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मानेसर बनने की राह पर टाटा नैनो का साणंद!

अभिषेक पराशर | Updated on: 16 March 2016, 16:01 IST
QUICK PILL
  • अहमदाबाद के निकट साणंद में टाटा मोटर्स के नैनो संयंत्र के मजूदर 22 फरवरी से हड़ताल पर बैठे हुए हैं. हड़ताल कर रहे कर्मचारी 28 मजदूरों का निलंबन वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं जिन्हें कंपनी प्रबंधन ने बिना \'कोई कारण\' बताए बाहर कर दिया है.
  • टाटा मोटर्स फिलहाल साणंद में अपनी नई हैचबैक कार टियागो बना रही है जिसकी लॉन्चिंग में पहले ही देरी हो चुकी है. अब तीन हफ्तों की हड़ताल की वजह से कंपनी का प्रोडक्शन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.
  • टाटा मोटर्स में मजदूरों की हड़ताल से कॉरपोरेट जगत में गुजरात सरकार की छवि बिगड़ने लगी है. सरकार कॉरपोरेट में यह संदेश नहीं देना चाहती कि श्रम असंतोष की वजह से नैनो प्रोजेक्ट पटरी से उतर गई.

सिंगूर में हुए आंदोलन की वजह से पश्चिम बंगाल छोड़ चुकी टाटा की नैनो प्रोजेक्ट एक बार फिर से खतरे में दिख रही है. अहमदाबाद के निकट साणंद में टाटा मोटर्स के नैनो संयंत्र के मजूदर 22 फरवरी से हड़ताल पर बैठे हुए हैं. 

हड़ताल कर रहे कर्मचारी 28 मजदूरों का निलंबन वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं जिसे कंपनी प्रबंधन ने बिना 'कोई कारण' बताए बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

टाटा मोटर्स के स्थायी कर्मचारियों ने पिछले साल 14 दिसंबर को श्रम विभाग को भारतीय कामगार एकता संघ के नाम से मजूदर संघ बनाने की अर्जी दी थी. कंपनी प्रबंधन को मजदूरों का यह फैसला रास नहीं आया और उन्होंने दो दिनों बाद ही बिना कारण बताए दो मजदूरों को निलंबित कर दिया.

इसके बाद मजदूरों ने हड़ताल की और फिर श्रम विभाग एवं कंपनी के तीन प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत में यह फैसला लिया गया कि एक महीने के भीतर निलंबित कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट सौंपी जाएगी. 

गुजरात में टाटा मोटर्स के साणंद संयंत्र के करीब 400 कर्मचारी पिछले तीन हफ्तों से हड़ताल पर हैं

कंपनी ने न तो एक महीने के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपी और नहीं कर्मचारियों के निलंबन को खत्म किए जाने पर कुछ कहा. मजदूरों के पास अब फिर से हड़ताल पर बैठने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.  

22 फरवरी को फिर से मजदूरों ने कंपनी परिसर में एचआर के ऑफिस के बाहर धरना दिया. लेकिन कंपनी ने कर्मचारियों को जवाब देने की बजाए 26 और मजदूरों को बिना कोई कारण बताए निलंबित कर दिया. इसके बाद से करीब 400 कर्मचारी हड़ताल पर हैं. 

नैनो संयंत्र में काम करने वाले और भारतीय कामगार एकता संघ के प्रेसिडेंट हितेश रबारी बताते हैं, 'यूनियन बनाए जाने की मांग को लेकर आवेदन दिए जाने के बाद कंपनी प्रबंधन और सरकार का रुख हमारे खिलाफ हो गया. हम कंपनी में पिछले 6 साल से काम कर रहे हैं और आगे भी काम करना चाहते हैं. लेकिन उन्होंने हमारे दो साथियों को कंपनी से बाहर कर हमें यूनियन की गतिविधियों से दूर रहने की चेतावनी दी.'

सरकार ने बनाई दूरी

26 मजदूरों को निलंबित किए जाने के बाद कंपनी के बाहर हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब टाटा मोटर्स ने उन्हें कंपनी के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से भी मना कर दिया. सरकार ने भी उनका साथ देने की बजाए हड़ताल को ही अवैध घोषित करना मुनासिब समझा.

