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जानिए इंदिरा गांधी ने क्यों लगाई इमरजेंसी

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST
(एजेंसी)

इंदिरा गांधी ने साल 1975 में इमरजेंसी लगाने का जो विवादित फैसला किया, उसके तात्कालिक और सबसे प्रमुख कारण थे कोर्ट के वो दो फैसले, जो इमरजेंसी लगाए जाने के पहले चौदह दिनों के भीतर आए थे.

पहला फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट से आया था, तो दूसरा फैसला सुप्रीम कोर्ट से. दोनों ही फैसले सिंगल जज बेंच के थे और दोनों ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव से संबंधित थे.

हालांकि ये फैसले कोई अचानक नहीं आए थे, इनका संबंध 1971 के लोकसभा चुनाव से था, जिनमें इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबरदस्त कामयाबी दिलाई थी.

हालांकि खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में कोर्ट का दरवाजा खटखटा था.

संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले वाराणसी के राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है.

राजनारायण 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी से 1,11,810 वोटों के अंतर से हारे थे. अपनी जीत को लेकर राजनारायण इतने उत्साहित थे कि नतीजे की घोषणा से पहले ही उन्होंने विजय जुलूस भी निकाल डाला था.

लेकिन परिणाम घोषित हुए तो राजनारायण को हार का सामना करना पड़ा. हालांकि इतनी बड़ी मार्जिन से हारने के बाद भी राजनारायण चुप नहीं बैठे.

उन्होने अदालत से ये गुहार लगाई कि चूंकि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए न सिर्फ सरकारी मशीनरी और संसाधनों का इस्तेमाल किया है, बल्कि वोट खरीदने के लिए पैसे भी बांटे हैं, ऐसे में उनका चुनाव निरस्त कर दिया जाए. राजनारायण की ओर से इस केस की पैरवी जाने-माने वकील और बाद में कानून मंत्री बने शांतिभूषण कर रहे थे.

इस मामले की सुनवाई 15 जुलाई 1971 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शुरू हुई. जस्टिस बीएन लोकुर इस मामले की सुनवाई करने वाले पहले जज थे. लेकिन जस्टिस लोकुर से जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के पास ये केस आते-आते एक बार राजनारायण तो दूसरी बार इंदिरा गांधी ने राहत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया.

आखिरकार मार्च 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज जगमोहन लाल सिन्हा ने मामले में सुनवाई शुरू की.

उनकी कोर्ट में दोनों तरफ से दलीलें पेश होती रहीं. दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनका बयान दर्ज कराने के लिए अदालत में बतौर आरोपी पेश होने का आदेश जारी किया.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अदालत में पेश भी हुईं, लेकिन प्रधानमंत्री होते हुए भी उनके सम्मान में कोई अपनी सीट से नहीं उठा, क्योंकि जस्टिस सिन्हा का स्पष्ट आदेश था कि इंदिरा गांधी बतौर आरोपी पेश हो रही हैं. इसलिए किसी को भी उनके सम्मान में खड़े होने की आवश्यकता नहीं है.

दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस सिन्हा ने 12 जून, 1975 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त करने का आदेश दिया.

हालांकि इस आदेश के साथ जस्टिस सिन्हा ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की मोहलत भी दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी इंदिरा गांधी को पूर्ण राहत नहीं मिली.

उस समय कोर्ट की छुट्टी चल रही थी और अवकाशकालीन जज की भूमिका में जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे तो लगाया, लेकिन वो स्टे केवल आंशिक तौर पर था.

24 जून 1975 के अपने फैसले में जस्टिस अय्यर ने इंदिरा गांधी को बतौर प्रधानमंत्री संसद में आने की इजाजत तो दी, लेकिन बतौर लोकसभा सदस्य वोट करने पर प्रतिबंध लगा दिया.

इस फैसले से इंदिरा गांधी इतना नाराज हुईं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली.

राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर 25-26 जून की दरम्यानी रात भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी.

26 जून को सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल की बैठक के बाद इंदिरा गांधी भारत में आपातकाल की घोषणा करने के लिए ऑल इंडिया रेडियो के स्टूडियो पहुंच गईं. यहां पर इससे पहले हर दिन प्रसारित होने वाले समाचार को प्रसारित करने की तैयारी की जा रही थी.

