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2016 में अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार से बड़ी उम्मीदें

नीरज ठाकुर | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • जीएसटी पर विश्लेषकों का कहना है कि विपक्षी दलों को भी इसे पारित कराना होगा क्योंकि \'उदारवादी समाचारपत्र और बुद्धिजीवियों ने भी इस बिल को पास नहीं किए जाने की आलोचना शुरू कर दी है.\'
  • अधिक ब्याज दर की वजह से पूंजी निर्माण बहुत महंगा हो गया है और इस वजह से भारतीय कंपनियां निवेश से कतरा रही हैं. खाद्य महंगाई कम होने की वजह से उन्हें लगता है कि \'आरबीआई जल्द ही ब्याज दरों में कटौती का फैसला लेगी.\'

क्या भारत की अर्थव्यवस्था अभी तक झंझावात से बाहर नहीं निकल पाई है? वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार अभी तक हमें ऐसा भरोसा नहीं दिला पाई है. सरकार का दावा है कि भारत की जीडीपी 7 फीसदी से भी तेज गति से बढ़ रही है जो दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है.

हालांकि सरकार के दावे को कई अर्थशास्त्री पचा नहीं पा रहे हैं. उन्होंने कई आर्थिक संकेतों के हवाले से आर्थिक वृद्धि पर सवाल उठाए है. जून-सितंबर तिमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 2.2 फीसदी रही जबकि इस दौरान जबरदस्त सूखे की हालत रही. 

अगर निर्यात में गिरावट जारी है तो इससे जुड़े ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में मामूली ग्रोथ कहां से आई? अगर कर्ज उठान में गिरावट है तो फिर भारत की अर्थव्यवस्था कैसे चीन को पीछे छोड़कर आगे निकल सकती है? सरकार के लिए यह कठिन सवाल हैं. खासरकर उस सरकार के लिए जिसे अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए जबर्दस्त जनादेश मिला है. शायद इस साल अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ और नीतियां सामने आएंगी जिससे स्थिति साफ होने में मदद मिलेगी. अर्थशास्त्रियों को भी ऐसी ही उम्मीदें हैं.

स्पष्ट नीति निश्चित तौर पर बेहतर शुरुआत होगी. इंडस्ट्री के सुस्त रवैये को देखते हुए किसी ठोस और स्पष्ट नीति से अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में मदद मिलेगी. ऐसे में यह सवाल उठ सकता है कि वह नई नीतियां कैसी होंगी? कैच ने इस मसले पर देश के कुछ मशहूर अर्थशास्त्रियों  से बात की जो 2016 में कुछ ऐसी नीतियां देखना चाहते हैं.

सुरजीत भल्ला, चेयरमैन, ऑक्सस इनवेस्टमेंट्स

S Bhalla

  1. श्रम कानूनों में बदलाव
  2. गुड्स एंड सर्विस टैक्स
  3. बैंकरप्सी एंड इनसॉल्वेंसी लॉ
  4. ब्याज दरों में कटौती

भल्ला का कहना है कि मौजूदा श्रम कानूनों की वजह से देश की संभावनाओं का अपेक्षित तरीके से दोहन नहीं हो पा रहा है. उन्होंने कहा, 'अगर आप देखेंगे कि किस वजह से भारत पिछड़ रहा है तो आपको इसकी जड़ में श्रम कानून दिखाई देगा. नियुक्तियां और नौकरी से निकाले जाने पर लगे प्रतिबंध की वजह से उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है.'

हालांकि केंद्र सरकार ने अभी तक राज्यों को छूट दे रखी है ताकि वह कंपनियों को उनके मुताबिक छूट मुहैया करा सकें.

श्रम बाजार की वजह से भारत दुनिया में पिछड़ रहा है. हायरिंग और फायरिंग पर रोक से कंपनियाें का कारोबार प्रभावित हो रहा है

बैंकरप्सी एंड इनसॉल्वेंसी कोड को पिछले साल शीतकालीन सत्र में पेश किया था और इसे जल्द से जल्द पारित किया जाना चाहिए. भल्ला कहते हैं, 'बैंकरप्सी कानून नहीं होने की वजह से बिजनेस में परेशानी हो रही है क्योंकि निवेशकों के पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है.'

जीएसटी को लेकर भल्ला का कहना है कि विपक्षी दलों को भी इसे पारित कराना होगा क्योंकि 'उदारवादी समाचारपत्र और बुद्धिजीवियों ने भी इस बिल को पास नहीं किए जाने की आलोचना शुरू कर दी है.'

अधिक ब्याज दर की वजह से पूंजी निर्माण बहुत महंगा हो गया है और इस वजह से भारतीय कंपनियां निवेश से कतरा रही हैं. खाद्य महंगाई कम होने की वजह से उन्हें लगता है कि 'आरबीआई जल्द ही ब्याज दरों में कटौती का फैसला लेगा.'

अभिजीत सेन, पूर्व योजना आयोग के सदस्य

Abhijit sen

  1. आर्थिक संघवाद
  2. कॉरपोरेट को कर्ज चुकाने के लिए नहीं मिले बेलआउट

सेन के मुताबिक भारत जैसी अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए आर्थिक संघवाद का होना बेहद जरूरी है. योजना आयोग यही काम करता था. उसकी कोशिश केंद्र और राज्यों के बीच आर्थिक मामलों को लेकर सामंजस्य बनाने की थी.