टाटा मोटर्स के कर्मचारियों को सलाह दे रहे नेशनल ट्रेड यूनियन इनीशिएटिव के वाइस प्रेसिडेंट असीम रॉय बताते हैं, 'सरकार ने अब उस इलाके में प्रदर्शन पर रोक लगा दी है जबकि टाटा मोटर्स के मजदूरों का प्रदर्शन पूरी तरह से कानून के दायरे में था.'  

टाटा की छवि अन्य कॉरपोरेट घरानों से अलग रही है. रॉय कहते हैं, 'टाटा मोटर्स को आगे बढ़कर यूनियन को बनाने में मजदूरों का साथ देना चाहिए था. लेकिन उन्होंने जिस सख्ती के साथ मजदूरों की उचित मांग को दबाया, उससे यह साफ हो जाता है कि वह अन्य कॉरपोरेट की तरह ही हैं.'

टियागो की बुकिंग 10 मार्च से शुरू होनी है. ऐसे में कंपनी के लिए प्रॉडक्शन को हर हाल में बनाए रखने का दबाव है

मजदूरों के हड़ताल पर जाने के बाद टाटा मोटर्स का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है. नरेंद्र मोदी नैनो को गुजरात के विकास मॉडल की कामयाबी से जोड़कर दिखाते रहे हैं. हालांकि सच यह है कि नैनो कार बाजार में पूरी तरह से विफल रही है.

टाटा मोटर्स फिलहाल साणंद में अपनी नई हैचबैक कार टियागो बना रही है जिसकी लॉन्चिंग में पहले ही देरी हो चुकी है. अब तीन हफ्तों की हड़ताल की वजह से कंपनी का प्रोडक्शन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. 

हड़ताल कर रहे एक कर्मचारी ने बताया, 'कंपनी ने प्रोडक्शन जारी रखने के लिए पुणे से करीब 150 कर्मचारियों को यहां बुलाया है.' टियागो की बुकिंग 10 मार्च से शुरू होनी है. ऐसे में कंपनी के लिए प्रोडक्शन को हर हाल में बनाए रखना जरूरी है.

दबाव में कंपनी

हड़ताल कर रहे कर्मचारियों को एटक, इंटक, सीटू, एचएमएस समेत देश भर के करीब 22 मजदूर संघों का समर्थन हासिल है. इतना ही नहीं किसानों ने भी टाटा मोटर्स के मजदूरों को अपना समर्थन देने का फैसला किया है. 

समर्थन के पीछे वजह बताते हए गुजरात खेडू समाज के प्रेसिडेंट सागर रबारी ने कहा, 'किसानों से जब जमीन ली जाती है तब उन्हें नौकरी देने का वादा किया जाता है और जब बात नौकरियों की आती है तब उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों तक से वंचित कर दिया जाता है. यूनियन तक बनाने की इजाजत नहीं दी जाती.'

जीआईडीसी ने 900 रुपये प्रति वर्गमीटर की मामूली कीमत पर साणंद में  टाटा मोटर्स को 1,110 एकड़ जमीन दी है

रबारी के मुताबिक नैनो प्रोजेक्ट को गुजरात सरकार ने करीब 30,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी. इसके अलावा 650 करोड़ रुपये की डायरेक्ट सब्सिडी दी गई जिसे कंपनी को 20 साल बाद 0.1 फीसदी के ब्याज के साथ चुकाना है. इतना ही नहीं सरकार ने जमीन का स्टाम्प ड्यूटी तक माफ कर दिया. 

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गुजरात सरकार के लिए नैनो प्रोजेक्ट की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने 2008-09 में 900 रुपये प्रति वर्गमीटर की मामूली कीमत पर साणंद में 1,110 एकड़ जमीन आवंटित कर दी.

रबारी ने कहा, 'नैनो प्रोजेक्ट में टाटा ने जितना निवेश किया है उससे कहीं अधिक वसूल लिया.' 

टाटा मोटर्स से निकाले गए एक कर्मचारी ने बताया, 'हम पिछले 6 साल से बतौर स्थायी कर्मचारी काम कर रहे हैं और हमारी तनख्वाह महज 12,000 से 15,000 के बीच है. कंपनी हर साल महज हजार रुपये बढ़ाती है लेकिन हमारे हाथ में कोई 800 रुपये की रकम आती है.'

रॉय कहते हैं, 'साणंद में काम करने वाले प्रशिक्षित कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन को देखकर आप विकास के मॉडल की असलियत का अंदाजा लगा सकते हैं.'

