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दयाशंकर सिंह की पत्नी के बहाने क्षत्रिय स्वाभिमान की राजनीति

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

दयाशंकर सिंह के मायावती के बारे में विवादित बयान के बाद पार्टी से उनको बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. लेकिन अगड़ों की राजनीति का नया पैतरा यह है कि भाजपा अब उनकी पत्नी स्वाति सिंह को तुरुप के तौर पर इस्तेमाल करने जा रही है. स्वाति सिंह जहां एक ओर मायावती के खिलाफ मोर्चा खोल रहीं हैं वहीं दूसरी ओर क्षत्रिय प्रतिष्ठा का प्रश्न खड़ा करके जाति को बांधने का काम भी कर रही हैं.

स्वाति सिंह ने खुद को सामने रखकर महिला के सवाल को महिला के जवाब से निपटने की रणनीति अपनाई है. मायावती के बहाने दलित प्रतिष्ठा का जो सवाल दलितों के बीच उठा है, उसी कांटे से वो अपनी जाति को बांधने का काम कर रही हैं. स्वाति ने खुद को, अपनी 12 साल की बेटी और सास को मिल रही मानसिक प्रताड़ना का हवाला दिया है. यह दलित पहचान के बदले क्षत्रिय स्वाभिमान की लड़ाई बन गया है.

इस संभावना को भारतीय जनता पार्टी अच्छे से पहचान रही है. अगड़ों का वोट भाजपा की ताकत है. वो इसे कमज़ोर पड़ने नहीं देना चाहती. बल्कि ऐसे समय में, जबकि राजा भैय्या और रेवती रमण सिंह समाजवादी पार्टी का क्षत्रिय चेहरा हैं, भाजपा क्षत्रिय स्वाभिमान के सवाल को भुनाकर अपने जनाधार को और मजबूत करना चाहती है. स्वाति सिंह इस जातीय गणित का नया मोहरा हैं.

मायावती को रक्षात्मक कर देने वाली स्वाति सिंह हैं एमबीए, एलएलबी और एलएलएम

भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में स्वाति सिंह को चुनाव में उतार सकती है. स्वाति विक्टिमकार्ड हैं. वो केवल अपनी ही सीट पर नहीं बल्कि आसपास की सीटों पर भी भाजपा के लिए प्रचार कर सकती हैं. यह भी संभावना है कि स्वाति सिंह पार्टी के टिकट की बजाय निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतारी जाएं ताकि पार्टी के विरोध में खड़े लोग भी उनके साथ खड़े हो सकें.

स्वाति काफी पढ़ी लिखी हैं और तेज़ तर्रार भी. अपनी और बेटी की मानसिक प्रताड़ना का सवाल उनको भाजपा की लक्ष्मीबाई बना देगा. युवाओं के बीच वो खासी पसंद की जाएंगी और बाकी पार्टियों की ओर जा रहे क्षत्रिय भी उनका विरोध करने से बचेंगे, बल्कि उनका समर्थन करेंगे.

इसके पीछे का एक कारण और है. उत्तर प्रदेश में राजा भैय्या के बड़े नेता बनने में उनके खिलाफ हुई प्रशासनिक कार्रवाई की बड़ी भूमिका रही. राजा भैय्या के घर पर छापे पड़े थे. संपत्ति को नुकसान पहुंचा था. बाद में उनकी पत्नी चुनाव लड़ी थीं. इससे यह हुआ कि राजा भैय्या के प्रति एक सहानुभूति और स्वीकृति पूरे सूबे में बनी. राजा भैय्या इससे एक बड़े क्षत्रिय नेता बन गए. भाजपा इसी क्षत्रिय प्रतिष्ठा का खेल दयाशंकर सिंह के मामले में खेलना चाहती है.

अमित शाह की भूल

इसमें कोई संशय नहीं कि दयाशंकर सिंह का बयान भाजपा के लिए काफी महंगा साबित हुआ है. जिस सोशल इंजीनियरिंग में संघ और भाजपा पिछले कुछ महीनों से लगे थे उसे इस एक बयान ने झकझोर दिया है. एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, “जो पूरा काम मोदी उत्तर प्रदेश के दलितों और पिछड़ों को लुभाने के लिए पिछले दो वर्षों के दौरान किया है, उसे इस एक घटना ने फिर से पीछे पहुंचा दिया है."

संकट यह है कि इस वक्त मोदी इस एक भूल के लिए किसी और को दोषी भी नहीं ठहरा सकते. अन्यथा इसका ठीकरा किसी और वरिष्ठ के सिर फोड़कर मोदी पापमुक्ति का प्रयास कर सकते थे. दयाशंकर सिंह खुद अमित शाह की पसंद थे. उन्हें पार्टी उपाध्यक्ष बनाकर अमित शाह ने राजनाथ सिंह के एकछत्र राज को संतुलित करने का प्रयास किया था.

राजनीति की बिसात पर जिस दयाशंकर सिंह को कभी राजनाथ सिंह ने चलना सिखाया था, वही दयाशंकर सिंह राजनाथ के विरोधी हो गए. 2012 में वो राजनाथ से रूठ गए. इससे पहले और बाद वो उत्तर प्रदेश में भाजपा के बाकी नेताओं के साथ भी जुड़े और अलग होते रहे.

उत्तर प्रदेश: दयाशंकर पर फिसली भाजपा को स्वाति का सहारा

इधर कुछ खबरें ऐसी भी चलाई गईं कि दयाशंकर सिंह की वापसी के लिए पार्टी पर दबाव बढ़ रहा है लेकिन पार्टी के वरिष्ठों की मानें तो यह केवल कपोल कल्पना है और पार्टी फिलहाल यह भूल नहीं करेगी कि वो एक विवादित चेहरे को वापस लेकर आए. बजाय इसके, पार्टी उनके खिलाफ कार्रवाई की बात को दलितों, पिछड़ों के बीच दोहराएगी और वहां अपने जनाधार को अर्जित करने की कोशिश करेगी.

दूसरी ओर अगड़ों के बीच दयाशंकर सिंह की पत्नी के ज़रिए अपनी पैठ को पार्टी और मजबूत करेगी. दयाशंकर सिंह पार्टी की एक भूल थे लेकिन इस भूल से हुए नुकसान में थोड़ा बहुत फायदा जो पार्टी उठा सकती है, उसे पार्टी जाने नहीं देना चाहती.

First published: 27 July 2016, 7:28 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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