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लेफ्ट को केरल, बंगाल चुनाव में कन्हैया के इस्तेमाल के लालच से बचना चाहिए

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार टीवी चैनलों पर बिना किसी विज्ञापन ब्रेक के सीधे प्रसारण द्वारा देश को संबोधित करने वाले पहले छात्र नेता बन गए हैं.

देश के विभिन्न समाचार चैनलों ने जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद उनके भाषण का बिना ब्रेक सीधा प्रसारण किया. उनसे पहले सिर्फ देश के मौजूदा प्रधानमंत्री ही 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह की विशेष सुविधा का आनंद लेने में कामयाब रहे हैं.

इस बार अच्छी बात यह रही कि किसी मीडिया पर, कोई विशेष राजनीतिक एजेंडा बढ़ाने का आरोप भी नहीं लगा. यह सिर्फ एक अच्छी कवरेज का नमूना था, इसके बावजूद अगर किसी के मन में कोई संशय था तो कन्हैया के इस भाषण को सोशल मीडिया पर मिली प्रतिक्रियाओं ने उसे सिरे से खारिज कर दिया.

भारत में मरणासन्न वाम दलों को कन्हैया कुमार के रूप में एक नया सितारा मिल गया है

विभिन्न जटिल विषयों को लेकर उनकी अभिव्यक्ति वामपंथी शब्दजाल और तुच्छता से परे रही. उन्होंने बोलने के लिये छात्र राजनीति से इतर विषयों को चुना. उन्होंने अपने भाषण के दौरान बताया कि तिहाड़ जेल में रहने के दौरान खाना परोसने के लिये इस्तेमाल होने वाली नीली और लाल रंग की कटोरियों को देखकर उनके मन में वाम-मोर्चे और दलित नेतृत्व के बीच गठबंधन करने का विचार आया.

उन्होंने मोदी द्वारा किये गए चुनावी वादों की तुलना सड़क किनारे अंगूठियां बेचने वालों के साथ करते हुए उन्हें खारिज किया और कहा कि ये वादे बिल्कुल ऐसे ही थे जैसे ये अंगूठी खरीदने पर आपके जीवन की तमाम परेशानियों के जादुई हल का दिलासा देते हैं.

वाम दलों का नया चेहरा


निश्चित ही भारत में मरणासन्न वाम दलों को कन्हैया कुमार के रूप में एक नया सितारा मिल गया है. लेकिन क्या कन्हैया का उभार वास्तव में भारतीय राजनीति को प्रभावित करने में कामयाब रहेगा?

अंग्रेजी बोलने वाला और लोगों की राय बनाने वाला तबका तो ऐसा ही सोच रहा है. उसे इस बात का पूरा भरोसा है कि एक ही शाम में देश के पांच राष्ट्रीय सामाचार चैनलों पर कन्हैया कुमार के भाषण और साक्षात्कारों का प्रसारण भारतीयों की राजनीति को लेकर बदलती हुई मानसिकता का संकेत है.

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कुछ लोगों को यह भी मानना है कि कन्हैया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचाने में सफल रहे हैं.

वाम दलों के उत्साह को आसानी से समझा जा सकता है. सीपीआई (एम) ने बिना समय गंवाए इस बात की घोषणा कर दी कि सीपीआई की छात्र शाखा के सदस्य कन्हैया पश्चिम बंगाल और केरल के आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिये प्रचार भी करेंगे.

बीते दौर में जेएनयू को कई छात्रसंघ अध्यक्ष और पदाधिकारी देने वाली सीपीआई (एम) वर्तमान में जेएनयू की छात्र राजनीति में हाशिये पर है. यहां तक कि पार्टी के वर्तमान महासचिव सीताराम येचुरी ने भी जेएनयू से ही राजनीति का ककहरा सीखा था.

लेकिन क्या वाम दल कन्हैया द्वारा प्रस्तावित वाम और दलित राजनीतिक इकाइयों के गठबंधन की योजना को स्वीकार कर पाएंगे?

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संसदीय प्रक्रिया में सक्रिय वामपंथी दलों ने अपने संगठनात्मक ढांचे को इस तरह से विकसित ही नहीं किया कि जिसमें दलित नेताओं को उच्च नेतृत्व वाले स्थानों तक पहुंचने के मौके मिलें.

