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कौन है बिश्नोई समाज, जो सलमान पर आफत बनके टूटा है

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 April 2018, 16:54 IST

सलमान खान को 20 साल पुराने केस में सजा दिलवाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ बिश्नोई समाज का माना जा रहा है. बिश्नोई समुदाय ने जंगल से लेकर अदालत तक की लड़ाई लड़ी है. ऐसा माना जाता है कि बिश्नोई समुदाय में काला हिरन को लेकर भावनात्मक तथ्य जुड़े हुए हैं. बिश्नोई समुदाय काला हिरन को अपने परिवार के सदस्यों की तरह मानते हैं.

बिश्नोई समुदाय मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में रहने वाले वाले बिश्नोई समुदाय की नींव, माना जाता है कि गुरू जाम्बेश्वर ने 1485 में डाली थी और उनके लिए 29 सिद्धांत तय किए थे. बिश्नोई समाज उन्ही 29 सिद्धांतों का पालन करता है. 51 सालों तक उन्होंने अपने उपदेशों से इस समुदाय को शिक्षित किया.

इनके उपदेशों को शबदवाणी कहा जाता है और इसमें 120 शबद हैं. बिश्नोई समुदाय के कई लोग खुद को विश्नोई भी बताते हैं और भगवान विष्णु को मानने वाला कहते हैं. वैसे बिश्नोई का एक मतलब राजस्थान में 29 भी होता है.

क्या हैं 29 सिद्धांत

जिन 29 सिद्धांतों का पालन करना बिश्नोई समुदाय के लिए जरूरी बताया गया है उसमें 10 तो साफ सफाई और बुनियादी स्वास्थ्य से जुड़े हैं, सात स्वस्थ सामाजिक व्यवहार से जुड़े हैं जबकि 4 सिद्धांत ईश्वर की उपासना के बारे में हैं. इनके अलावा 8 सिद्धांत जैव विविधता को बचाए रखने के बारे में है. यही चीज इन्हें बाकी समुदायों से अलग करती है. बिश्नोई समुदाय को प्रकृति के लिए काफी संवेदनशील माना जाता है. जीव जंतुओं और पर्यावरण के बेहतर रख रखाव के लिए प्रयास करता रहा है.

ये लोग इस मामले में इतने सजग हैं कि खाना बनाने के लिए जब लकड़ी जलाते हैं तो पहले यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि कहीं इसमें कोई कीड़ा या सूक्ष्म जीव तो गलती से नहीं आ गया. इतना ही नहीं इस समुदाय के लोगों के लिए नीले रंग का कपड़ा पहनने की मनाही है क्योंकि नीला रंग तैयार करने के लिए बहुत सी झाड़ियों को काटना पड़ता है.

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मुख्य रूप से रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले बिश्नोई समुदाय में जब किसी की शादी होती है तो उस जोड़े को बंजर भूमि पर कुआं खोदना पड़ता है. इसके साथ ही उस जमीन पर बाजरे की खेती कर उसे हरा भरा बनाने की कोशिश करनी पड़ती है.

खेजारली नरसंहार: पर्यावरण के लिए जान तक दे सकता है ये समुदाय

इतिहास में कई ऐसी कहानियां हैं जिनमें समुदाय के लोग जीवों और पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटे. इनमें एक बहुत प्रचलित कहानी है खेजारली नरसंहार की. स्थानीय लोग बताते हैं कि जोधपुर के राजा अभय सिंह को नया राजमहल बनाने के लिए लकड़ी की जरूरत थी.

उन्होंने सैनिकों को खेजारली में पेड़ काटने के लिए भेजा लेकिन गांव के लोग पेड़ों चिपक कर खड़े हो गये और पेड़ काटने का विरोध करने लगे. सैनिकों ने पेड़ काटने के लिए सैकड़ों लोगों को मार दिया. जब राजा अभय सिंह को खबर मिली तो उन्होंने उसे रुकवाया लेकिन तब तक 363 लोगों की जान जा चुकी थी.

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इन लोगों की खेजारली में ही समाधि बनी और वहां एक मंदिर भी बनाया गया. हर साल बिश्नोई समुदाय के लोग इस मंदिर में जमा हो कर अपने पूर्वजों और आस्था के प्रति सम्मान जताते हैं. बिश्नोई समुदाय के लोग पर्यावरण और प्रकृति के लिए इतने जुझारू हैं की 20 सालों तक ये हाई प्रोफाइल केस को इन्साफ के लिए लड़ते रहे.

First published: 7 April 2018, 14:35 IST
 
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