Home » इंडिया » Kidnapping As An Industry Is Back Now In Bihar: NCRB
 

एनसीआरबी: बिहार में फिर से अपहरण बनने लगा उद्योग!

अभिषेक पराशर | Updated on: 1 September 2016, 7:55 IST
QUICK PILL
  • बिहार में फिर से अपहरण उद्योग की शक्त लेता जा रहा है. अपहरण की बढ़ती घटनाओं की वजह से बिहार बदनाम रहा है. 2015 में बिहार में अपहरण की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है.
  • 2015 में अकेले बिहार में 8.6 फीसदी (7,128 मामले) अपहरण के मामले सामने आए. अपहरण के मामले में बिहार देश के शीर्ष चार राज्यों में शुमार है. 
  • हिंसक अपराध पर रोक लगाने में बिहार अभी भी विफल रहा है. 2014 में उत्तर प्रदेश (12.6 फीसदी), बिहार (10.4 फीसदी) और महाराष्ट्र (9.8 फीसदी) में सबसे अधिक हिंसक वारदातें हुई थीं. 2015 में भी बिहार के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

बिहार के दरभंगा जिले में रंगदारी नहीं दिए जानेे के मामले में कंस्ट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर की एके-47 से हुई दिन दहाड़े हत्या के बाद गया जिले में सत्ताधारी पार्टी जेडीयू की एमएलसी मनोरमा देवी के बेटे ने युवा आदित्य सचदेवा को इस वजह से गोली मार दी क्योंकि उसने उसकी गाड़ी को साइड नहीं दिया. इसके बाद भी राज्य अपराधोंं पर अंकुश नहीं लग सका.

कुछ ही महीनों के भीतर बेखौफ अपराधियों ने एक हिंदी अखबार के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन को दिन दहाड़े गोलियों से भून दिया. 

2015 का विधानसभा चुनाव 'जंगलराज की वापसी' बनाम 'मंडल की वापसी' के नारे पर लड़ा गया. आखिरकार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बने गठबंधन पर जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का महागठबंधन भारी पड़ा.

2015 में अकेले बिहार में 8.6 फीसदी (7,128 मामले) अपहरण के मामले सामने आए.

नई सरकार के गठन को लेकर कई तरह की आशंकाओं के बीच बिहार में अपराध की बढ़ती घटनाओं को 'जंगलराज की वापसी' से जोड़कर देखा जाने लगा. सरकार ने इसे बिहार को बदनाम करने की विपक्ष की साजिश करार दिया. 

हालांकि विश्लेषकों के बीच बिहार में बढ़ती अपराध की घटनाओं को लेकर कोई आपत्ति नहीं रही. लेकिन उन्होंने जंगलराज जैसी स्थिति को सिरे से खारिज कर दिया.

2015 में सामने आया नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का आंकड़ा भी इस बात की पुष्टि कर रहा कि बिहार में अपराध के मामले बढ़े हैं और कानून व्यवस्था को बनाए रखने की सरकार की कोशिश बुरी तरह पटरी से उतरती नजर आ रही है.

अपहरण के मामले बढ़े

2014 के मुकाबले 2015 में बिहार में अपहरण और उठाइगिरी के मामले में बढ़ोतरी हुई है. अपहरण की बढ़ती घटनाओं की वजह से बिहार बदनाम रहा है और अभी भी यह सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.

पटना में तैनात रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, '90 के दशक में अपहरण और फिरौती की घटनाओं ने जंगलराज की छवि को मजबूत किया.' 2014 में बिहार में अपहरण के कुल 6,570 मामले सामने आए थे जो देश भर में हुए अपहरण के मामलों का 8.5 फीसदी था. 

2015 में अकेले बिहार में 8.6 फीसदी (7,128 मामले) अपहरण के मामले सामने आए. अपहरण के मामले में बिहार देश के शीर्ष चार राज्यों में शुमार है. 

