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70,000 किसानों को मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी ?

सुनील रावत | Updated on: 2 October 2018, 12:37 IST

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब और उत्तरी भारत के अन्य हिस्सों के 70,000 से अधिक किसान ट्रैक्टर और ट्रॉली के बड़े दल के साथ दिल्ली बढ़ रहे हैं. किसान 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर राजघाट पहुंचने के लिए तैयार हैं. भारतीय किसान संघ (बीकेयू) से जुड़े किसानों ने 23 सितंबर को हरिद्वार के बाबा टिकैत घाट से 'किसान क्रांति यात्रा' शुरू की. जिसका नाम किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नाम पर रखा गया है.

राजघाट की ओर बढ़ रहे इन किसानों की प्रमुख मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), डीजल और बिजली की कीमतें और किसानों की गन्ने की बकाया राशि का भुगतान हैं. पिछले कुछ महीनों में देश भर में लगातार किसानों के विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिनमे किसानों की मांग स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करना शामिल हैं. इस साल की शुरुआत में अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने किसान मार्च का आयोजन किया.

गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान

गन्ना सीजन समाप्त होने के तीन महीने बाद यूपी में लंबित गन्ना की बकाया राशि 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है. जो कि किसानों को गंभीर परेशानी का कारण रहा है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बढ़ती हुई गन्ना पैदावार और बढ़ती बुवाई से अधिशेष चीनी उत्पादन हुआ है. 2017-18 के कृषि वर्ष में भारत ने 32 मिलियन टन चीनी का उत्पादन किया, जबकि मांग केवल 25 मिलियन टन थी, जिससे चीनी की कीमतों में कमी आयी. चीनी मिलों ने तर्क दिया है कि लंबित बकाया राशि का भगतां करने की उनकी क्षमता नहीं है.

पीएम मोदी ने किया था वादा

2017 के यूपी चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गन्ना किसानों को देरी से भुगतान के मुद्दे को स्वीकार किया था, यह वादा किया था कि अगर बीजेपी चुनाव जीत जाती है तो उन्हें 14 दिनों के भीतर भूटान की मंजूरी दे दी जाएगी. यूपी में गन्ने की देनदार बकाया मिलों द्वारा खरीदी गई कुल गन्ना के मूल्य का 37% था. देश में लंबित बकाया 22,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ज्यादा है.

उत्तर प्रदेश किसान संघटन के सदस्य कुलदीप पंवार का कहना है कि सवाल उठाया कि जब घरेलू उत्पादन अधिक होता है तो सरकार पाकिस्तान से चीनी क्यों आयात कर रही है. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिना किसी देरी के किसानों को उनकी गन्ना फसल के लिए सही दरें मिलें."

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सुधार

सरकार की प्रमुख फसल बीमा योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) 13 जनवरी, 2016 को लांच हुई जिसने दो मौजूदा योजनाओं की जगह ले ली. कहा जाता था कि उनकी कमियों को खत्म करते हुए पिछली योजनाओं की सर्वोत्तम सुविधाओं को शामिल किया गया था. ज्यादातर किसान दावा करते हैं कि फसल बीमा योजना ने किसानों की लागत पर बीमा कंपनियों को काफी हद तक लाभान्वित किया है.

भारत सरकार के 2017 में किए गए एक विश्लेषण के अनुसार आंकड़ों के अनुसार फसल बीमा योजना के तहत बीमा कंपनियों ने 2016 खरीफ सीजन के दौरान किये गए क्लेम में से केवल 17% को लाभ दिया गया. कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार दोनों योजनाओं के तहत 4,270.55 करोड़ रुपये के बीमा दावे थे, जिनमें से मार्च 2017 तक किसानों को केवल 714.14 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया.

 

दस साल के डीजल ट्रैक्टरों पर एनजीटी प्रतिबंध को हटाना

कई किसानों ने राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के उस आदेश को हटाने की मांग की है जिसमे दस साल से अधिक पुराने के निजी और वाणिज्यिक डीजल ट्रैक्टरों को हटाने की बात की गई है. बीकेयू ने सरकार को या तो नए ट्रैक्टर खरीदने या एनजीटी आदेश को स्क्रैप करने की मांग की है.

डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से नुकसान

पिछले कुछ महीनों में डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि ने सरकार द्वारा फसलों बढाई गई एमएसपी के लाभ को समाप्त कर दिया है. डीजल से ट्रैक्टर, कटाई और सिंचाई पंप जैसे विभिन्न कृषि उपकरणों का उपयोग किया जाता है. इसने अधिकांश फसलों के लिए उत्पादन की लागत में वृद्धि की है. ईंधन की कीमतों में वृद्धि ने इस प्रकार किसानों के मार्जिन में काफी कमी आई है.

बिजली की लागत में वृद्धि को कम करना

ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए बिजली शुल्क बढ़ाने के लिए आदित्यनाथ सरकार का निर्णय राज्य में नागरिक निकाय के समापन के बाद किसानों पर मौद्रिक बोझ बढ़ गया है, जबकि ग्रामीण बिजली की आपूर्ति में सुधार में सुधार नहीं हुआ है. किसानों का कहना है कि "हमारे गांवों को केवल चार-पांच घंटे बिजली मिलती है, जबकि बिजली बिल की कीमत 250 रुपये से बढ़कर 1000 रुपये हो गई है. सरकार को या तो बिल कम करना होगा या हमें कम से कम 14 घंटे बिजली देना चाहिए."

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का कार्यान्वयन

किसानों की एक प्रमुख मांग स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना भी है. आयोग की सिफारिशों में एमएसपी को उत्पादन लागत से कम से कम 50% अधिक करने की मांग की मांग है. 2014 के चुनाव घोषणापत्र में बीजेपी ने निर्वाचित होने पर आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था. 2016-17 खरीफ सीजन और उनकी अनुमानित उत्पादन लागत में विभिन्न फसलों के लिए एमएसपी के बीच व्यापक अंतर है.

60 वर्ष से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन

बीकेयू ने 60 वर्ष से अधिक उम्र के किसानों के लिए एक व्यापक वृद्धावस्था पेंशन योजना के कार्यान्वयन की मांग की है. संगठन का कहना है कि एक बार जब किसान बूढ़ा हो जाता है और गांव में खुद के लिए काम करने के लिए काम करने में असमर्थ रहता है, तो उसे आय का एक स्थिर स्रोत चाहिए. ऐसे किसानों के लिए पेंशन योजना होनी चाहिए.

ऋण छूट

प्रत्येक किसान के आंदोलन पर अक्सर मांग की जाने वाली मांग एक बार पूर्ण ऋण छूट है। सभी ऋणी कृषि घरों में से 82% वे हैं जिनके पास दो हेक्टेयर भूमि से कम है. प्रत्येक किसान के आंदोलन में कर्जमाफी की मांग प्रमुख होती है. सभी ऋणी कृषि घरों में से 82% वे हैं जिनके पास दो हेक्टेयर भूमि से कम है. उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के बहुत प्रचारित छूट ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए 1 लाख रुपये तक फसल ऋण छोड़ने का वादा किया है. हालांकि इस योजना के लाभार्थियों से ही पता चला कि उनमें से कई को 1 या 1.50 रुपये की कम राशि की छूट मिली है.

First published: 2 October 2018, 12:22 IST
 
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