में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं. 

यूपीए सरकार ने जाटों को ओबीसी सूची में डालने का फैसला किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को खारिज कर दिया था. हरियाणा की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में जाति की भूमिका को देखते हुए खट्टर सरकार के लिए इस समस्या से निपटना बेहद मुश्किल होगा. 

इस बीच राज्य के कई जिले हिंसा की चपेट में हैं और खट्टर ने लोगों से शांति व्यवस्था अपनाने की अपील की है. उन्होंने कहा, 'मैं हरियाणा के लोगों से अपील करता हूं कि वह राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के साथ सामाजिक सौहार्द्र को बिगड़ने न दें.' उन्होंने लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील की. 

खट्टर ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से किसी को लाभ नहीं होगा. जाट आंदोलन में अभी तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है.

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शनिवार को रोहतक के मेहम में हिंसा भड़कीं और भीड़ ने पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया. सेना बुला ली गई है और कुछ जवानों को हेलिकॉप्टर से भेजा गया है ताकि वह स्थिति से तुरंत निपट सकें. भिवानी में सेना ने मार्च भी किया है.

जींद और बुढाखेरा में सेना ने लोगों को घरों में रहने का आदेश दिया है. सरकार ने कुछ इलाकों में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया है. आंदोलनकारियों ने कई गाड़ियों को फूंक दिया है. इसके अलावा नारनौल में आंदोलनकारियों ने सेना के 11 ट्रकों का रास्ता रोक दिया है. कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ के घर पर भी पत्थरबाजी की गई है.

हिसार, झज्जर, जींद, कैथल, पानीपत, सोनीपत और गोहाना में हिंसा की खबरें हैं. इन इलाकों में अब कर्फ्यू लगाया जा चुका है. रेल और बस सर्विसेज पर गहरा असर पड़ा है. करीब 100 ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है या उनके  रुट में बदलाव कर दिया गया है. 

राज्य के डीजीपी यशपाल सिंघल ने कहा कि शुक्रवार के बाद से स्थिति में सुधार हुआ है और सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में सेना भेज दी गई है जिसकी मदद से पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है.

सरकार जाट और खाप नेताओं के साथ बातचीत करने की कोशिश कर रही है. सिंघल ने कहा, 'अर्द्धसैनिक बलों की टुकड़ियां पहुंच चुकी हैं जबकि 23 टुकड़ियां जल्द ही राज्य में पहुंचने वाली हैं.'

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खट्टर  के सामने सबसे बड़ी चुनौती जाटों के अलग-अलग समूहों से निपटने की है. समस्या यह है कि जाट आंदोलन के एक से अधिक नेता हैं और यह समूह राज्य के जाट बहुल इलाकों में फैला हुआ है. खट्टर  की समस्या का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बुधवार की बैठक में करीब 126 नेता शामिल हुए. 

पिछली कांग्रेस की सरकार में भूपिंदर सिंह हुडा को ऑल इंडिया जाट आरक्षण संघर्ष समिति के नेता यशपाल मलिक से बात करनी पड़ी थी जबकि खट्टर को न केवल जाटों बल्कि खाप के नेताओं से भी बात करनी पड़ रही है.

खट्टर सरकार हालांकि हिसार जिले में आंदोलन को काबू करने में सफल रही लेकिन वह रोहतक, जींद, भिवानी समेत अन्य इलाकों में स्थिति काबू में नहीं कर सकी. खट्टर के लिए जाट नहीं होने के फायदे और नुकसान दोनों हैं. 

राजनतिक विश्लेषक बलवंत तक्षक ने कैच न्यूज को बताया, 'बीजेपी जाटों के अलावा अन्य समुदाय के समर्थन से सरकार में आई है. अभी तक राज्य में जाट मुख्यमंत्री रहे हैं. ऐसे में अन्य समुदाय को लगा कि उन्हें सरकार में नजरअंदाज किया गया. मुझे लगता है कि बीजेपी राज्य में गैर जाट वोट बैंक में अपना समर्थन मजबूत करेगी.'

खट्टर को जाट आरक्षण के मामले में अपनी पार्टी के भीतर भी विवादों का सामना करना पड़ रहा है

हालांकि खट्टर के लिए जाटों का समर्थन पाना आसान नहीं होगा. हरियाणा में जाटों की आबादी करीब 26 फीसदी है जबकि राज्य के 90 सीटों वाली विधानसभा में करीब 30 विधायक इस समुदाय से आते हैं. 

खट्टर को इस मामले में अपनी पार्टी के भीतर भी विवादों का सामना करना पड़ रहा है. कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी को जाट आरक्षण के खिलाफ बयान देने के मामले में पार्टी को नुकसान हो चुका है और खट्टर सैनी को बयान देने से रोक नहीं पाए.

हालांकि शुक्रवार को उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि सैनी ने अपना बयान वापस ले लिय है लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था. वहीं दूसरी तरफ सरकार के मंत्री कैप्टन अभिमन्यु के सैनी के साथ खड़े होने की वजह से भी नुकसान हुआ. हालांकि अभिमन्यु जाट नेता हैं. विश्लेषकों का कहना है कि सैनी और अभिमन्यु पर समय रहते लगाम लगाकर नुकसान को कम किया जा सकता था.

सत्ता में आने के बाद खट्टर पर विवादित मुद्दों को निपटाने में धीमी गति से बढ़ने का आरोप लगता रहा है

आलोचकों का कहना है कि सरकार हर मसले पर आरएसएस की तरफ देखती है और इस वजह से फैसला लेने में देरी होती है. इतना ही नहीं खट्टर आंदोलन की गति का अंदाज भी नहीं लगा पाए. 

खट्टर आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों से निपटने के मामले में वह जाटों के महत्वपूर्ण नेताओं से बातचीत नहीं कर पाए. इसके अलावा उनके कैबिनेट में शामिल दो जाट मंत्री कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनकड़ का रुख भी सुस्त रहा. इसके अलावा खट्टर को अन्य जाट नेताओं को बातचीत की मेज पर लाना चाहिए था जो वह नहीं कर सके थे. 

खट्टर  के सामने आगे कुंआ पीछे खाई जैसी स्थिति है. अगर वह जाटों को आरक्षण देने के मामले में फैसला लेते हैं तो गैर जाट जातियां नाराज होंगी और बीजेपी को हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में भी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.

वहीं आरक्षण नहीं देने की स्थिति में आंदोलन फैलेगा और इसका नुकसान खट्टर को उठाना होगा. जाट फिर कांग्रेस और इनेलोद के पक्ष में धुव्रीकृत होंगे.

क्या है खट्टर की स्ट्रैटेजी?

खट्टर अगले विधानसभा सत्र में आरक्षण बिल लाए जाने की बात कह चुके हैं. कोई पार्टी इस बिल का विरोध नहीं करेगी. हालांकि यह बिल संसद और कोर्ट में कितना आगे बढ़ पाता है. इसका पता वक्त के साथ ही चल पाएगा. तक्षक ने कहा, 'खट्टर फिर यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने वह सब किया जो उनके हाथ में था.'

First published: 21 February 2016, 12:23 IST
 
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