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शिवसेना का आख़िरी राजनीतिक दांव: राष्ट्रपति पद के लिए भागवत के नाम का प्रस्ताव

अश्विन अघोर | Updated on: 29 March 2017, 9:34 IST


शिवसेना फिलहाल मुश्किल दौर से गुजर रही है. मुंबई और महाराष्ट्र पर राज करने का इसका 50 साल पुराना ख्वाब धीरे-धीरे टूटता नजर आ रहा है. साथ ही अपने पारम्परिक गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के साथ इसके बिगड़ते रिश्ते सामान्य होने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही.

और तो और, बृहन् मुंबई नगरपालिका चुनाव में भी भाजपा की एकतरफा जीत ने शिवसेना को अकेला छोड़ दिया. जबकि शिवसेना अब तक यह मानकर चल रही थी कि महाराष्ट्र मे तो उसका ही दबदबा है और भाजपा राज्य में उसके छोटे भाई की तरह है. सेना को इन चुनावों में 84 सीटें मिलीं और भाजपा को 82.


राज्य में भाजपा को मात देने में विफल रही शिवसेना ने अब नया राग अलापते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का नाम भावी राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित किया है. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल इसी साल जुलाई में समाप्त होने वाला है.


मीडिया से बात करते हुए शिवसेना नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा,‘‘अब जबकि केंद्र में भाजपा की सरकार है तो संघ प्रमुख मोहन भागवत राष्ट्रपति पद के लिए आदर्श उम्मीदवार हो सकते हैं. उनके राष्ट्रपति बनने का आशय यह होगा कि भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर होगा.’’

 

अंतिम दांव


जाहिर है सभी मोर्चों पर मुंह की खाने के बाद सेना अब खुद को भाजपा से बेहतर साबित करने में लगी है. गौरतलब है भाजपा नए चुनाव पर विचार कर रही है. राजनीतिक विश्लेषक गणेश तोर्सेकर कहते हैं ‘‘मौजूदा हालात में अगर चुनाव होते हैं तो भाजपा को 288 में से 150 सीटें तो आसानी से मिल जाएंगी लेकिन शिवसेना शायद मुश्किल से ही अपनी मौजूदा संख्या (63) बचा पाए. उद्धव ठाकरे के लिए यही सबसे बड़ी चिंता का सबब है और इसीलिए उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भागवत का नाम उछाल दिया है.’’

 

राष्ट्रपति पद के चुनावों में शिवसेना की भूमिका सदा ही महत्वपूर्ण रहती है. पिछले तीन राष्ट्रपति के चुनाव वही उम्मीदवार जीते जिन्हें शिवसेना का समर्थन मिला. इस बार भी यही होने वाला है. तोर्सेकर कहते हैं ‘‘भाजपा को दरकिनार करने के लिए शिवसेना ने अंतिम चाल चली है, क्योंकि और कोई तो क्या भाजपा नेता खुद ही नहीं चाहेंगे कि वे भागवत को राष्ट्रपति पद पर देखें.’’


मुंबई के एक वरिष्ठ पत्रकार अभय देशपांडे के अनुसार, ‘‘एक तरह से शिवसेना आर्थिक मोर्चे पर विपक्षी पार्टी की भूमिका अदा करती है. वह भाजपा के बर्ताव से आहत है. इसकी नाराजगी की एक खास वजह यह है कि इसके मंत्रियों को महत्वपूर्ण विभाग नहीं सौंपे गए. सेना गाहे-ब-गाहे इस मुद्दे को उठाती रहती है. सेना के नेताओं को भाजपा के साथ सत्ता में साझेदारी पसंद नहीं लेकिन वे इसे निभाना भी चाहते हैं. वे चाहते हैं कि गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा करे ताकि वे इसका राजनीतिक लाभ उठा सकें.’’


वे कहते हैं शिवसेना ने सिर्फ और सिर्फ भाजपा को मुश्किल में डालने के लिए भागवत का नाम उछाला है क्योंकि भाजपा राष्ट्रपति पद के लिए भागवत के नाम पर ना तो हां कर सकती है ना ही मना कर सकती है. ‘‘ऐसा करने के पीछे शिवसेना की मंशा जरूर भाजपा नेताओं को बांटने की रही होगी. अगर ऐसा होता है तो बीजू जनता दल जैसे धर्मनिरपेक्ष दल भागवत के पक्ष में कभी वोट नहीं डालेंगे. शिवसेना ने ऐसा करके ‘कुछ ज्यादा ही बड़ा दांव’ खेलने की कोशिश की है क्योंकि यह केवल 25,000 वोटों के सहारे विपक्षी दलों की राय कायम नहीं कर सकती. राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल मतों की संख्या 5.5 लाख वोट होती है.

