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असंतोष की जमीनः टाटा के जाने के 8 साल बाद भी बंटा हुआ है सिंगूर

सोमी दास | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

एक टूटे हुए रिश्ते के साये में आगे बढ़ना किसी के लिये इतना आसान नहीं होता. एक बेहतर भविष्य की आशा में टाटा नैनो के कारखाने के लिये स्वेच्छा से अपनी जमीन दान देने वाले सिंगूर के ग्रामीणों के लिये 997 एकड़ में फैला वहां का सुनसान ढांचा हर पल उन्हें एक गंवाए हुए अवसर की याद दिलाता है.

कुछ खोने की यह भावना अब राजनीतिक मुद्दे का रूप लेती जा रही है जिसके फलस्वरूप इस निर्वाचन क्षेत्र के कुछ इलाकों में टीएमसी विरोध की हवा बहती दिख रही है. यह वही विधानसभा क्षेत्र हैं जहां वर्ष 2011 में राज्य के सत्तारूढ़ दल (तृणमूल) ने सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों की सफलता के बल पर 35 हजार मतों के अंतर से जीत हासिल की थी.

मौजूदा स्थिति यह है कि जमीन के वास्तविक स्वामित्व का मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन होने के चलते न तो इसे इसके मूल मालिकों को ही लौटाया जा सकता है और न ही इसका उपयोग किसी भी प्रकार की औद्योगिक गतिविधि में हो सकता है.

टाटा कंपनी ने 2008 में सिंगूर छोड़कर जाने का फैसला लेना पड़ा था

जमीन के इस बेहद विशाल टुकड़े से स्थानीय ग्रामीणों को दूर रखने  और कारखाने में रखे महंगे उपकरणों के चोरी-चकारी से बचाने के लिए इसके चारों तरफ भारी पुलिस बंदोबस्त किया गया है.

इस बीच राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक बयान ने सरकार की मंशा पर ही संशय खड़ा कर दिया है. ममता ने कहा, ‘‘चाहे अदालत इस मामले का निबटारा करने में पांच साल का समय ले या 50 साल का हम कुछ नहीं कर सकते.’

वापसी की तैयारी

सीपीआई (एम) जनता के इस रोष को जमकर हवा दे रहा है. सिंगूर से पार्टी के उम्मीदवार राबिल देब और राज्य सचिव सौर्ज्यकांत मिश्रा ने नैनो परिसोजना को पुनर्जीवित करने और इसके लिये अपनी जमीन देने वाले ग्रामीणों और किसानों को नौकरी दिलवाने का वायदा किया है.

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सीपीएम की सिंगूर जोन के सचिव पचकोरी दास कहते हैं, ‘‘सिंगूर राज्यव्यापी उद्योग-विरोधी भावना का सबसे बड़ा शिकार है जिसके पीछे मुख्य रूप से मीडिया का हाथ है. लोगों को अबतक नहीं मालूम है कि जमीन को लेकर किया गया समूचा आंदोलन झूठ की बुनियाद पर टिका था. यहां के युवाओं को रोजगार चाहिये. हमनें सिंगूर की जनता से वायदा किया है कि अगर हम सत्ता में वापस आते हैं तो हम रोजगार के अवसर पैदा करेंगे और इस परियोजना को पुनर्जीवित करेंगे.’’

सीपीएम और टीएमसी दोनों के ही पास अपना-अपना वोटबैंक है. ‘इच्छुक जमीन मालिक’ और ‘अनिच्छुक किसान

इसके अलावा वाम दल सिंगूर से तीन बार विधायक रह चुके टीएमसी के उम्मीवार रवींद्रनाथ भट्टाचार्य को लेकर पार्टी में चल रहे कथित विवादों को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं.

बांट और राज करो

सीपीएम और टीएमसी दोनों के ही पास अपना-अपना वोटबैंक है. ‘इच्छुक जमीन मालिक’ और ‘अनिच्छुक किसान’. इच्छुक जमीन मालिकों ने रोजगार के वायदे के बदले अपनी जमीन टाटा को बेची थी. अनिच्छुक किसानों ने ममता की अगुवाई में चले आंदोलन में भाग लिया था जिसके फलस्वरूप कंपनी को 2008 में सिंगूर छोड़कर जाने का फैसला लेना पड़ा था.

टीएमसी की बेराबेरी इकाई के अध्यक्ष निमाई मलिक कहते हैं, ‘अपनी इच्छा से जमीन बेचने वाले मालिकों को अपने हिस्से का मुआवजे का पैसा मिल गया जिसे उन्होंने दूसरों को ब्याज पर दे रखा है. फिर वे किस बात की शिकायत कर रहे हैं? वे एक जाल में फंस गए हैं. हमने उनसे पहले ही कहा था कि अगर आपको मनमाफिक दाम नहीं मिल रहे हैं तो अपनी जमीन मत बेचो. लेकिन तब उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी. अब उनके साथ क्या हो रहा है हमें इस बात की कोई चिंता नहीं है.’

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अनिच्छुक किसान, जो संभावित मतदाता भी हैं, को ममता दो रुपये किलो चावल देने के अलावा प्रत्येक को 2000 रुपये भी दे रही हैं. उनके इस कदम के बाद ‘इच्छुक समूह’ जिसे तकनीकी प्रशिक्षण लेने के बावजूद वायदा की हुई नौकरी नहीं मिली है और जो मुआवजे की अधिकतर रकम खर्च कर चुके हैं, और अधिक नाराज हैं.

इस तरह परियोजना के बंद होने और बाहर चले जाने के 8 वर्ष बाद भी यह मामला सिंगूर में भावनात्मक चुनावी मुद्दा बना हुआ है.

First published: 1 May 2016, 9:17 IST
 
सोमी दास @catchhindi

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