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'खून की दलाली' से 'इंसाफ का तराजू' तक: कहीं दांव फिर उल्टा ना पड़ जाए

चारू कार्तिकेय | Updated on: 8 October 2016, 7:30 IST
(विकास कुमार/ कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • राहुल का भाषण न केवल निराशाजनक था बल्कि बहुत हद तक मुद्दे से अलग था. दलाली वाला बयान तो वाकई में शर्मिंदा कर देने वाला है.
  • राहुल के भाषण में हलकापन भी था. उन्होंने राज बब्बर की फिल्म \'इंसाफ का तराजू\' का हवाला देते हुए बताया कि कैसे कांग्रेस ने हमेशा \'इंसाफ के तराजू\' का सम्मान किया है, लेकिन भाजपा ने इस तराजू को किनारे कर दिया है.

राहुल गांधी पिछले पूरे महीने हर दिन किसानों की समस्याओं पर बोलते रहे. कृषि और किसानों की समस्या उनके एजेंडा में में टॉप पर रही हैं. अपनी किसान पद यात्रा के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में 3,500 किमी की दूरी तय की. उनका अभियान गुरुवार को नई दिल्ली के पार्लियामेन्ट स्ट्रीट इलाक़े में जाकर खत्म हुआ.

कोई भी य़ह अनुमान लगा सकता है कि राहुल गांधी की मंशा यही थी कि जब वे जनता से मुखातिब हों तो किसान केन्द्र में रहें. मगर उनकी किसान रैली का समापन दूसरी वजहों से सुर्खियों में रहा. उन्होंने अपना भाषण नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाते हुए खत्म किया कि उनकी सरकार सेना के खून के पीछे छिपकर दलाली कर रही है. प्रधानमंत्री मोदी सेना की आड़ में अपनी खामियों को छिपा रहे हैं वग़ैरह-वग़ैरह.

राहुल का यह बयान हैरानीभरा है. इससे संकेत मिलता है कि अपनी पूरी यात्रा में राहुल और कांग्रेस ने यही तय कर लिया था कि किसान रैली ऐसे बयान से खत्म हो ताकि मोदी पर हमला सुनिश्चित हो सके. लगता है उन्होंने यह भी गुणा-भाग लगा लिया होगा कि यह हमला उस मुद्दे पर होना चाहिए जिस मुद्दे से भाजपा काफी उत्साहित है. भाजपा इन दिनों भारतीय सेना के इस दावे से काफी उत्साहित है कि नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राइक काफी सफल रही है.

राहुल गांधी ने साढ़े तीन हजार किमी यात्रा का समापन राजघाट और किसान घाट पर पहुंच कर किया. आयोजकों ने देशभक्ति भरे गीतों का आयोजन भी किया था. देशभक्ति पर आधारित गीत- वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो और वतन पे जो फिदा होगा, अमर वो नौजवान होगा, गाए गए. लेकिन शाम को राहुल के सामने ही खूनी तकरार हो गई. बहरहाल उनकी रैली के समापन से जुड़ी कुछ बातें ग़ौर करने लायक हैं.

1- उत्साहित पार्टी कार्यकर्ता

राहुल ने अपने हुजूम के साथ पूर्वी इलाके से दिल्ली में प्रवेश किया. सड़क के दोनों ओर पार्टी कार्यकर्ता पैदल, बाइक पर और जीप पर सवार होकर अपने नेता का स्वागत करने के लिए मौजूद थे. राहुल एसपीजी की सुरक्षा घेरे में अपनी बस के फुट-बोर्ड पर खड़े होकर हाथ हिलाते हुए कार्यकर्ताओं का अभिवादन स्वीकर कर रहे थे. हर कार्यकर्ता उनसे हाथ मिलाने को आतुर था और जैसे भी बन पड़ता था, धक्का-मुक्की करते हुए उन तक पहुंचना चाहता था. पूरे रास्ते राहुल गांधी जिन्दाबाद के नारे लगते रहे. पर इसी के साथ एक कार्यकर्ता को यह कहते हुए भी सुना गया-पप्पू पास हो गया.

2- मुश्किल से भीड़ जुट पाई

दिल्ली पहुंचने पर राहुल का जो गर्मजोशी से स्वागत हुआ, उसके पीछे केवल कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ही थी. भीड़ में मुश्किल से ही कोई बाहरी रहा होगा. सड़क के दोनों ओर लोग अपनी बालकनी में खड़े होकर नीचे का नजारा देखने में मशगूल थे जहां कार्यकर्ता पार्टी के झंडों के साथ नारे लगा रहे थे. भारी संख्या में पुलिस बल उनके साथ चल रहा था. यह सब देखना किसी के लिए भी रुचिकर हो सकता था.

