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हरियाणा राज्यसभा चुनाव: यह बगावत का हुड्डा स्टाइल है

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 15 June 2016, 13:58 IST

बात 2004 की है जब कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता भजनलाल के नेतृत्व में हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ा. 90 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को रिकॉर्डतोड़ 67 सीटें मिली. उस समय अधिकतर विधायक भजनलाल के साथ थे, लेकिन गांधी परिवार से नजदीकी के चलते कांग्रेस हाईकमान ने भजनलाल की जगह भूपिंदर सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री को बना दिया.

इसके बाद राज्य में कांग्रेस दस सालों तक सत्ता में रही और हुड्डा के विरोधियों की संख्या भी लगातार बढ़ती रही. 2004 में राज्य की कमान संभालने वाले हुड्डा अक्सर संगठन में गुटबाजी और अपने विरोधियों के चलते सुर्खियों में रहे.

हुड्डा को लेकर ताजा विवाद राज्यसभा चुनाव में बीजेेपी समर्थित उम्मीदवार सुभाष चंद्रा के जीतने से हुआ. हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के 15 विधायक हैं. शनिवार को राज्यसभा के मतदान में 14 कांग्रेस विधायकों के वोट को निरस्त कर दिया गया. इस वजह से इंडियन नेशनल लोकदल (आईएलएनडी) के उम्मीदवार आरके आनंद को हार का सामना करना पड़ा.

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इस घटना से कांग्रेस की अंदरूनी कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई. कांग्रेस हाईकमान ने सभी विधायकों को आरके आनंद का समर्थन करने के लिए कहा था. कांग्रेस के ही कुछ सदस्य और आईएलएनडी नेता दुष्यंत चौटाला ने आरोप लगाया है कि हुड्डा समर्थक विधायकों ने जानबूझकर गलत वोटिंग की है.

हुड्डा अक्सर संगठन में गुटबाजी और अपने विरोधियों के चलते सुर्खियों में रहते हैं

चौटाला ने एक निजी चैनल से बातचीत में कहा कि हाल में ही हुड्डा के खिलाफ सीबीआइ ने पंचकूला में औद्योगिक भूखंडों के आबंटन में कथित अनियमितता के लिए एक मामला दर्ज किया है. आपको बता दें कि उस समय हुड्डा हरियाणा शहरी विकास प्राधिकार (हुडा) के अध्यक्ष थे. चौटाला के अनुसार सीबीआई के दबाव के चलते हुड्डा बीजेपी के आगे झुक गए.

कांग्रेस के एक नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया दरअसल लड़ाई हरियाणा में जाटों का नेता बनने को लेकर है. राव इंद्रजीत सिंह और बीरेंद्र सिंह के बीजेपी में चले जाने के बाद कांग्रेस में सिर्फ हुड्डा ही जाटों के सर्वमान्य नेता हैं.

आईएलएनडी शुरू से जाटों की राजनीति करती रही है. रोहतक संसदीय क्षेत्र से हुड्डा आईएनएलडी के संस्थापक और पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल को हरा चुके हैं. अभी पार्टी के शीर्ष नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला तिहाड़ जेल में बंद हैं. ऐसे में हुड्डा आईएलएनडी के उम्मीदवार का समर्थन करके खुद को आईएलएनडी और चौटाला परिवार के नजदीक नहीं दिखाना चाहते थे.

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इसके अलावा भी वोटिंग के दिन हुई घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि हुड्डा समर्थकों ने रणनीति के तहत 'जानबूझकर' गलत वोटिंग की. कांग्रेस से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि वोटिंग के दिन सारे कांग्रेस विधायक एक साथ मतदान करने सदन में पहुंचे और दो घंटे के बाद एक साथ ही निकल गए.

दूसरी ओर कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि हुड्डा ने अपना बैलेट पेपर खाली छोड़ दिया था. यह सोचने वाली बात है कि हुड्डा दशकों से राजनीति में हैं और दस साल तक राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं. उनके साथ कई कांग्रेसी विधायक भी सालों से राजनीति में रहे हैं. बावजूद इसके उनलोगों ने गलत पेन का इस्तेमाल क्यों किया, इस पर सवाल उठना लाजिमी है. दूसरी ओर बीजेपी के कई विधायक पहली बार चुने गए हैं और उनमें से किसी का वोट अयोग्य करार नहीं दिया गया.

आईएलएनडी के उम्मीदवार का समर्थन करके हुड्डा खुद को आईएलएनडी और चौटाला परिवार के नजदीक नहीं दिखाना चाहते थे

दिल्ली कांग्रेस के एक शीर्ष नेता के अनुसार हरियाणा कांग्रेस में भी बगावत के आसार हैं. फरवरी, 2014 में जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी अशोक तंवर को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो उस समय राजनीतिक जानकारों ने कहा कि यह हुड्डा के कद को कम करने की कोशिश थी.

पिछले ढाई सालों में कई ऐसे मौके आए जब सार्वजनिक तौर पर हुड्डा और तंवर एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करते दिखे. इसके अलावा कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा और पूर्व बिजली मंत्री अजय यादव से भी हुड्डा की नहीं बनती है.

