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पेरिस जलवायु समझौते पर भारत के दस्तख़त, 2 अक्टूबर से काम शुरू

निहार गोखले | Updated on: 7 February 2017, 8:25 IST
QUICK PILL
  • इस समझौते को लागू करने के लिए कम से कम 55 देशों को इसे स्वीकार करना पड़ेगा, जो कम से कम 55 फीसदी CO2 उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं. अब तक 48 फीसदी उत्सर्जन के जिम्मेदार 61 देशों ने ऐसा किया है.

धरती के तापमान को कम करने के लिए भारत पहले ही पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है. अब प्रधानमंत्री मोदी ने उसे 2 अक्टूबर को स्वीकार करने की घोषणा की है. लक्ष्य पूरे करने के लिए भारत को काफी काम करना होगा. भारत को 6 साल में सौर ऊर्जा की क्षमता 25 गुना बढ़ानी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि भारत पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते को महात्मा गांधी जयंती के दिन 2 अक्टूबर को स्वीकार करेगा.

पर इसे स्वीकार करने का क्या मतलब होगा? इसके लिए भारत को क्या करना होगा? पेरिस समझौते को स्वीकार करने का मतलब है, भारत को ग्रीनहाउस उत्सर्जन में कमी करने के लिए अपने सभी वादों को मिलकर पूरा करना है. भारत विश्व के 4.1 फीसदी उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. उन वादों में 25 गुना ज्यादा सौर ऊर्जा बढ़ाना और कई लाख पेड़ लगाना शामिल है.

भारत पिछले साल कॉप-21 (कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज) में हुए समझौते में देर से शामिल होने वाले देशों में था. अंतरराष्ट्रीय समझौता होने के कारण, अंतरराष्ट्रीय आम सहमति पर विचार करने के लिए कुछ देशों के समर्थन की आवश्यकता थी. इस समझौते को लागू करने के लिए कम से कम 55 देशों को इसे स्वीकार करना पड़ेगा, जो कम से कम 55 फीसदी CO2 उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं. अब तक 48 फीसदी उत्सर्जन के जिम्मेदार 61 देशों ने ऐसा किया है.

कदम उठाने हैं

प्रधानमंत्री को सबसे पहले अपने कैबिनेट के साथ मिलकर पेरिस समझौते को स्वीकार करने का फैसला लेना है. विश्व संसाधन संस्था के अध्ययन के अनुसार भारत को समझौता स्वीकार करने के लिए बहुत कम औपचारिकताएं पूरी करनी हैं. उसे केवल कैबिनेट की स्वीकृति चाहिए, संसद की भी नहीं. चीन को कार्यकारिणी के अनुमोदन के साथ-साथ वैधानिक निकाय से भी बहुमत में सहमति की आवश्यकता थी. जापान को समझौते के अनुमोदन के लिए दो विधायी निकायों की जरूरत है और संयुक्त राष्ट्र को कांग्रेस के दोनों सदनों की स्वीकृति की आवश्यकता थी. पर इसका मतलब यह नहीं है कि मोदी को संसद नहीं जाना पड़ेगा. पेरिस समझौते को लागू करने से पहले कई नीतियां बनानी होंगी, और इनमें से कुछ के लिए नए कानूनों की जरूरत पड़ सकती है.

बड़े वादे, पूरा करना मुश्किल

कॉप-21 शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने कई वादे किए, जिसे ‘इंटेंडिड नेशनली डिटर्मिंड कन्ट्रिब्यूशंस’ कहा गया. अब जब देश इस समझौते के साथ आगे बढ़ रहा है, ‘इंटेंडिड’ शब्द को छोड़ दिया जाएगा और भारत को उन्हें लागू करना होगा।

इनमें कुछ वादे काफी बड़े हैं. सकल घरेलू उत्पादन के एक रुपए पर उत्सर्जित कार्बन की कटौती के लिए भारत ने वादा किया है कि 2030 तक कम से कम 40 फीसदी बिजली गैर जीवाश्म स्रोतों से पैदा की जाएगी. इसमें 2022 तक 175 गिगावाट क्षमता की नवीकरणीय ऊर्जा शामिल है.

कुछ वादे काफी बड़े थे: 2022 तक सौर ऊर्जा का लक्ष्य 2015 की क्षमता से 25 गुना ज्यादा है.