2014 में सबसे अधिक अपहरण के मामले उत्तर प्रदेश में सामने आए थे. उत्तर प्रदेश में 16 फीसदी (14,561), जबकि मध्य प्रदेश में 10.1 फीसदी (7,833) मामले दर्ज हुए. दिल्ली में 9.2 फीसदी अपहरण के मामले दर्ज हुए जबकि 8.5 फीसदी मामलों के साथ बिहार चौथे पायदान पर रहा. 

2015 में मध्य प्रदेश में अपहरण के मामलों में जबरदस्त कमी आई और यह फिसलकर पांचवें पायदान पर चला गया लेकिन बिहार अभी अपहरण के लिए कुख्यात राज्यों में शुमार है.

अधिकारी ने कहा, '2016 में भी बिहार में अपहरण के वारदात में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. ऐसा लगता है कि अपहरण का उद्योग एक बार फिर से बिहार में फलने फूलने लगा है.'

बिहार पुलिस के आंकड़ों से इन दावों की पुष्टि की जा सकती है. मौजूदा वर्ष में पहले छह महीनों के दौरान अपहरण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दिखाई दे रही है. 

बढ़े हिंसक अपराध

हिंसक अपराध पर रोक लगाने में बिहार अभी भी विफल रहा है. 2014 में उत्तर प्रदेश (12.6 फीसदी), बिहार (10.4 फीसदी) और महाराष्ट्र (9.8 फीसदी) में सबसे अधिक हिंसक वारदातें हुई थीं. 

2015 में भी बिहार के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है. उल्टे इस तरह के अपराधों में बढ़ोतरी ही हुई है. एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक पिछले साल बिहार में 10.6 फीसदी हिंसक घटनाएं रिपोर्र्ट की गईं. 

2015 में सबसे अधिक हिंसक वारदातें उत्तर प्रदेश (12.1 फीसदी) और महाराष्ट्र (11.1 फीसदी) में दर्ज की गईं. हालांकि पिछले साल महाराष्ट्र के मुकाबले बिहार में हिंसक वारदातों की घटनाओं में कमी आई है. 

सुरक्षित नहीं दलित

बिहार की राजनीति में दलित और पिछड़े समुदाय से आने वाले मतदाताओं की निर्णायक भूमिका होती है. चुनाव में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न सबसे बड़ा मुद्दा होता है. लेकिन इसके बावजूद बिहार दलितों की सुरक्षा के लिहाज से सबसे बुरे राज्यों में शुमार है.

2014 में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर था. राजस्थान और मध्य प्रदेश दलित उत्पीड़न के मामले में तीसरे और चौथे नंबर पर थे. 

2014 में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर था.

2014 की तरह ही उत्तर प्रदेश में जहां सर्वाधिक दलित उत्पीड़न के 18.6 फीसदी मामले दर्ज हुए वहीं राजस्थान में 15.6 फीसदी दर्ज हुए. बिहार में 2015 में दलित उत्पीड़न के 14.3 फीसदी मामले दर्ज हुए. 2014 में इस तरह के 16.8 फीसदी मामले दर्ज हुए थे. 

2015 में भी बिहार इस सूची में बना हुआ है. हालांकि पिछले साल के मुकाबले इस बार दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामलों में कमी आई है. 

सुरक्षित महिलांए और बच्चें

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़ी पहल के लिए जाने जाते रहे हैं. महिला कार्यकर्ताओं की मांग पर ही उन्होंने शराबबंदी जैसा फैसला लिया. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2015 में बिहार में महिलाओं और बच्चों की असुरक्षा में कमी आई है.

2014 में बिहार में महिला के खिलाफ होने वाले अपराध के कुल 4.6 फीसदी मामले दर्ज हुए जो 2015 में कम होकर 4.2 फीसदी हो गया. 

वहीं बच्चों की सुरक्षा से जुड़े माहौल में सुधार हुआ है. 2014 के मुकाबले 2015 में बिहार में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामलों में गिरावट आई है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में बिहार में बच्चों के खिलाफ 2.5 फीसदी अपराध के मामले दर्ज हुए थे जो 2015 में घटकर 2 फीसदी हो गया. 

First published: 1 September 2016, 7:55 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी