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लालू के बच्चे : समाजवाद की बगिया में खिलते परिवारवाद के नए फूल

पाणिनि आनंद | Updated on: 24 November 2015, 13:23 IST
QUICK PILL
  • लालू प्रसाद ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करके अपने  बेटों तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को मंत्री बनवाया. उनके छोटे बेटे तेजस्वी को राज्य का उप मुख्यमंत्री भी बनाया गया है.
  • नेहरू-गांधी खानदान के वंशवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले नेता भी वंशवादी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. लालू ने जिस तरह अपने बेटों को आगे बढ़ाया है उससे उनकी छवि को धक्का लगा है.

उन्होंने सामाजिक न्याय के नाम पर वोट मांगा. समाजवाद और लोकतंत्र की दुहाई दी. सबको अवसर और बराबरी का नारा दिया. लेकिन जीतने के बाद परिवार की चौखट पर सिद्धांतों और आदर्शों की गगरी फोड़ दी.

लालू प्रसाद के दोनों बेटे राजनीति की पाठशाला में दाखिला लेते ही उप कुलपति बन गए हैं.

शुक्रवार को जब भव्य पंडाल में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नीतीश कुमार अपनी कुर्सी पर बैठे तो हर एक नज़र सरकार के दूसरे सबसे अहम चेहरे को देखने के लिए मंच पर टिकी थी. और फिर लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के छोटे बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव (26) का नाम पुकारा गया.

तेजस्वी के बाद उनके बड़े भाई तेज प्रताप शपथ लेने आए. तेजस्वी राघोपुर से और तेज प्रताप महुआ से चुनाव जीते हैं.

लालू के बाद पार्टी का दूसरा प्रमुख चेहरा होने के बावजूद अब्दुल बारी सिद्दीकी  को सरकार में उप मुख्यमंत्री का दर्जा नहीं मिला

तेजस्वी और तेज प्रताप के बाद चौथा नाम था अलीनगर- दरभंगा से छह बार लगातार विधायक रहे अब्दुल बारी सिद्दीकी का. लालू के बाद पार्टी का प्रदेश में दूसरा बड़ा चेहरा और राज्य से मुसलमानों के एक बड़ा नाम होने के बावजूद सिद्दीकी को नीतीश कुमार के नेतृत्ववाली सरकार में उप मुख्यमंत्री का दर्जा नहीं मिल सका. लालू प्रसाद ने इस तरह सत्ता में अपनी हिस्सेदारी को परिवार तक समेट रखा है.

परिवार के वर्चस्व का यह तरीका लालू प्रसाद के लिए नया नहीं है. 1997 में जब पार्टी के बाकी चेहरों को नकारकर लालू प्रसाद ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता की बागडोर सौंपी थी, तभी स्पष्ट हो गया था कि लालू प्रसाद समाजवाद की अपनी राजनीति के केंद्र में अपने परिवार को ही बनाए रखना चाहते हैं.

मंत्रिमंडल के निर्धारण से पहले पटना स्थित लालू प्रसाद के आवास पर जिस तरह घर के बर्तन बजते सुनाई दिए, उसमें उनकी बेटी मीसा भारती भी अपना हिस्सा मांगती नज़र आईं. मीसा ने राजनीति में दोनों भाइयों से पहले से अपनी सक्रियता की दुहाई दी और इस विधानसभा चुनाव में दमदार प्रचार करने का हवाला भी दिया.

माना जा रहा है कि परिवार में कलह रोकने के लिए मीसा भारती को भी कोई अहम ज़िम्मेदारी या राज्य सभा में भेजा जा सकता है

मीसा पिछले लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र सीट से पार्टी की उम्मीदवार भी थीं. हालांकि इस चुनाव में वो रामकृपाल यादव से हार गई थीं. माना जा रहा है कि परिवार में बिखराव और कलह को रोकने के लिए अगले कुछ समय में मीसा को भी अहम ज़िम्मेदारी दी जा सकती है जिसमें राज्यसभा भेजे जाने का विकल्प भी है.

यकीकन ऐसा नहीं है कि राजनीति की गंगा में परिवार की खेती सींचने वाले लालू प्रसाद अकेले नेता हैं. हर पार्टी इसकी मिसाल है. उत्तर में समाजवाद के सबसे बड़े पुरोधा बननेवाले परिवार से इतने लोग राजनीति में हैं कि कैबिनेट घर में ही बनाया जा सकता है. यही हाल दक्षिण में करुणानिधि के परिवार का है. 

राहुल गांधी से लेकर पंकज सिंह तक और नवीन पटनायक से लेकर वसुंधरा राजे सिंधिया तक हर पार्टी परिवारों को अपनी पीठ पर लादकर ढोती नज़र आती है. 

हिमाचल में अनुराग ठाकुर हों, कश्मीर में उमर अब्दुल्ला, पंजाब और हरियाणा में कांग्रेस, भाजपा और अकाली परिवार हों, खानदान पवार या चंद्रबाबू नायडू, या वामपंथी दलों में पोलित ब्यूरो के सदस्य हों, परिवारवाद हर पार्टी का सच है. ऐसे में लालू अपने समकालीनों की परंपरा में ही शामिल नज़र आते हैं.

परिवारवाद हर पार्टी का सच है. ऐसे में लालू अपने समकालीनों की परंपरा में शामिल नज़र आते हैं

लेकिन अगर इन लोगों पर परिवारवाद की रेवड़ियां पाने के लिए उंगलियां उठी हैं तो लालू प्रसाद को परिवारवाद के लिए इसलिए छूट नहीं दी जा सकती है कि वो मोदी और संघ के राजनीतिक एजेंडे को नीतीश के साथ मिलकर बिहार में धराशायी करने में कामयाब रहे हैं. 

जीत एक लोकतांत्रिक और योग्य लोगों के ज़रिए सरकार बनाने के लिए मिली है, परिवार की बेरोज़गारी का समाधान खोजने के लिए नहीं. लालू ने जीत के दायित्व को अपनी देहरी पर गाय की तरह बांध दिया है और उसका अनादर किया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि लालू बिहार विधानसभा चुनाव के हीरो हैं. उन्होंने नीतीश को वापस लाने में और भाजपा के अश्वमेध को रोकने में सबसे अहम भूमिका निभाई है. लेकिन बड़ी जीत बड़ी ज़िम्मेदारी लेकर आती है. राजनीति में जिसे यह ज़िम्मेदारी ध्यान रहती है, वो आगे बढ़ता है. उसका संगठन और आधार मज़बूत होता है, विचारधारा का प्रसार होता है.

लालू बिहार चुनाव के हीरो हैं. उन्होंने नीतीश को वापस लाने में और भाजपा को रोकने में सबसे अहम भूमिका निभाई है

असहिष्णुताओं और भय के खिलाफ मिले जनादेश का सबसे अच्छा सम्मान यह होता कि अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे मुस्लिम चेहरे को लालू उप मुख्यमंत्री बनाते. इससे लालू और नीतीश का कद राष्ट्रीय स्तर पर और ऊंचा उठता. 

राष्ट्रीय राजनीति में जीत का जो संदेश था, उसे और मज़बूत और अगले पड़ाव तक ले जाने का काम सिद्दीकी जैसे विकल्प को चुनना होता. शपथ ग्रहण में वह संदेश भेजने के बजाय लालू प्रसाद में सत्ता को परिवार और जाति तक सीमित कर दिया. दोनों बेटे सरकार में नंबर दो और तीन हैं. राजद के 12 मंत्रियों में से 5 यादव जाति के हैं.

प्रश्न यह उठता है कि किन वजहों से लालू प्रसाद ऐसा कर रहे हैं. सबसे बड़ा कारण है असुरक्षाबोध. लालू कई बार अपने वर्चस्व को इसलिए भी बचाए रख सके हैं क्योंकि उन्होंने पार्टी की कमान और सत्ता की बागडोर अपने परिवार के हाथों में ही रखी. 

राजनीति में लालू प्रसाद के लिए यह चुनाव करो या मरो की तरह था. उनका राजनीतिक वजूद दांव पर लगा था. इस बार की हार के बाद पार्टी को संगठित रख पाना मुश्किल होता. पार्टी की कमान दूसरे हाथों में जाए और सत्ता में पार्टी के दूसरे लोग मजबूत हों तो इससे आगे चलकर लालू को चुनौती भी मिल सकती है.

छोटे बेटे में बड़े बेटे की अपेक्षा लालू को ज़्यादा संभावना दिखती है. इसीलिए उन्होंने तेजस्वी को सरकार में दूसरे सबसे बड़े पद के लिए चुना

साधु यादव से मिले घाव और पप्पू यादव से मिला धोखा लालू भूले नहीं हैं. इसलिए वह इस चुनाव परिणाम के बाद कोई रिस्क लेना नहीं चाहते थे.

दूसरा अहम काम जो लालू प्रसाद के लिए तत्काल करना ज़रूरी था, वो पार्टी में अपना उत्तराधिकारी तय करना था. छोटे बेटे में बड़े बेटे की अपेक्षा लालू को ज़्यादा संभावना दिखती है. इसीलिए उन्होंने तेजस्वी को चुना और सरकार में दूसरा बड़ा पद दिया गया. लालू ने इस तरह जाति और परिवार के सामने अपना विकल्प दे दिया है. 

कमज़ोर होते हुए भी तेजस्वी अब सत्ता के गलियारों में पार्टी की आवाज़ है, पहचान है. तीसरा ज़रूरी काम था परिवार की अंतरकलह को शांत करना. लालू इसमें भी कामयाब दिखाई देते हैं. मीसा कुछ न पाकर भी भविष्य में मिलने वाले लाभ के प्रति आश्वस्त हैं.

लेकिन परिवार और उत्तराधिकारी की इस लड़ाई में लालू को राजनीतिक रूप से नुकसान भी हुआ है. लालू वो चेहरा हैं, जिन्होंने मुलायम सिंह की तरह भाजपा के लिए कभी लचीला रवैया नहीं दिखाया था. नीतीश, जॉर्ज फर्नांडीस और शरद यादव की तरह कभी भाजपा का दामन नहीं थामा था. राम विलास पासवान की तरह वो अवसरवाद की बीमारी से ग्रस्त नहीं थे.

परिवार के मोह से लालू की प्रतिबद्धता कमज़ोर दिखने लगती है, एक मज़बूत नेता की कमी जाहिर हो जाती है

अपने समकालीनों में सांप्रदायिकता के सवाल पर लालू बेहतर और मज़बूत खड़े दिखाई देने वाले चेहरा रहे हैं. लेकिन परिवार के मोह से लालू की प्रतिबद्धता कमज़ोर दिखने लगती है, एक मज़बूत नेता की कमी जाहिर हो जाती है.

ऐसा नहीं है कि लोग लालू से यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि वो परिवारवाद को त्यागकर सिद्धांतों की राजनीति करते नज़र आएंगे. लेकिन परिवार को प्रश्रय देने की भी एक मर्यादा होती है जिसे लालू ने भंग कर दिया है.

दोनों बेटों का यह पहला चुनावी अनुभव था. पिता का हाथ पकड़कर, रटे-सिखाए भाषणों के सहारे उन्होंने चुनाव के ज़रिए सार्वजनिक जीवन में दखल दिया. उनकी तरफ से बेहतर करने का प्रयास भी हुआ जो कि सराहनीय है. लेकिन अभी वो प्रखरता कोसों दूर है जिसके आधार पर उनको योद्धा का तमगा दिया जा सके.

लालू के दोनों बच्चे भले ही एक राजनीतिक परिवार में पैदा हुए हों, उनका राजनीतिक जीवन अभी अपना बालकांड ही लिख रहा है. दोनों राजनीतिक रूप से कम सक्रिय रहे. बड़े बेटे ने अपने काम-कारोबार के ज़रिए जीवन को आगे ले जाने का रास्ता चुना था तो छोटे ने क्रिकेट के बल्ले के सहारे अपना करियर संवारना चाहा था. राजनीति दोनों में से एक की भी पसंद नहीं थी और न ही उनके व्यक्तित्व उसके अनुरूप थे.

लालू के दोनों बेटे अभी राजनीति के ककहरे को भी भली प्रकार सीख नहीं सके हैं

दोनों अवसर के लिए, शक्ति के लिए और लाभ के लिए राजनीति में आए. आए भी नहीं, बल्कि लाए गए. ठीक वैसे ही, जैसे ज़मींदार का लड़का बैरिस्टरी पढ़ने के बाद वापस अपने पिता की पुश्तैनी गद्दी का वारिस बन जाता है. यह उसका सहज चयन नहीं, व्यवहारिक और अधिक लाभप्रद विकल्प होता है. राजनीति में यह एक बेहतर स्थिति नहीं है क्योंकि राजनीति में बेहतर करने के लिए राजनीतिक होना ज़रूरी है और लालू के दोनों बेटे अभी राजनीति के ककहरे को भी भली प्रकार सीख नहीं सके हैं.

जब किसी राजनीतिक संगठन में प्रतिबद्ध और ईमानदार कार्यकर्ताओं की अनदेखी करके बंदरबांट का, परिवारवाद का सहारा लिया जाता है, तो एक अस्वस्थ परंपरा की नींव पड़ जाती है. लालू प्रसाद ने इस परंपरा को हद से आगे ले जाकर खड़ा कर दिया है. बेटों में से एक को कैबिनेट में भेजा जा सकता था. लेकिन दोनों के लिए अहम पद और शक्ति अचकचा भी लगता है और अपच भी. कम से कम जयप्रकाश नारायण और लोहिया तो इस शपथ ग्रहण पर यही कर रहे होते.

एक बात और, लालू प्रसाद की नज़र में भले ही यह एक सबसे सुरक्षित विकल्प हो, लेकिन ताकत और सत्ता अगर अपरिपक्वता के सिर में बुखार की तरह चढ़ गई तो लालू अपने ही बेटों के हाथ हारने लगेंगे. बेटों-बेटियों में आपसी प्रतिस्पर्धा भी लालू और राबड़ी देवी के लिए भविष्य में चुनौती बन सकती है. लालू ने राजनीति के निशाने ठीक लगाए हैं, लेकिन गुलेल को एक हद से ज़्यादा तान देना नुकसानदेह हो सकता है. ज़्यादा मोह संयम छीन लेता है. लालू प्रसाद शायद इसे आज न समझ सकें.

First published: 24 November 2015, 13:23 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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