 

बढ़ती भाजपा, हटती शिवसेना


तोर्सेकर कहते हैं कि प्रदेश भर में भाजपा के बढ़ते प्रभाव और प्रदेश से बाहर जनाधार पाने में शिवसेना की नाकामी के चलते आज यह स्थिति आई है. हाल ही संपन्न हुए निकाय चुनाव के बाद भाजपा की स्थिति प्रदेश में मजबूत हुई है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस राज्य में भाजपा का चेहरा बन कर उभरे हैं. उन्हें प्रदेश भर से व्यापक समर्थन मिल रहा है.

 

दूसरी ओर शिवसेना का प्रभुत्व अब भी मुंबई और ठाणे तक ही सीमित है. इसके नेता मुंबई और ठाणे से बाहर झांकते तक नहीं हैं. विदर्भ, मराठवाड़ा और कोंकण में पार्टी का कोई जनाधार नहीं है. यही कारण है कि भाजपा प्रदेश में मध्यावधि चुनाव करवाने की बात कर रही है. उन्हें अब केवल राष्ट्रपति चुनाव के लिए शिवसेना के साथ की जरूरत है.


पिछले ढाई बरसों से अधिक समय से प्रदेश में शिवसेना का रवैया विपक्षी दल जैसा हो गया है. इससे न केवल भाजपा आहत है बल्कि प्रदेश की जनता भी. एमसीजीएम के चुनाव नतीजे यही दर्शाते हैं. उद्धव ठाकरे की अपील के बावजूद पार्टी अपनी सीटों की संख्या में मात्र 9 अंकों का ही इजाफा कर पाई जबकि फड़नवीस भाजपा की सीटों में 50 सीटें बढ़ा कर सफल साबित हुए.

 


तोर्सेकर ने कहा, ‘‘शिवसेना सदा ही प्रभावी और निर्देशात्मक भूमिका में रही है. विधानसभा में उसके पास हमेशा ही भाजपा से ज्यादा सीटें रही हैं. लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं और शिवसेना फिर भी सबक लेने को तैयार नहीं है. विपक्ष की तरह बर्ताव करके सेना अपनी साख खोती जा रही है. भाजपा ने भी संकेत दे दिए हैं कि वह शिवसेना के नखरे उठाने के पक्ष में नहीं है.


शिवसेना की असल परेशानी यही है कि वह हर जगह सिमटती ही जा रही है. प्रदेश में वह पूरी तरह सत्ता नहीं पा सकी; लेकिन एमसीजीएम में तो उसके ऐसे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी. इसके बावजूद हावी होने का दिखावा करने के प्रयास में शिवसेना के नेता उपहास का पात्र बन कर रह गए हैं. हालत यह है कि सत्ता के लिए सेना नेता किसी का भी साथ देने के लिए तैयार हो जाते हैं. यही कारण है कि सेना सरकार का साथ नहीं छोड़ रही है.

 

टूटेगी सेना?

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो सेना के 50 से अधिक विधायक भाजपा को समर्थन का आश्वासन दे चुके हैं. ऐसे में मध्यावधि चुनाव सेना के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं. नाम न बताते हुए भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा ‘‘हम किसी भी वक्त मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार हैं. हम 150 से ज्यादा ही सीटें जीतेंगे. असल बात यह है कि हम सेना के नेताओं के रवैये से उकता गए हैं. अच्छा होगा कि हम अपनी-अपनी राह चुन लें और यही सही वक्त है. हम सेना के साथ गठबंधन समाप्त करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और अगर ऐसा होता है तो हम राज्यपाल से आग्रह करेंगे कि वह विधानसभा भंग कर दे.


शिवसेना का अस्थिर रवैया इसके विधायकों के लिए ही परेशानी का सबब बना हुआ है. बहुत से मुद्दों पर सेना के विधायकों को ही पता नहीं रहता कि पार्टी क्या रूख अपनाएगी. शिवसेना के एक नेता ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, फसल ऋण माफी सहित बहुत से मुद्दों पर पार्टी के फैसलों ने हमें ही असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया. इस मामले में हमारी पार्टी सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हो गई थी लेकिन जब बजट सत्र में इस मामले पर अपना पक्ष रखने का वक्त आया तो सेना ने अचानक अपना मन बदल लिया.

 

 

एक ओर हमें कहा गया था कि जब तक किसान ऋण माफ नहीं हो जाए, सदन नहीं चलने देना है तो दूसरी ओर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इन्हीं वजहों से हममें से बहुत से विधायक या तो भाजपा में शामिल होना जाएंगे या उसका समर्थन करेंगे.

 

 

First published: 29 March 2017, 9:34 IST
 
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