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लाल बहादुर शास्त्री ने जब पाकिस्तान से युद्ध के समय छोड़ दिया था खाना, खुद धुलते थे कपड़े

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 October 2018, 11:01 IST

तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को 1965 के युद्ध में धूल चटा दी थी. 1962 के युद्ध से उबरा भारत अभी किसी दूसरे युद्ध की स्तिथि में नहीं था. लेकिन पाकिस्तान को मुहतोड़ जवाब देने के लिए सेना ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी. इस युद्ध के लिए भारतीय सेना रक्षा मंत्री चव्हाण से छंब सेक्टर में वायु सेना के इस्तेमाल की अनुमति मांग रही थी. इस मौके पर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अचानक अपनी कुर्सी से उठे और अपने दफ़्तर के कमरे के एक छोर से दूसरे छोर तक तेज़ी से चहलक़दमी करने लगे.

इस युद्ध के लिए लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व का जिक्र करते हुए शास्त्री के सचिव सीपी श्रीवास्तव ने अपनी किताब 'ए लाइफ़ ऑफ़ ट्रूथ इन पॉलिटिक्स' में लिखा, "शास्त्री ऐसा तभी करते थे जब उन्हें कोई बड़ा फ़ैसला लेना होता था. मैंने उनको बुदबुदाते हुए सुना... अब तो कुछ करना ही होगा." श्रीवास्तव ने अपनी किताब में लिखा है उसके कुछ देर बाद जब वो उनसे मिलने गए तो उनके चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था कि उन्होंने कोई बड़ा फ़ैसला कर लिया है.

आगे श्रीवास्तव ने लिखा, ''कुछ दिनों बाद हमें पता चला कि उन्होंने तय किया था कि कश्मीर पर हमले के जवाब में भारतीय सेना लाहौर की तरफ़ मार्च करेगी. लेकिन उस समय तक उन्होंने ये बात किसी से साझा नहीं की. अगले दिन और फिर तीन सितंबर को दोबारा उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और पाकिस्तान पर हमला करने की योजना को अंतिम रूप दिया.''

 

पाक के आधुनिक पैटन टैंक से भिड़े थे सेना के जवान
भारतीय सेना के कमांडरों और तीन दिन टैंकों के बीच जबरदस्त घमासान हुआ था. पाकिस्तान के पास आधुनिक पैटन टैंकों का दस्ता था, जबकि हमारी सेना के पास दूसरे विश्वयुद्ध के जमाने के टैंक थे लेकिन फिर जांबाज़ जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया.

शास्त्री जी ने छोड़ दिया था खाना

1962 के युद्ध से उबरने के बाद जिस वक्त भारत-पाक का युद्ध चल रहा था उस वक्त देश वित्तीय संकट में था. ऐसे में शास्त्री जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान से लोगों से अपील की वो अपने फालतू खर्चे बंद कर दें. इसके लिए खुद प्रधानमंत्री ने भी अपने सारे काम खुद से करने शुरू कर दिए थे. प्रधानमंत्री अपने कपड़े खुद धुलते थे उनके घर आने वाली काम वाली बाई को उन्होंने हटा दिया था.

 

शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की वो अपने फालतू खर्च रोकें जिससे घरेलु इनकम में बढ़त हो सके. या तो सेना में दान करें जिससे सेना युद्ध में किसी आर्थिक कमजोरी की वजह से न हार जाए. शास्त्री जी ने लोगों से हफ्ते में एक दिन उपवास रखने को कहा जिससे कि गेंहू की मांग में कमी आये. इसके लिए खुद उन्होंने हफ्ते में एक दिन खाना छोड़ दिया. गौरतलब है उस समेत देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था. उस वक़्त गेंहू देश में अमेरिका से आता है.

नहीं लेते थे वेतन

ऐसे संकट के समय में शास्त्री जी ने वेतन लेने से मना कर दिया था. यहां तक कि एक बार का वाकया है जब शास्त्री जी की धोती फट गयी थी तब उन्होंने नई धोती की जगह फटी धोती को ही सिलने का आदेश दिया है.

 

First published: 1 October 2018, 10:37 IST
 
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