सेन बताते हैं कि योजना आयोग को खत्म कर जिस नीति आयोग का निर्माण किया गया है वह इस मकसद को पूरा करने में असफल रही है. 

सेन ने कहा, 'उन्होंने योजना आयोग को खत्म कर दिया जिसकी भूमिका राज्यों की अर्थव्यस्था के मामले में केंद्र सरकार को सलाह देने की थी. मौजूदा सरकार संघवाद के बारे में बात तो बहुत करती है लेकिन उसने इस मोर्चे पर काम बेहद कम किया है.'

उन्होंने कहा, 'हालांकि वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटे और राज्यों से होने वाले कर संग्रह के बारे में सुनता है लेकिन यह वास्तविक अर्थव्यवस्था नहीं है. हमें उस खाई को भरने की जरूरत है.'

कॉरपोरेट सेक्टर पर भारी कर्ज को देखते हुए सेन ने कहा कि कई लोगों को यह उम्मीद है कि सरकार या तो उनके कर्ज को माफ करेगी या फिर ब्याज दरों में कमी कर कंपनियों को राहत देगी. उन्होंने कहा, 'आदर्श स्थिति तो यह भी है कि कंपनियों को बेल आउट दिया ही न जाए.'

योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन कंपनियों को बेल आउट देने के पूरी तरह से खिलाफ हैं

 सेन ने कहा, 'ऐसी स्थिति में कुछ कंपनियों को नुकसान होगा लेकिन सरकार को अर्थव्यवस्था में निवेश को लेकर काम करना चाहिए न कि कॉरपोरेट को बेलआउट देने का काम करना चाहिए.' उन्होंने कहा कि यह न केवल आर्थिक रूप से अच्छा होगा बलिक इससे राजनीतिक फायदा भी होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि कर्ज केवल इंडस्ट्री के लिए ही समस्या नहीं है बल्कि यह किसानों से भी जुड़ा मामला है क्योंकि उन्हें लगता है कि देश में किसानों के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा है.

सेन बताते हैं, 'मैं यह मानता हूं कि आरबीआई ब्याज दरों को बेहतर तरीके से मैनेज कर रही है और सरकार को दरों में कृत्रिम तरीके से कटौती नहीं करनी चाहिए.'

अशोक गुलाटी, पूर्व चेयरमैन, सीएसीपी

Ashok Gulati

ग्रामीण मांग में सुधार

  1. फसल बीमा की शुरुआत
  2. खाद्य और उवर्रक सब्सिडी में सुधार

गुलाटी बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने का मूलमंत्र ग्रामीण भारत की स्थिति में होने वाले सुधार में छिपा हुआ है. उन्होंने कहा, 'यह साल चुनौती भरा होगा क्योंकि दो सालों के दौरान किसानों को बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा है. ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक उत्पाद की मांग में कमी आई है.' 

गुलाटी बताते हैं, 'यह आपको समझना होगा कि मेक इन इंडिया की सफलता भी ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली मांग पर निर्भर करती है.' उन्होंने कहा कि पांच साल पहले औद्योगिक उत्पादों की मांग ग्रामीण बाजार से निकल कर आती थी. 

आज ट्रैक्टर की मांग में 23 फीसदी की कमी आई है. आज कितने शहरी लोग कारों की खरीदारी करते हैं? वह 10 कार नहीं खरीद सकते. इसलिए सरकार के पास सबसे बड़ी जिम्मेदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करने की है क्योंकि इससे औद्योगिक क्षेत्र का वास्तविक विकास होगा.

गुलाटी ने कहा कि सरकार की किसानों को मुआवजा देने की नीति ठीक नहीं है. उन्होंने कहा, 'राज्यों को दिया जाना वाला पैसा फसलों की हुई बर्बादी के वैज्ञानिक आकलन पर आधारित नहीं होता बल्कि यह केंद्र सरकार के विवेकाधिकार का मामला होता है. इसके अलावा मुआवाज वितरित करने में भी काफी लंबा समय लगता है.'

वहीं उनका मानना है कि खाद्य और उवर्रक सब्सिडी में कटौती की जानी चाहिए. उन्होंने कहा, 'फिलहाल सरकार सब्सिडी पर ज्यादा खर्च करती है और इस वजह से उसके पास कृषि क्षेत्र में निवेश के लिए पैसा नहीं रह जाता.'

डी के जोशी, मुख्य अर्थशास्त्री क्रिसिल

  1. उदय और इंद्रधनुष जैसी योजनाएं लागू हो
  2. जीएसटी

जोशी के मुताबिक 2016 मोदी सरकार के लिए सबसे अहम होगा. उन्होंने कहा, 'यह एकमात्र साल होगा जब हम आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा पाएंगे. इसके बाद सरकार लोकलुभावन नीतियों को लागू करेगी.' जोशी कहते हैं कि सरकार को जल्द से जल्द जीएसटी लागू करना चाहिए. और जब तक यह रुका हुआ है तब तक सरकार को उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना या उदय और इंद्रधनुष योजनाओं को लागू करना चाहिए.

उदय की मदद से बिजली वितरण कंपनियों को बेल आउट दिया जाएगा वहीं इंद्रधनुष से पीएसयू बैंकों का कायाकल्प होगा

जोशी ने कहा, 'सरकार को इन योजनाओं को जल्द लागू करना चाहिए क्योंकि इसके लिए संसद की सहमति की जरूरत नहीं.' साफ तौर पर मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 2016 में काफी कुछ करने की जरूरत होगी.

First published: 3 January 2016, 10:32 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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