एक अन्य कर्मचारी ने बताया कि 2014 में हमें 8,500 दिवाली बोनस दिया गया था लेकिन 2015 में कंपनी ने हमें महज 3,500 रुपये बोनस दिया. इसके अलावा जब हमने कंपनी से मेडिकल सुविधाएं मांगी तो उन्होंने हमें देने से मना कर दिया. 

उन्होंने कहा, 'हमने कंपनी के एचआर से लगातार इस बारे में कहा लेकिन उन्होंने हमारी बातों को सुना तक नहीं. तब हमें यूनियन की जरूरत महसूस हुई और जब हमने ऐसा किया तो उन्होंने सीधे हमारे 28 साथियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया.'

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साणंद में काम करने वाले कर्मचारियों की औसत उम्र 25-32 साल की है और सभी युवा आईटीआई से प्रशिक्षित हैं. सागर रबारी ने कहा कि एक तरफ तो प्रधानमंत्री स्किल इंडिया की बात करते हैं लेकिन जिनके पास स्किल है उन्हें एक सामान्य जिंदगी जीने में भी कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

वित्त वर्ष 2016-17 के बजट में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को 1,700 करोड़ रुपये का बजट दिया गया है जिसके तहत देश भर में 1,500 मल्टी स्किल्स सेंटर्स खोले जाने हैं.

मानेसर न बन जाए साणंद

करीब तीन हफ्तों की हड़ताल के बाद मजदूरों के सामने रोजी रोटी का संकट गहराने लगा है लेकिन वह झुकने को तैयार नहीं है. पटेलों के आरक्षण आंदोलन को लेकर पहले ही गुजरात सरकार की किरकिरी हो चुकी है और अब टाटा मोटर्स में मजदूरों की हड़ताल से कॉरपोरेट जगत में सरकार की छवि पर बुरा असर पड़ने लगा है. सरकार कॉरपोरेट में यह संदेश नहीं देना चाहती कि श्रम असंतोष की वजह से नैनो प्रोजेक्ट पटरी से उतर गई.

हड़ताल पर बैठे मजदूरों ने साफ कर दिया है कि वह अपने 28 साथियों के बिना काम पर वापस नहीं लौटेंगे

स्थिति को संभालने की कोशिश के मद्देनजर आनन-फानन में सरकार ने टाटा मोटर्स में मजदूर यूनियन को मान्यता दिए जाने की घोषणा करने में देर नहीं लगाई. 

असिस्टेंट लेबर कमिश्नर सुरेश पटेल ने कहा, 'करीब एक महीने या उससे अधिक समय में मजदूर संघ को मान्यता देने काम पूरा कर लिया जाएगा.' हालांकि हड़ताल कर रहे कर्मचारियों को अभी तक इस बारे में कोई लिखित पत्र नहीं मिला है. 

मजदूरों ने साफ कर दिया है कि वह अपने 28 साथियों के बिना काम पर वापस नहीं लौटेंगे. रॉय ने कहा, 'पूरा मामला उन 28 कर्मचारियों को निलंबित किए जाने का है जिनका कोई कसूर नहीं है. उन्हें बिना चार्जशीट दिए ही कंपनी ने बाहर कर दिया. हम अपनी मांगों को लेकर कायम है.'

मजदूर संघ को मान्यता दिए जाने और निलंबित कर्मचारियों को वापस लिए जाने के फैसले को लेकर टाटा मोटर्स को भेजे गए ईमेल का अभी तक जवाब नहीं मिला है. 

कंपनी प्रबंधन को शायद इस बात का अंदाजा था कि वह मजदूरों के बीच से ही कुछ को बाहर का रास्ता दिखाकर उन्हें काम पर वापस लौटने के लिए मजबूर कर देंगे. लेकिन उनका यह दांव फिलहाल उल्टा पड़ता दिख रहा है.

सागर रबारी के मुताबिक जब उन्होंने मजदूरों को अपना समर्थन देने का फैसला किया तब उन्होंंने मजदूरों की एकजुटता को जांचने के लिए सीक्रेट वोटिंग कराई थी. नतीजे चौंकाने वाले थे. मौके पर मौजूद 354 कर्मचारियों में से 353 ने इस बात पर सहमति जताई कि वह अपने 28 साथियों के बिना काम पर वापस नहीं लौटेंगे.

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First published: 16 March 2016, 16:01 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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