ये महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं. मसलन, इसमें 2022 तक सौर ऊर्जा का जो 100 गिगावाट का लक्ष्य है, वह 2015 की 4 गिगावाट क्षमता से 25 गुना ज्यादा है. पवन, बायोमास और पनबिजली का लक्ष्य वर्तमान क्षमता से 200 से 250 फीसदी ज्यादा है. भारत के सामने सबसे पहले वित्तीय समस्या आने वाली है. ये लक्ष्य पूरे करने के लिए उसे 2.5 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत पड़ेगी और वह इन लक्ष्यों को तभी पूरा कर सकता है जब उसे अन्य देश आर्थिक सहयोग और नई तकनीक पर छूट दे. पेरिस समझौता 2020 के बाद लागू होगा, जबकि उसके लक्ष्य 2022 के लिए तय किए गए हैं, इसलिए सरकार को पैसा इकट्ठा करने के लिए तुरंत काम शुरू करना होगा.

नीति बनाने के संदर्भ में देखें, तो नवीकरण ऊर्जा लागू करने के वादों को पूरा करने के लिए भारत को अपना पावर सेक्टर बदलने की जरूरत नहीं है. इसमें बेहतर कार्यक्षमता, ज्यादा वित्तीय स्थिरता, और नवीकरण ऊर्जा को सहयोग करने के लिए तकनीकी क्षमता की आवश्यकता है, जो घटती-बढ़ती रहती है. संस्थानिक संदर्भ में भारत के पास पहले से नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय है ताकि वह हर तरह की नवीकरणीय ऊर्जा के लिए राष्ट्रीय मिशन लागू कर सके. पर ये पर्याप्त नहीं होंगे.

आगे क्या करना है?

सभी मानते हैं कि कोई नहीं जानता कि सरकार इन वादों को कैसे पूरा करेगी. इस संदर्भ में कुछ अध्ययनों से जानकारी मिलती है. हाल में नीति आयोग के एक्सपर्ट ग्रुप की रिपोर्ट बताती है कि सरकार को आर्थिक सहयोग देने वाले पावर वितरक और नवीकरण ऊर्जा सहित जनरेटर्स शुरू करने के लिए उपाय करने होंगे. अब तक राज्यों पर जिम्मेदारी थी कि वे नवीकरण स्रोतों से पावर की अपनी जरूरतों का कुछ प्रतिशत खरीदे, पर ज्यादातर राज्यों ने यह दायित्व पूरा नहीं किया है.

सौर ऊर्जा परामर्श संस्था का कहना है कि नियामक ढांचे को मजबूत बनाने के लिए भारत को नए कानून की आवश्यकता पड़ेगी. इस सिलसिले में एमएनआरई ने राष्ट्रीय नवीकरण ऊर्जा अधिनियम का ड्राफ्ट पिछले साल जारी किया था। भारत को बिजली अधिनियम, 2003 में भी सुधार की आवश्यकता है. CO2 कैप्चर करने के लिए भारत की योजना पेड़ लगाने की है. संसद ने इसके लिए 40,000 करोड़ रुपए जारी करने के लिए एक कानून पारित किया था. विश्व संसाधन संस्था के अनुसार भारत को नवीकरण ऊर्जा की मांग पर भी ध्यान देने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें ऑफ ग्रिड सौर ऊर्जा को सहयोग करने और सस्ती बिजली भंडारण प्रणालियां विकसित करना शामिल है.

175 गिगावाट के लक्ष्य में 40 गिगावाट, घरेलू और औद्योगिक छतों पर लगाए सौर पैनलों से मिलने की उम्मीद है. फिलहाल, भवनों को प्रलोभन देने के लिए सरकार आर्थिक इंसेंटिव की कोशिश कर रही है. यदि वह इसे अनिवार्य करने का फैसला लेती है, तो इसके लिए भी कानून की जरूरत पड़ेगी. भारत का दूसरा मुख्य वादा है, पेड़ लगाकर 2. 5 से 3 बिलियन टन सीओ2 कैप्चर करना. खुशकिस्मती से यह पहले ही कानून के अंतर्गत है. संसद ने कंपेंसेटरी अफोरेस्टेशन बिल पास किया था. बिल ने पेड़ लगाने के लिए लगभग 40,000 करोड़ रुपए निर्धारित किए, जो बिल पारित होने के निलंबित खाते में पड़े हैं.

संभावनाएं?

भारत पेरिस समझोते को स्वीकार न करता, तो भी उसे लागू होना था. इसे स्वीकार करके भारत इस समझौते से जुड़ी नीतियां बनाने के बाद एक नए युग में प्रवेश करेगा.

इस घोषणा का स्थान-भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक, और समय के साथ मेल नहीं खाते कूटनीतिक दांव, शायद इस नए युग की मांग को पूरा करने के लिए जरूरी योजनाएं बनाने और उन्हें समुचित रूप से क्रियान्वयन करने के अनुकूल नहीं हों. 

First published: 27 September 2016, 4:36 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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