कहा जा रहा है कि पार्टी में अपनी अनदेखी के चलते हुड्डा बगावती तेवर अपना सकते हैं. पिछले महीने ही हुड्डा के समर्थक विधायकों ने राहुल गांधी के मिलकर अशोक तंवर और किरण चौधरी पर गुटबाजी और अनदेखी का आरोप लगाया है.

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इन विधायकों ने राहुल से कहा कि जब सीबीआई ने हुड्डा के खिलाफ केस दर्ज किया तो प्रदेश कांग्रेस इकाई ने कोई बड़ा विरोध नहीं किया. इन विधायकों ने कहा कि किरण चौधरी भले ही विधायक दल की नेता हैं, लेकिन 12 विधायक पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ हैं. हालांकि, राहुल ने विधायकों की बातों कोई खास तवज्जो नहीं दी.

हुड्डा के बारे में माना जाता है कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों को नहीं भूलते. हुड्डा के चलते ही हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल को 2007 में कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. इसके बाद भजनलाल ने हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) का गठन किया था. इसके अलावा लोकसभा चुनाव 2014 के बाद चौधरी वीरेंद्र सिंह को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. विधानसभा चुनाव 2014 के पहले पूर्व बिजली मंत्री अजय यादव ने हुड्डा पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

इन दिग्गजों के जाने से कांग्रेस को हरियाणा में खासी नुकसान उठाना पड़ा है. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने हरियाणा में लोकसभा की नौ सीटें जीती थी. परिणाम से उत्साहित होकर हुड्डा ने छह महीने पहले ही विधानसभा चुनाव करने की घोषणा कर दी. लेकिन 2009 के विधानसभा में भजनलाल की पार्टी हजकां ने हुड्डा का खेल बिगाड़ दिया और पार्टी को सिर्फ 40 सीटों पर संतोष करना पड़ा. पार्टी बहुमत से दूर गई.

उस समय भी चौधरी बीरेंद्र सिंह और कुमारी शैलजा हुड्डा के विरोध में थे, लेकिन हाईकमान ने दूसरी बार हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया. लोकसभा चुनाव से पहले राव इंद्रजीत सिंह और लोकसभा चुनाव के बाद चौधरी बीरेंद्र सिंह ने हुड्डा के चलते कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी के पाले में चले गए. इन दोनों के जाने से कांग्रेस को पिछले विधानसभा में करारी हार झेलनी पड़ी. कांग्रेस राज्य में 15 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर खिसक गई.

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लगातार मिली चुनावी हार और सीबीआई जांच का बढ़ता शिकंजा हुड्डा के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहा है. माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में हुड्डा ने हाईकमान और विरोधी गुट के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन किया है.

हुड्डा भी कई कारणों से पार्टी से नाराज चल रहे हैं. अप्रैल महीने में भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई ने अपनी पार्टी हजकां का विलय कांग्रेस में कर दिया गया. विश्नोई गैर जाट नेता हैं और वे भी हुड्डा के विरोधी माने जाते हैं. जब दस जनपथ में विलय की प्रक्रिया चल रही थी तो हरियाणा कांग्रेस के शीर्ष नेता वहां मौजूद थे लेकिन हुड्डा नहीं गए. हुड्डा की गैर मौजूदगी पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जवाब देना पड़ा.

भूपिंदर सिंह हुड्डा भी कई कारणों से पार्टी से नाराज चल रहे हैं

पिछले महीने हुड्डा ने इनेलो के पूर्व विधायकों अशोक कश्यप और बीएल सैनी को कांग्रेस ज्वाइन कराया था, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष तंवर ने उस पर सवाल उठा दिया. तंवर का कहना है कि पार्टी अध्यक्ष की मंजूरी के बिना ज्वाइनिंग नहीं हो सकती. दोनों पूर्व विधायकों की ज्वाइनिंग का तरीका सही नहीं है.

इसके अलावा पिछले साल दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में हुई किसान रैली में तंवर और हुड्डा के बीच विवाद देखा जा चुका है. हुड्डा समर्थक जहां गुलाबी रंग की पगड़ी में नजर आए, वहीं हुड्डा विरोधी खेमे ने लाल रंग की पगड़ी पहने हुए थे.

इन घटनाओं से कयास लग रहे हैं कि अजीत जोगी और गुरुदास कामत की तरह हुड्डा भी जल्द कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार हुड्डा के सामने नई पार्टी बनाने का विकल्प है. हरियाणा के कई वरिष्ठ नेता पहले भी ऐसा कर चुके हैं.

कांग्रेस की राजनीति को नजदीक से देखने से एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि जब भी कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर होती है, तो राज्यों के क्षत्रप कांग्रेस हाईकमान के फैसले को मानने से इनकार करते रहे हैं. उनके अनुसार कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है जिसके चलते कई वरिष्ठ नेता अपनी भूमिका को लेकर परेशान हैं. ऐसा ही 1997 में हो चुका है, जब सोनिया गांधी कांग्रेस का नेतृत्व संभालने जा रही थी. उस समय भी कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दिया था.

कुछ दिनों पहले ही पार्टी छोड़ने के सवाल पर हुड्डा के बेटे और रोहतक से सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा है कि कांग्रेस की राजनीति में हमारे परिवार का योगदान किसी से छिपा नहीं है. ऐसे सवाल का कोई मतलब ही नहीं बनता.

First published: 15 June 2016, 13:58 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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