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मदर के साथ ही कोलकाता शहर भी संत हो गया

बिनो के जॉन | Updated on: 7 September 2016, 8:15 IST

मदर टेरेज़ा जिंदगी भर कोलकाता के गरीबों और पीड़ितों की सेवा करती रही. अब उन्हें ‘सेंट टेरेसा ऑफ कोलकाता’ के नाम से जाना जाएगा. उनका अविस्मरणीय कार्य दुनिया की कल्पना से परे है. उनके लिए इसका मूल्य समझ पाना मुश्किल जो निःस्वार्थ भाव सेवा का मतलब नहीं समझते. अब यह बीते समय की बात हो गई है कि मदर का त्याग बेकार नहीं जाएगा, अब वे आम इंसान नहीं रहीं, जिसकी मृत्यु हो चुकी है.

वेटिकन सिटी के बर्निन में रविवार चार सितम्बर को मदर को पोप फ्रांसिस ने संत की उपाधि दी. समारोह स्थल पर 284 स्तम्भ, 162 मूर्तियों सहित 88 प्लास्टर लगे थे, लग रहा था जैसे वे साक्षात ईश्वर का रूप हों. संत की उपाधि मिलने के साथ ही पार्क सर्कस कोलकाता की नन रहीं टेरेसा अब उन कैथलिक संतों में शामिल हो गईं हैं, जिनका दर्जा ईश्वर के समकक्ष माना गया है और लाखों लोग उनसे अब किसी चमत्कार की उम्मीद लिए प्रार्थना करेंगे.

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दुनिया भर में कोने-कोने में मदर टेरेसा की मूर्ति लगेगी और इनकी पूजा की जाएगी. उनके सम्मान में उनके चरणों में मोमबत्तियां प्रज्वलित की जाएंगी. सेंट टेरेसा ऑफ कोलकाता इसी नाम की दूसरी संत होगी. इससे पहले एक संत ‘सेंट टेरेस ऑफ लिसियक्स भी हुई हैं. संयोग से मदर टेरेसा का नाम उनसे ही प्रेरित है. मदर टेरेसा को उनकी मृत्यु के 20 साल बाद संत की उपाधि मिली, जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है. लोग मदर टेरेसा को यह सम्मान दिलाने के लिए काफी पहले से कोशिश कर रहे थे.

2003 में जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें ‘ब्लेस्ड टेरेसा ऑफ कलकत्ता’की उपाधि दी थी और अब उन्हें संत बना दिया गया है. यह जल्दबाजी दरअसल कैथलिक चर्च की ओर से की गई, जो कि नई पीढ़ी को देखते हुए अपने रूढ़िवादी खोल से बाहर निकल रहा है. कहना चाहिए कि विकसित विश्व में धर्म से दूर हो रहा है. ब्रिटेन में हाल ही में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि आधे लोग नास्तिक हैं. यही स्थिति दूसरे यूरोपीय देशों की भी है, जैसे अमेरिका और छोटे यूरापीय देशों की, जहां युवाओं को विज्ञान एवं तकनीकी लुभा रही है और उन्हें विश्वास है कि ईश्वर उनके साथ है.

भारी जिम्मेदारी

मरणोपरांत मदर टेरेसा पर भारी जिम्मेदार डाल दी गई है, यह उससे ज्यादा कठिन है, जो कार्य उन्होंने जीवित रहते किया. उनके लिए तो जीव मात्र की सेवा करना ही सब कुछ था. उन्होंने सितम्बर 1946 में सिस्टर लॉरेटो का कैथेलिक पंथ छोड़ दिया था, क्योंकि जब एक बार वे ट्रेन से दार्जिलिंग जा रही थी तो उन्हें जीसस से दूसरी बार ऐसा निर्देश मिला कि वे गरीब बेसहारा लोगों की सहायता करें.

जब उन्होंने स्वयं को लॉरेटो पंथ से अलग किया तब इसे बड़ी बगावत माना गया. इससे चर्च की मूलभूत अवधारणा पर भी सवालिया निशान लग गया. चर्च के बाहर इसी के परिसर में गरीब बेसहारा लोगों की सहायता व देखभाल के उद्देश्य से मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की गई. कलकत्ता के चर्च ने इसे बहुत अधिक महत्व नहीं दिया था.

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यहां सवाल उठता है कि मदर टेरेसा को लॉरेटो सिस्टर रहते हुए गरीबों की सेवा की अनुमति क्यों नहीं दी गई. हालांकि बाद में उनके कार्य से प्रभावित होकर जब पोप पॉल-षष्टम ने उनकी सराहना की तब कोलकाता चर्च ने 1965 सबसे पहले इसे स्वीकृत किया.