कार्यकर्ताओं ने ऐसा नजारा बना दिया था कि लगने लगा कि दिल्ली में चुनाव होने जा रहे हैं. लेकिन इस भीड़ में किसी आम आदमी को देखा जाना मुश्किल भरा काम था.

3- जोश नहीं जगा पाए

राहुल गांधी ने अपनी पद यात्रा का जो समापन भाषण दिया, उससे लोगों में किसी उत्साह का संचार नहीं हो सका. वह सिर्फ 10 मिनट ही बोले. 30 दिन और 3,500 किमी लम्बी यात्रा, जो काफी सफल रही थी, के बारे में इतना कम निचोड़ बताना आश्चर्यजनक ही था. उन्होंने कहा कि वह किसानों के बारे में बोलना चाहते हैं लेकिन कांग्रेस महासचिव और उप्र के प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने सुझाया है कि वे रोडशो के जरिए अपने अनुभवों को साझा करें.

राहुल को पता नहीं कैसे यह विचार समझ में आ गया कि किसानों के बारे में बात करना और किसानों के साथ अपनी मुलाकात से हुए अनुभवों को साझा करना दो अलग-अलग चीजें हैं. उन्होंने बताया कि किस तरह से किसान ढेर सारी समस्याओं में घिरे हुए हैं और किस तरह से एक किसान ने उनसे कहा कि वह आत्महत्या करने के बारे में सोच रहा है.

4- कहां किसान रैली और कहां खून की दलाली

राहुल का भाषण न केवल निराशाजनक था बल्कि उनके बहुत हद तक मुद्दे से अलग था. दलाली वाला बयान इसका उदाहरण है जो वाकई में शर्मिंदा कर देने वाला है. उन्होंने कहा, जो हमारे जवान हैं जिन्होंने अपना खून दिया है, जिन्होंने हिन्दुस्तान के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की है, उनके खून के पीछे आप छुपे हुए हो. उनकी आप दलाली कर रहे हो. यह सब कहने का उनका मतलब क्या है?

उन्होंने इसके तुरन्त बाद प्रधानमंत्री को सलाह दे डाली कि अच्छा हो, प्रधानमंत्री सातवें वेतन आयोग में सेना के जवानों का वेतन बढ़ाएं. किसानों के ध्रुवीकरण से शुरू होकर सर्जिकल स्ट्राइक और फिर सातवें वेतन आयोग तक की बात कहना वाकई में चकरा देने वाला ही है.

5- भाषण में हलकापन

राहुल के भाषण में हलकेपन का पुट भी झलक रहा था. अपने भाषण के दौरान राहुल सीधे उप्र कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर की ओर मुखातिब हुए और वहां मौजूद जनसमूह को बताया कि कैसे दोनों ने रोडशो के दैरान बब्बर की लोकप्रिय फिल्म पर बात की थी. यह फिल्म 'इंसाफ का तराजू' थी और वे इसके कितने मुरीद हैं.

उन्होंने कहा कि लोग पूछते हैं कि कांग्रेस ने 70 साल तक क्या किया है. हमने हमेशा 'इंसाफ के तराजू' का सम्मान किया है, पर भाजपा ने इस तराजू को किनारे कर दिया है.  फिल्म के नाम से कांग्रेस शासन की तुलना करना यह उनकी चतुरता थी लेकिन जिस तरीके से उन्होंने यह बयान दिया, वह गम्भीर किस्म का नहीं लगता है. राहुल की यह बात सुनकर मंच पर बैठे बब्बर भी शरमा गए.

राहुल के दलाली वाले बयान की भाजपा के सथ ही अन्य राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई है. कई लोगों ने इस टिप्पणी की तुलना सोनिया गांधी उस बयान से कर दी कि जिसमें उन्होंने 2007 में गुजरात के चुनाव अभियान में मौत का सौदागर वाली बात कही थी. इस टिप्पणी का उल्टा असर हुआ था और भाजपा चुनाव जीत गई थी. इस टिप्पणी का क्या असर होगा, यह आगे देखना दिलचस्प होगा.

राहुल गांधी की महीने भर की पदयात्रा किसानों तक पहुंचने का सार्थक प्रयास था. अभियान का मूल उद्देश्य भी यही था. लेकिन गुरुवार के उनके भाषण से उनकी कोशिशों को नुकसान ही हुआ है, ऐसा कहा जा सकता है.

First published: 8 October 2016, 7:30 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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