आकाशवाणी के अधिकारियों से प्रधानमंत्री के संदेश प्रसारित करने का कहा गया. इसके बाद इंदिरा रिकॉर्डिंग रूम में चली गईं.

इंदिरा का रेडियो संदेश

प्रिय देश वासियों,

राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है. इसमें घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे विश्वास है कि आप सब लोग उस गहरे और व्यापक षड्यंत्र के प्रति सचेत हैं, जो तभी से रचा जा रहा था, जब से मैंने भारत के आम आदमी-स्त्री व पुरुष को लाभ पहुंचाने वाले प्रगतिशील कदम उठाए थे.

प्रजातंत्र के नाम पर प्रजातंत्र की भूमिका को ही नकारा जा रहा है. विधिवत निर्वाचित सरकारों को काम नहीं करने दिया जा रहा है और कुछ मामलों में तो विधिवत निर्वाचित विधानसभाओं को भंग कराने के उद्देश्य से सदस्यों को बलपूर्वक त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

विरोध प्रदर्शनों ने वातावरण में उत्तेजना घोल दी है, जिसके परिणामस्वरूप हिंसक घटनाएं हुई हैं. मेरे मंत्रिमंडलीय सहयोगी एलएन मिश्र की नृशंस हत्या से सारा देश स्तब्ध रह गया. भारत के मुख्य न्यायाधीश पर हुए कायराना हमले पर भी हम गहरा दु:ख प्रकट करते हैं.

कुछ लोग तो हमारे सैन्य बलों और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने की हद तक जा पहुंचे हैं. यह तथ्य कि हमारे सुरक्षा बल एवं पुलिस अनुशासित और पक्के देशभक्त हैं, इसलिए उनकी बातों में नहीं आते, उनकी इस उत्तेजक कार्रवाई की गंभीरता को कम नहीं करता. हमारी एकता को खतरे में डालने के लिए विखंडनकारी तत्व अपनी पूरी शक्ति से काम कर रहे हैं और सांप्रदायिक उन्माद भड़का रहे हैं.

एक लंबे समय से हमने बड़े धैर्य से इन घटनाओं का अवलोकन किया है. अब हमें सामान्य कामकाज ठप कर देने के उद्देश्य से सारे देश में कानून और व्यवस्था को चुनौती देनेवाले एक नए कार्यक्रम का पता चला है. कोई भी प्रभावी सरकार देश की स्थिरता को खतरे में डालने वाली कार्रवाईयों को चुपचाप खड़े नहीं देख सकती.

कुछ लोगों के विध्वंसक कार्य बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं. ऐसी कोई भी स्थिति, जो राष्ट्रीय सरकार की देश के भीतर निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता को कमजोर करती है, निश्चित रूप से बाहरी खतरों को बढ़ाने का काम करती है. अपनी एकता और स्थिरता की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है. राष्ट्र की अखंडता ठोस कार्रवाई की मांग करती है.

आंतरिक स्थिरता को खतरा उत्पादन और आर्थिक विकास की संभावनाओं को भी प्रभावित करता है. हमारी दृढ़ निश्चयी कार्रवाईयों के कारण पिछले कुछ महीनों में हमें मूल्य-वृद्धि को नियंत्रित रखने में काफी सफलता मिली है.

अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा विभिन्न वर्गो - विशेष रूप से गरीब, असुरक्षित एवं निम्न आय वाले लोगों की कठिनाइयां कम करनेवाले उपायों पर हम सक्रियता से विचार कर रहे हैं. मैं उनकी घोषणा शीघ्र ही करूंगी.

मैं आपको यह आश्वासन देना चाहूंगी कि आपातकाल की यह नई घोषणा कानून का पालन करनेवाले नागरिकों को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगी. मुझे विश्वास है कि आंतरिक स्थितियां तेजी से सुधरेंगी तथा जितनी जल्दी हो सके, हम इस घोषणा को वापस ले सकें.

भारत के सभी भागों से और सभी वर्गो के लोगों से मिले शुभकामना संदेशों से मैं अभिभूत हूं. क्या आनेवाले दिनों में आपके सतत सहयोग और विश्वास के लिए मैं आपसे अनुरोध कर सकती हूं?

First published: 19 November 2016, 3:00 IST
 
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