अब पोप फ्रांसिस इस प्रकार मदर की सराहना कर रहे हैं. 1997 में उनकी मृत्यु होने तक दुनिया भर में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की 4,000 इकाईयां थीं और ये ईकाइयां अपने आप में एक चर्च ही थीं.

काफी भव्य था आयोजन

मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के लिए भव्य आयोजन कर कैथेलिक चर्च ने अपना ही रुतबा बढ़ाया है. मदर टेरेसा जिंदगी भर चर्च और यहां तक कि ईसाई पंथ से भी एक निश्चित दूरी बना कर ही रहीं. मदर टेरेसा साफ तौर पर अपने नाम पर किसी तरह श्रेय नहीं लेना चाहती थीं, क्योंकि उनके लिए सेवा ही सब कुछ था और पीड़ित बेसहारा लोग उनके भगवान.

वे अक्सर कहा करतीं कि वे जीसस को मानती है; परन्तु उन्होंने मदर को सेवा का रास्ता दिखाया और 70 के दशक तक मदर टेरेसा तत्कालीन पोप से ज्यादा लोकप्रिय हो गईं थी.

गहराता असंतोष

70 और 80 के दशक में कैथेलिक चर्च को बहुत बुरे दौर से गुजरना पड़ रहा था क्योंकि दुनिया भर के युवा पादरियों ने विद्रोह कर दिया था और चर्च ने गरीबों को लगभग भुला ही दिया था. ऐसे में मदर टेरेसा ने अपनी अलग राह चुनी और कभी इस विचार से नहीं डिगी कि सबसे महत्वपूर्ण गरीब और बेसहारों की सेवा है, चर्च और पंथ इंतजार कर सकते हैं लेकिन सेवा नहीं.

अब पोप फ्रांसिस चर्च में फिर से सुधार की उम्मीद जगा रहे हैं. वे अक्सर गरीबी और सामाजिक न्याय की बात करते हैं. हाल ही में उन्होंने बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने के लिए पादरियों और बिशप की आलोचना की थी. इसलिए उनके द्वारा मदर टेरेसा को संत की उपाधि दिया जाना भी संभवतः एक प्रयास हो चर्चों का फोकस फिर से सामाजिक न्याय पर केंद्रित करने का है.

कोलकाता, गरीब और मदर टेरेसा

एक बात और, संत टेरेसा ऑफ कोलकाता के नाम और उनकी छवि से केवल कोलकाता की गरीब की छवि ही फिर से उभर कर आएगी. भारत और इसकी अर्थव्यवस्था और आधुनिकता के साथ इस दाग को धोने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है. अब यहां के हालात वैसे नहीं हैं, जैसे कि मदर टेरेसा की उस तस्वीर में दिखाई देते हैं, जिसमें वह गोद में एक मरणासन्न भिखारी बच्चे को लिए हुए है. मदर टेरेसा की यह तस्वीर विश्व भर में उनकी पहचान बन चुकी है.

भले ही देश का एक बड़ा वर्ग वेटिकन के इस समारोह के पक्ष में हो; लेकिन दुनिया की नजरों में भारत फिर से गरीब कहलाने की ओर अग्रसर हो रहा है- एक ऐसा देश जहां चमत्कारों की जरूरत है. बड़े पैमाने पर गरीबी के चलते कोलकाता को पहले एक वैश्विक मदर मिली, फिर एक नाबेल पुरस्कार और अब एक संत जिसकी गिनती ईश्वर के समकक्ष की जा रही है.

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कोलकाता और बंगाल ने भारत को इसका पहला नोबेल पुरस्कार भी दिया है. परन्तु वह साहित्य के क्षेत्र में था. यह नोबेल कल्पना और रचना के लिए नहीं था बल्कि सेवा के लिए था, और अब कोलकाता एक और बोझ तले दब गया है, वह है संत की नगरी होने का बोझ. केरल में भी, जहां मार्क्सवादियों ने गरीबों की किस्मत बदलने का वादा किया है, दो पादरियों को पहले ही संत की उपाधि मिल चुकी है और तीसरी अपनी बारी का इंतजार कर रही है.

यहां भी चमत्कारों का धंधा खूब फल-फूल रहा है. वेटिकन ने केरल के गरीबों को भी अपना लिया है. कोलकाता के नाम बहुत सी उपलब्धियां हैं. इसके भविष्यवक्ताओं ने इसका भविष्य संवारा है. यहां कई महान् लेखक और फिल्मकार हुए हैं, जिन्होंने कई पुरस्कार विजेता फिल्में बनाई हैं. उसी कोलकाता में एक नन रहीं, उन्होंने सेवा की और गरीबों के प्रति लोगों का नजरिया बदल दिया.

उनके कमजोर झुके हुए कंधों पर अब एक और जिम्मेदारी डाल दी गई है- चमत्कार करने की.

First published: 7 September 2016, 8:15 IST
 
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