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उत्तराखंड पर सुप्रीम कोर्ट ने कराई मोदी सरकार की 'जगहंसाई'

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 12 May 2016, 12:12 IST

न्यायपालिका को सलाम! फिर वह सर्वोच्च न्यायालय हो या उच्च न्यायालय. उत्तराखंड में सरकार के बहुमत के सवाल पर उनका निर्णय काबिल-ए-तारीफ है. इस निर्णय ने किसी एक राज्य या पार्टी की सरकार को नहीं बचाया, लोकतंत्र को बचाया है.

न्यायालय ने एक बार फिर यह साबित किया कर दिया है उसके लिए केंद्र की सरकार बड़ी है न राज्य की. और तो और इस मामले में एक बार तो उसने (नैनीतील हाईकोर्ट ने) देश के राष्ट्रपति  तक के लिए कह दिया कि वे भी गलत हो सकते हैं. बाद में जो हुआ, उससे सर्वोच्च न्यायालय में भी इस पर मुहर लगी.

न्यायालय ने एक बार फिर यह साबित किया कर दिया है उसके लिए केंद्र की सरकार बड़ी है न राज्य की

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने वाली 'मोदी सरकार' और उस पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रपति भी गलत साबित हुए. सरकार को तो जैसे थूक कर चाटना पड़ा. अपना ही आदेश वापस लेना पड़ा. वस्तुत: न्यायपालिका ने सभी को आईना दिखा दिया. और यह पहली बार नहीं हुआ. 

जब-जब संविधान पर हमले हुए हैं, वह उसके सामने ढाल बनकर खड़ी हुई है. धारा 356 के दुरुपयोग को लेकर बोम्मई मामला तो इसका उदाहरण है ही, अफसोस इस बात का है, भारतीय जनता पार्टी जो जनसंघ के समय से ही इसके दुरुपयोग को लेकर कांग्रेस पर हमलावर रही है. आज स्वयं इसका उपयोग कर रही है.

लगभग ऐसा ही कहानी अरुणाचल की है. मणिपुर बच गया, अन्यथा धारा 356 का एपिसोड वहां भी खेलने की पूरी तैयारी हो गई थी.

सर्वोच्च न्यायालय में बुधवार को जो हुआ, वह केवल राष्ट्रपति और केंद्र सरकार ही नहीं , उन तमाम राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए भी सबक है, जो जब-तब लोकतंत्र का चीरहरण करने की तैयारी में रहते हैं.

सबसे पहले बागी तो कांग्रेस के विधायक ही हुए. चाहे वह अरुणाचल हो या मणिपुर अथवा फिर उत्तराखंड

मामला इतना बड़ा होता ही नहीं यदि कांग्रेस अपना घर संभाल कर रखती. सबसे पहले बागी तो उसी के विधायक हुए. चाहे वह अरुणाचल हो या मणिपुर अथवा फिर उत्तराखंड. लोकतंत्र तो वहां भी कहां था. विधायकों की आवाज तो वहां भी नहीं सुनी गई. सुनी जाती तो शायद यह नौबत नहीं आती.

और भारतीय जनता पार्टी. उसे हर जगह फटे में पांव देने की क्या जरूरत है? यदि वह कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा करना ही चाहती है तो उसका सही मंच चुनाव का मैदान है. मतदाता ने मुहर लगाई तो लोकसभा में उसे 283 सीटें मिल गई. कांग्रेस की 44 रह गई. बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के नतीजे सबके सामने हैं. 

अगर अपना सपना पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जाएगी तो यही होगा जो बुधवार को हुआ! जगहंसाई! और पार्टी की ही नहीं केंद्र सरकार तक की. पार्टी पर हो रहे हमलों में प्रधानमंत्री भी घिर गए. आलोचकों को कहने का मौका मिल गया कि उन्हें नौसिखिये सलाहकारों-रणनीतिकारों से बचना होगा. नहीं तो वे उनकी भी इज्जत धूल में मिला देंगे.

अगर अपना सपना पूरा करने के लिए राजनीतिक दल किसी भी हद तक जाएंगे तो यही होगा जो बुधवार को हुआ

राजनीति, राजनीति होती है. उसमें सबका चाल, चरित्र और चेहरा एक सा होता है. कहीं कोई फर्क नहीं होता. इससे पहले कि देश के किसी अन्य राज्य में फिर उत्तराखंड जैसा राजनीतिक खेल खेला जाए, देश के तमाम राजनीतिक दलों को, चाहे वे सत्ता में हो या सत्ता से बाहर हों, कम से कम दो बातों पर सर्वसम्मति बना लेनी चाहिए.

पहली, कोई भी सांसद, विधायक या अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधि यदि अपना मूल बदलता है (अकेले या एक तिहाई) तो उसकी सदस्यता स्वत: ही तुरंत प्रभाव से समाप्त हो जाएगी. उसे नई पार्टी से, नए सिरे से चुनाव लड़ना होगा.

नम्बर दो संसद या विधानसभा में बहुमत का फैसला केवल और केवल सदन में ही होगा. ये दो कानून  बच गया. नहीं तो सुप्रीम कोर्ट को आए दिन ऐसे ही ‘अमृत मंथन’ करना पड़ेगा. लोकतंत्र को बचाने के लिए.

First published: 12 May 2016, 12:12 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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