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दलितों पर भाजपा और अगड़ों पर बसपा के डोरे

अतुल चंद्रा | Updated on: 25 May 2016, 22:48 IST
(कैच न्यूज)

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हाल ही में सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान उज्जैन की शिप्रा नदी में पवित्र डुबकी लगाई. यह कार्यक्रम उन्होंने दलित संतों के एक समूह के साथ किया.

उसी समय, उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की रसड़ा सीट से बसपा विधायक उमा शंकर सिंह भी तीर्थयात्रियों से भरी एक ट्रेन के साथ उज्जैन में मौजूद थे. उनके साथ आए करीब 7,000 तीर्थयात्रियों में से ज्यादातर ऊंची जाति के तीर्थयात्री थे. हालांकि सिंह ने स्पष्ट किया कि उनके दल में दलितों और पिछड़ी जातियों के सदस्य भी शामिल हैं.

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स्पष्ट है कि यह सब उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए जंग की तैयारी है. दलित संतों के साथ अमित शाह का स्नान करना तो मायावती के कोर मतदाताओं के साथ-साथ अन्य पिछड़ी जातियों को आकृष्ट करने के लिए बड़ी रणनीति का मात्र एक छोटा सा हिस्सा था. वहीं, दूसरी ओर, बसपा इस कदम का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों का दिल जीतने का प्रयास कर रही है.

दलितों को लुभाने के लिए महत्वपूर्ण कदम

दलितों को लुभाने की रणनीति के एक और महत्वपूर्ण कदम के रूप में शाह द्वारा 4 जून को लखनऊ में अनुसूचित जातियों पर एक सम्मेलन में भाग लेने की उम्मीद है.

भाजपा प्रवक्ता विजय पाठक इस घटनाक्रम को समझाते हुए कहते हैं कि उनकी पार्टी दलितों का दिल जीतने के लिए कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा, "2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती राज्य से एक भी सीट नहीं जीत पाईं. जब दलितों ने पार्टी में विश्वास जताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वोट दिया है तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरें."

अमित शाह द्वारा 4 जून को लखनऊ में अनुसूचित जातियों पर एक सम्मेलन में भाग लेने की उम्मीद है

पाठक ने कहा कि कुंभ में दलित संतों के साथ स्नान के शाह के निर्णय से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों के लिए नोएडा में 5 अप्रैल 2016 को स्टैंड अप इंडिया योजना की शुरुआत कर चुके हैं. इस योजना का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और महिलाओं को नए उद्यम शुरू करने के लिए 10 लाख रुपए से लेकर एक करोड़ रुपए तक के ऋण देकर उनके बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देना है.

प्रधानमंत्री ने यहां गरीबों को ई-रिक्शा भी वितरित किए थे. जिस दिन प्रधानमंत्री ने यह योजना शुरू की, उस दिन वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बाबू जगजीवन राम की जयंती थी. मोदी ने जब मंच से इस पूर्व केंद्रीय कृषि और रक्षामंत्री की प्रशंसा की तो घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया.

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इससे पहले, मार्च में भाजपा ने घोषणा की थी कि बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के सम्मान में पांच स्थानों का विकास पंचतीर्थ के रूप में किया जाएगा. पंचतीर्थ में महू में स्थित अम्बेडकर का जन्म स्थान, लंदन में वह जगह जहां वे छात्र जीवन के दौरान रहे थे, नागपुर में दीक्षा भूमि (जहां उन्होंने शिक्षा हासिल की थी), दिल्ली में महापाणिनिर्वाण स्थल और मुंबई में चैत्य भूमि शामिल हैं.

ब्राह्मणों को दरकिनार किया जा रहा है?

जब पूरा ध्यान दलिताें और अन्य पिछड़ा वर्ग पर दिया जा रहा है तो लगता है कि जनसंख्या की लगभग 6% आबादी ब्राह्मणों को कहीं पीछे धकेल दिया गया है.

कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य ने स्वीकार किया कि वे हाशिए पर महसूस कर रहे हैं. परंतु प्रवक्ता ने कहा कि यह धारणा गलत है. उन्होंने उस समय से तुलना भी की जब बसपा के ब्राह्मण चेहरे सतीश मिश्रा ने अपने रिश्तेदारों को उतनी लाल बत्ती बांट दीं, जितनी संभवतः वे बांट सकते थे.

अपनी पहचान उजागर न करने की शर्त पर एक वरिष्ठ प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य ने कहा कि भरोसेमंद विकल्प न होने के कारण ब्राह्मण पार्टी का साथ छोड़ने की स्थिति में नहीं है, परन्तु वे वर्तमान परिदृश्य से खफा और आक्रोशित महसूस कर रहे हैं.

मुस्लिम अविश्वास

ऊपर उल्लेखित बसपा विधायक उमाशंकर सिंह तीर्थयात्रियों के एक समूह को अजमेर शरीफ भी ले गए थे. उमाशंकर ने कहा कि भाजपा के विपरीत, मायावती दलितों और ब्राह्मणों की ओर समान रूप से हाथ बढ़ा रही हैं. उन्होंने इस बात के उदाहरण के रूप में राज्यसभा सदस्य के लिए बसपा की ओर नामांकन का हवाला दिया.

उन्होंने कहा कि बसपा ने ब्राह्मण सतीश मिश्रा और दलित अशोक सिद्धार्थ को एक साथ राज्यसभा के लिए नामांकित किया है. उमाशंकर ने कहा कि सिर्फ मायावती ने ही हिंदुओं के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कोटे की मांग भी थी.

बसपा ने ब्राह्मण सतीश मिश्रा और दलित अशोक सिद्धार्थ को एक साथ राज्यसभा के लिए नामांकित किया है

2007 के चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मणों और 38 ठाकुरों को मैदान में उतारा था, जिनके परिणाम आश्चर्यजनक रहे. सूत्रों का कहना है कि पार्टी को आशा है कि ऐसा ही मिश्रण इस बार के चुनावों में भी बेहतर साबित होगा.

मायावती का दलितों और ब्राह्मणों के संयोजन पर अधिक भरोसा करने का कारण यह है कि मुस्लिम मतदाताओं की दिशा अनिश्चित होती है.

एक उर्दू दैनिक ने दावा किया है कि 'बहनजी' मुसलमानों पर ज्यादा भरोसा नहीं करती हैं लिहाजा अंत में मुसलमान समाजवादी पार्टी के लिए मतदान कर सकते हैं. लेख में यह भी दावा किया गया है कि समन्वयकों की बैठक में मायावती पार्टी के मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को लेकर निराशा जता चुकी हैं, क्योंकि वे समुदाय में पैठ बनाने में सक्षम नहीं हो पाए.

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बसपा के पूर्व सांसद इलियास आजमी और पीलीभीत में बीसलपुर से पार्टी के विधायक अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू इस बात से सहमत है कि बहनजी और सिद्दीकी से मुस्लिमों का मोहभंग हो चुका है.

पार्टी से निष्कासित कर दिए गए फूल सिंह ने कहा कि "नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पार्टी का माहौल खराब कर दिया है. अब कोई मुसलमान बसपा के साथ जाने का इच्छुक ही नहीं है."

इस मामले में आजमी और अधिक गंभीर नजर आए. उन्होंने कहा, "समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों एक व्यक्ति आधारित पार्टियां हैं जो चाहते हैं कि मुसलमान उनके पीछे-पीछे चलें, उनके साथ नहीं. वे उनके साथ घरेलू नौकरों की तरह व्यवहार करते हैं. नसीमुद्दीन की स्थिति भी एक घरेलू नौकर की तुलना में बेहतर नहीं है."

First published: 25 May 2016, 22:48 IST
 
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