वाम दलों में शीर्ष स्तर तक पहुंचने वाले नेताओं में एक दर्जन दलित नेताओं के नाम तलाशना बेहद मुश्किल है चाहे बात राष्ट्रीय स्तर पर की जाए या फिर पश्चिम बंगाल या केरल की.

सीपीआई (एम) की स्थापना के बाद से अब तक कोई दलित पोलित ब्यूरो का सदस्य नहीं बना है और यहां तक कि उनके तमाम महासचिव भी हमेशा कथित ऊंची जातियों से ही आए हैं.

अब तक बने पांच महासचिवों में से तीन ब्राह्मण रहे हैं. सीपीआई में भी सिर्फ डी राजा के रूप में एक दलित राष्ट्रीय महासचिव हैं. यहां तक कि अति-वामपंथी समूहों में भी दलितों को शीर्ष नेतृत्व के लायक न समझते हुए सिर्फ झंडे उठाने और नारे लगाने वाला समझा जाता है.

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अगर वामपंथी दल अक्लमंद होंगे तो वे कन्हैया कुमार के माध्यम से इस मिथक को तोड़ने का प्रयास करेंगे. उन्हें कन्हैया को अभी कुछ और वर्षों के लिये छात्र राजनीति में ही पकने देना चाहिये.

उसे पश्चिम बंगाल या केरल ले जाने के बजाय सामाजिक न्याय के लिये बनी ज्वाइंट एक्शन कमेटी के समस्य के रूप मे देश के अधिक से अधिक विश्वविद्यालयों के परिसरों का दौरा करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये.

विश्वविद्यालयों के छात्र उसका चुनाव क्षेत्र हैं. वे वाम दलों, सामजिक (बिना-पार्टी) वामपंथियों, उदारवादियों, मुसलमानों और दलितों के बीच एक संभावित विस्तृत गठबंधन का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. और ऐसा तभी हो सकता है जब सीपीआई (एम) अपने पक्षपातपूर्ण हितों से ऊपर उठे और उन्हें देश में सिर उठा रही सांप्रदायिक विघटनकारी शक्तियों के खिलाफ युवाओं के बीच अलख जगाने की आजादी दे.

केवल उसी स्थिति में देश को सांप्रदायिक ताकतों से दूर रखने और सही मायनों में एक धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखने वाले कन्हैया के राजनीतिक पटल पर उद्गम का फायदा उठाने में सफल होंगे.

जेएनयू मामले से बीजेपी को कोई फायदा नहीं हुआ


बीजेपी भी जेएनयू प्रकरण से कुछ हासिल करने में नाकामयाब ही रही है. फायदा होने के बजाय उसे भी नुकसान होता ही प्रतीत हो रहा है. पार्टी का समर्थन करने वाला शहरी मध्यम वर्ग, जो सुशासन और अर्थिक विकास की उम्मीद लिये बीजेपी के पक्ष में खड़ा था, यह प्रकरण उनके बीच बेचैनी लेकर आया है.

उन्हें अब यह समझ में आने लगा है कि अर्थिक तरक्की पाने के लिये टकराव की राजनीति से दूर रहने वाला शांत समाज बेहद जरूरी है. वे लोग बीते लगभग डेढ़ दशक से बीजेपी के साथ खड़े हैं लेकिन अबतक वे स्वयं को हिंदुत्व का झंडा थामने वाली इस पार्टी के साथ जोड़ पाने में असफल रहे हैं.

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लोगों का बीजेपी से मोहभंग इसलिये भी हो रहा है क्योंकि उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि संसद में बहुमत हासिल करने के बावजूद क्यों यह पार्टी लगातार विपक्षियों के साथ टकराव में लगी हुई है और स्वयं ही फालतू के विवादों को न्यौता देती आ रही है.

अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मोदी से उनका मोहभंग हो जाएगा क्योंकि उनकी राजनीति लोगों की आकांक्षाओं और उम्मीदों को पूरा करने में नाकाम ही साबित हो रही है.

