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समान नागरिक संहिता पर कानून मंत्रालय ने लॉ कमीशन को लिखा खत

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 July 2016, 15:34 IST

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) के मुद्दे पर अहम कदम उठाया है. कानून मंत्रालय ने इस मामले में लॉ कमीशन को चिट्ठी लिखी है. गौरतलब है कि समान नागरिक संहिता बीजेपी के सबसे अहम मुद्दों में से एक रहा है.

केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री सदानंद गौड़ा का कहना है कि इस बारे में उन्होंने लॉ कमीशन को एक चिट्ठी लिखी है. जिसमें इसको लागू करने के तरीके के बारे में जानकारी मांगी गई है.

लागू करने का तरीका पूछा

ऐसा पहली बार है जब किसी सरकार ने न्यायिक सुधार की दिशा में विधि आयोग से सलाह मांगी है. लंबे अरसे से यह मुद्दा गर्मागर्म राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है. ऐसे में कानून मंत्रालय की इस पहल ने नई चर्चा को जन्म दिया है.

कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने कहा, "यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे पर विधि आयोग को मैंने एक चिट्ठी लिखी है. बीजेपी का यह पुराना मुद्दा रहा है. हम सभी पक्षों से इस मामले में चर्चा कर रहे हैं. आयोग से इसे लागू करने का तरीका पूछा गया है."

साथ ही कानून मंत्री सदानंद गौड़ा का कहना है कि कई बार संसद में यह मसला उठ चुका है. लिहाजा इस मुद्दे पर सभी पक्षों से सहमति बनाने की कोशिश जारी है.

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भारतीय जनता पार्टी हमेशा से समान नागरिक संहिता के पक्ष में रही है. जबकि कांग्रेस इसका विरोध करती रही है. 

'मुद्दे पर बहस की जरूरत'

इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता डी राजा ने कहा है कि इस मुद्दे पर बहस होनी चाहिए. राजा ने कहा कि सभी धर्मों में महिला हितों पर ध्यान देने की जरूरत है.

इस बीच कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. संदीप दीक्षित ने कहा, "समान नागरिक संहिता के सभी पहलुओं पर चर्चा होनी चाहिए. यूनिफॉर्म सिविल कोड का स्वागत है."

लॉ कमीशन से मांगी रिपोर्ट

समान नागरिक संहिता का मतलब सभी धर्मों और समुदायों के लिए पूरे देश में एक कानून है. मिसाल के तौर पर कुछ मुद्दे हिंदू और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आते हैं. पर्सनल लॉ के तहत संपत्ति, शादी, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े हुए कई मामले आते हैं.

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर देश में लंबे अरसे राजनैतिक बहस चल रही है. कई बार इसे धर्मनिरपेक्षता की बहस से भी जोड़ दिया जाता है. कानून मंत्रालय ने विधि आयोग से इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. 

कानून मंत्रालय के विधि मामलों से जुड़े विभाग ने लॉ कमीशन को लिखी चिट्ठी में कहा है कि वह यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे की जांच-परख करने के बाद एक रिपोर्ट सौंपे. कानून मंत्रालय ने इस सिलसिले में समान नागरिक संहिता से जुड़े कुछ मामले और चर्चा के दस्तावेज भी आयोग को भेजे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बलबीर सिंह चौहान विधि आयोग के अध्यक्ष हैं. माना जा रहा है कि विशेषज्ञों से सलाह के बाद इस मामले में रिपोर्ट सौंपी जाएगी. संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के तहत आर्टिकल 44 में समान नागरिक संहिता पर अमल के लिए राज्य की जिम्मेदारियों का जिक्र है.

1985 में शाह बानो केस पर उठे विवाद के बाद देश में समान नागरिक संहिता पर नई बहस छिड़ गई थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पर्सनल लॉ में भी समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए. 

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

'तीन तलाक' के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा है कि कोर्ट यह तय करेगा कि अदालत किस हद तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है और क्या उसके कुछ प्रावधानों से नागरिकों को संविधान द्वारा मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है.

कोर्ट ने केंद्र समेत सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए 12 हफ्तों का समय दिया है. कोर्ट ने संकेत दिया है कि अगर जरूरी लगा तो मामले को बड़ी बेंच को भेजा जा सकता है.

हाल ही में 'तीन तलाक' के मुद्दे पर  चार अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर टीवी पर हो रही बहस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.

याचिककर्ता फरहा फैज ने अदालत में दलील दी थी कि रमजान के पवित्र महीने में मुस्लिम उलेमा, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन मुस्लिम समाज को भ्रम में डालने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा याचिकाकर्ताओं के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश हो रही है.  

शायरा बानो की याचिका

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 'तीन तलाक' की वकालत की है. बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह संसद का बनाया कानून नहीं है.

मार्च महीने में शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी.

First published: 1 July 2016, 15:34 IST
 
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