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लातेहार हत्याकांड: सभी आरोपी जमानत पर रिहा, पीड़ित परिवार सदमे में

विकास कुमार | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
(कैच न्यूज)

इसी साल 18 मार्च, 2016 को झारखंड के लातेहार जिले में हुई दो पशु व्यापारियों (32 वर्षीय मजलूम अंसारी और 12 वर्षीय इम्तियाज खान) की हत्या में एक अहम मोड़ आ गया है. घटना लातेहार जिले झावर गांव में हुई थी जहां दोनों व्यापारियों की हत्या कर उनका शव पेड़ से लटका दिया गया था.

इस मामले से जुड़े सभी आठ आरोपियों (मनोज कुमार साहू, मिथिलेश प्रसाद साहू, प्रमोद कुमार साहू, मनोज साव, अवधेश साव, अरुण साव, सहदेव साव और विशाल तिवारी) को झारखंड उच्च न्यायलय से 8 सितंबर 2016 को सशर्त जमानत मिल गई है. फिलहाल सभी आरोपी जेल से बाहर आ चुके हैं.

जमानत से पीड़ित परिवार डरे और घबराए हुए हैं

आरोपियों को मिली जमानत से पीड़ित परिवार डरे और घबराए हुए हैं. कैच से बात करते हुए मृतक मजलूम अंसारी के भाई मुनव्वर अंसारी बताते हैं कि उनका पूरा परिवार इस खबर से सदमे में है. वो कहते हैं, ‘सभी लोग छूट गए हैं. मुझे या हमारी तरफ से किसी और को पहले से कोई जानकारी नहीं थी. हमें यह लग रहा था कि जमानत से पहले गवाही के लिए तो बुलाया ही जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. शनिवार को सबके सब बाहर भी आ गए. मैं और मेरा पूरा परिवार डरा हुआ है. मैं इस मामले में मुख्य गवाह भी हूं. ये लोग किसी न किसी तरह से मुझे भी नुकसान पहुंचा सकते हैं. घर में जैसे ही मालूम चला है कि आरोपियों को जमानत मिल गई है, सब डरे हुए हैं.’

मुनव्वर की ही तरह स्थानीय निवासी और हेरहंज प्रखंड के उप प्रमुख मो. जनाब अंसारी भी इस फैसले से चकित हैं. कैच से बातचीत में वे कहते हैं, ‘हमसब इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहे हैं कि इन्हें इतनी जल्दी जमानत मिल कैसे गई? किस आधार पर हाईकोर्ट ने इन्हें जमानत पर रिहा कर दिया?’

वहीं इस मामले में आरोपियों के वकील अरविंद नाथ शहदेव का मानना है कि पुलिस कोई ठोस सबूत या गवाह अदालत के सामने पेश नहीं कर पाई और इस आधार पर उनके मुवक्किलों को जमानत मिली है. अरविंद नाथ शहदेव बताते हैं, ‘इस केस में शुरू से ही कोई दम नहीं था.

मामले में एक भी चश्मदीद गवाह नहीं

एफआईआर के मुताबिक विनोद प्रजापति उन्हें मारने के लिए दौड़ता है लेकिन जब पुलिस ने जांच शुरू किया तो मालूम चला कि घटना के वक्त विनोद प्रजापति वहां था ही नहीं. दूसरी बात, इस मामले में एक भी चश्मदीद गवाह नहीं था. पुलिस ने मेरे मुवक्किलों को हिरासत में लिया और अपने मन मुताबिक बयान दिलवा लिया लेकिन पुलिस के सामने दिया गया बयान कोर्ट में नहीं ठहरता. फिर भी इन्हें जमानत मिलने में छह माह लग गया क्योंकि मामला चर्चित हो गया था.’

शनिवार को सब बाहर आ गए. मैं और मेरा पूरा परिवार डरा हुआ है. ये लोग मुझे किसी भी तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं

वहीं एक दूसरे स्थानीय वकील मोहन सिंह के मुताबिक बालुमाथ पुलिस ने इस केस को कमजोर कर दिया है. मोहन सिंह कहते हैं, ‘अदालत ने सभी आरोपियों को जमानत दी है क्योंकि पुलिस के द्वारा इनके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया. पुलिस ने इस मामले को इतना कमजोर कर दिया था कि इन्हें जमानत मिलनी ही थी. कोर्ट में वकील, पुलिस से मिलने वाले सबूत पर ही लड़ता है और अदालत भी अपना फैसला इसी आधार पर सुनाती है. बालुमाथ पुलिस ने इस मामले में जांच के नाम पर लीपापोती की है.’

बालूमाथ पुलिस पर लग रहे आरोप की तस्दीक के लिए कैच ने इस मामले के जांच अधिकारी और बालुमाथ नाथा प्रभारी अजय सिंह को फोन मिलाया. अजय सिंह का बालुमाथ से तबादला हो गया है और फिलहाल वो रांची में हैं लेकिन इस मामले में चार्ज शीट अजय सिंह ने ही दाखिल की थी. जब हमने उनसे सवाल किया कि हर तरफ से पुलिस की जांच पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो उन्होंने कहा, ‘देखिये यह कोर्ट का मैटर है. पुलिस ने अपनी तरफ से हर वो सबूत कोर्ट के सामने रखा जिससे इस केस को मजबूती मिल रही थी. हमने अपनी जांच में कहीं कोई लापरवाही नहीं की थी. अगर पुलिस की जांच इतनी ही कमजोर होती तो जिला अदालत उन्हें जमानत न दे देती. इन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली है और इसका मतलब है कि पुलिस ने अपनी जांच अच्छे से की है. कोर्ट किस आधार पर जमानत देती है ये उसका विषय है. पुलिस का नहीं.’

कोर्ट का अपना सच है. पुलिस की अपनी मजबूरी

इस पूरे मामले पर माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य और झारखंड प्रभारी वृंदा कारात का कहना है कि शाहबुद्दीन को मिली जामानत पर कलेजा पीटने वाले भाजपाई पहले बालुमाथ प्रकरण पर कुछ ठोस करें. जमशेदरपुर में मीडिया से बात करते हुए करात ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकारी वकील ने आरोपियों की जमानत याचिका का कोई खास विरोध नहीं किया. विरोध के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई और इस वजह से आरोपी घटना के छह माह के अंदर ही जेल से बाहर आ गए.

इस मामले से जुड़े हर व्यक्ति के अपने तर्क हैं. अपने बयान हैं. सबका मानना है कि वो जो कह रहे हैं वही सच्चाई है. कोर्ट का अपना सच है. पुलिस की अपनी मजबूरी है. पीड़ित परिवार की अपनी कहानी है और आरोपियों के अपने दावे हैं.

इन सब के बीच जो एक अकाट्य सत्य है वो यह कि मार्च महीनें में बालुमाथ के झाबर गांव में एक पेड़ पर दो लोगों को मारकर टांग दिया गया था. किसी ने तो दो उन्हें मारा होगा? कोई तो होगा जिसने उन लशों को उस पेड़ से लटकाया होगा? आखिर में सबसे अहम बात यह कि क्या कभी इन जिंदा सवालों के जवाब पीड़ित परिवारों को मिल पाएगा?

First published: 13 September 2016, 7:07 IST
 
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