बीजेपी और एबीवीपी द्वारा विश्वविद्यालयों में की जा रही गड़बडि़यों से केवल वाम दल फायदा उठा सकते हैं

बीजेपी के साथ एक समस्या यह भी है कि वह अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भी खुश करने में नाकामयाब ही रही है. एक हद तक आरएसएस इस बात से प्रसन्न है कि बीजेपी सरकार उसके एजेंडे को संस्थागत रूप से फैलाने का काम कर रही है. तमाम शैक्षिक संस्थानों, संस्कृतिक निकायों और यहां तक सरकार में मंत्रियों तक की नियुक्तियां आरएसएस की मर्जी के मुताबिक की जा रही हैं.

तो फिर बीजेपी अपने ही संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा देशभर के विश्वविद्यालयों में पैदा किए जा रहे टकराव के दम पर क्या हासिल करना चाह रही है?

दलित छात्रों के साथ टकराव का माहौल बना कर देश के सबसे वंचित तबके (दलितों) को भाजपा के खिलाफ खड़ा करने वाली एबीवीपी खुद भी हैदराबाद विश्वविद्यालय में अलग-थलग पड़ गई है. उनका यह विरोधी रुख आरएसएस के दलित शोषण और अस्पृश्यता के घोषित सिद्धांतों के भी विपरीत है.

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जेएनयू की स्थितियां भी इससे कुछ अलग नहीं हैं जहां एक चुने हुए छात्र नेता कन्हैया कुमार पर सत्ता की ताकत के सहारे काबू करने की कोशिश में एबीवीपी बिल्कुल हाशिये पर पहुंच गई है. एबीवीपी की जेएनयू इकाई सरकार के तरीकों से असहमति जताते हुए पहले ही दो धड़ों में बंट चुकी है.

अगर अपने टकराव वाले रवैये के चलते एबीवीपी हाशिये पर चला गया है तो बीजेपी को भी कुछ हासिल नहीं हुआ है. मोदी सरकार ने जिस प्रकार से स्थितियों को बिगाड़ने वाले मंत्रियों (स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तत्रेय) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है उसने परिस्थितियों को और अधिक जटिल बना दिया है.

जाहिर है इस मामले में बीजेपी ने छोटी सी चोट को नासूर बनने दिया.

कांग्रेस भी घाटे में ही रही है


क्या हैदराबाद और दिल्ली के छात्रों के साथ खड़े होकर कांग्रेस कुछ हासिल करने में कामयाब रही है? ऐसा नहीं है.

हो सकता है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय जाकर और जेएनयू में छात्रों को संबोधित करके नैतिक रूप से एक अच्छा कदम उठाया हो.

हालांकि यह अभी तक अस्पष्ट है कि छात्र राजनीति में उनकी यह सक्रियता पार्टी की व्यापक राजनीति के लिये कितनी फायदेमंद साबित होगी. वे एक मुद्दे को छोड़़कर दूसरे पर पहुंच जाते हैं और कोई भी उनके मन की बात को पढ़ने में सफल नहीं हो पा रहा है.

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कांग्रेस पार्टी का वामपंथियों का पिछलग्गू दिखना कोई शुभ संकेत नहीं है. कांग्रेस एक केंद्रीय राजनीतिक दल है और अगर वह वामपंथी दलों के रास्ते पर चलने का प्रयास करता है तो शहरी क्षेत्र के उसके समर्थकों के छिटकने संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाएंगी.

ऐसा आगामी पश्चिम बंगाल के चुनावों में भी होने की पूरी संभावना है जहां पार्टी ने वाम दलों के साथ गठबंधन किया है और युवा गांधी को चुनावों के दौरान वामपंथी नेताओं के साथ मंच साझा करते देखा जा सकता है.

कुल मिलाकर बीजेपी और एबीवीपी द्वारा विश्वविद्यालयों में की जा रही गड़बडि़यों से अगर कोई राजनीतिक फायदा उठा सकता है तो वह वाम दल हैं. लेकिन ऐसा करने के लिये इन्हें अधिक दूरदर्शी और होशियार होना होगा और पश्चिम बंगाल और केरल के आगामी चुनावों में प्रचार के लिये कन्हैया कुमार के राजनीतिक कौशल को बर्बाद करने से बचना होगा.

First published: 10 March 2016, 10:55 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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