Home » इंडिया » Levying charges for cash withdrawals is almost like a sin tax. Here’s why
 

एटीएम से पैसा निकालने पर शुल्क ‘पाप’ टैक्स जैसा है

भावेश शाह | Updated on: 8 March 2017, 11:04 IST

पिछले दिनों स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, आईसीआईसीआई, एक्सिस और एचडीएफसी ने एटीएम से एक निश्चित सीमा से ज्यादा पैसा निकालने पर शुल्क लेने का प्रस्ताव रखा है. कैशलेस अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के नाम पर शुरू होने वाला यह शुल्क छोटे कारोबारियों पर कर लगाने जैसा है. दरअसल बैंक अन्य आय से प्राप्त अपनी लाभ-सीमा बचाना चाहते हैं.

बैंकों को ऋण पर ब्याज से आय होती थी, लेकिन अब ऋण लेने वाले ग्राहकों में काफी कमी आ रही है. इसलिए उन पर आय के अन्य स्रोतों के लिए दबाव डाला जा रहा है. हाल ही में इन चार बैंकों द्वारा बैंक और एटीएम से पैसे निकालने पर शुल्क लेने की घोषणा इसी दिशा में एक और कदम है.

जिस तरह से यह सब चल रहा है, उससे लगता है, अन्य बैंक भी इस राह पर चलेंगे. बैंकों के लिए यह लाभ-सीमा में बचत को लेकर है क्योंकि वे ऋण से पर्याप्त ब्याज नहीं कमा पा रहे हैं. इससे यह भी लगता है कि नोटबंदी के बाद बैंक अल्प लागत वाली जमाओं (बचत और चालू खाता )से पैसों की निकासी पर नजर रखना चाहते हैं. बैंकों के मुताबिक यह सिर्फ नकद ट्रांजेक्शन को हतोत्साहित करने के लिए है.

प्रस्ताव के अनुसार आईसीआईसीआई, एक्सिस और एचडीएफसी के ग्राहकों को तय सीमा से ज्यादा ट्रांजेक्शन करने पर 150 रुपए का कम से कम शुल्क देना पड़ेगा. एसबीआई के बचत खाते वाले एक महीने में तीन बार निशुल्क कैश ट्रांजेक्शन कर सकते हैं. यदि ग्राहक न्यूनतम बैलेंस नहीं रखते हैं, तो उस पर बैंक ने शुल्क की राशि बढ़ाई है. 6 मार्च से एसबीआई ने न्यूनतम बेलेंस 500 से 5000 रुपए कर दिए हैं.

कड़वा सच

परंपरागत रूप से कर या शुल्क उन उत्पादों या सेवाओं पर लिए जाते हैं, जिन्हें ‘सिनफुल’ (बुरा) माना जाता है, जो अर्थव्यवस्था, पर्यावरण या ग्राहकों के लिए ठीक नहीं हैं. उसी तर्ज पर अब नकद ट्रांजेक्शन को भी ‘सिन’ माना गया है.
इससे सबसे ज्यादा प्रभावित ग्रामीण और छोटे कारोबारी, लघु उद्योग आदि होंगे. प्रस्तावित शुल्क से ग्रामीण भारत की दुश्वारियां बढ़ेंगी, जिसे शहरी भारत की तरह आज भी मोबाइल फोन और इंटनेट की उतनी समझ नहीं है. कहना उचित ही है कि शुल्क लगाकर कैश ट्रांजेक्शन की संख्या को सीमित करना ग्रामीण भारतीयों पर कर लगाने जैसा लगता है.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2016 को चालू खातों में 95.078 करोड़ रुपए थे यानि कुल जमा पर 8.9 प्रतिशत ब्याज के हिसाब से 106 लाख रुपए. बचत खाते में 33.93 लाख करोड़ या कुल जमा का 32 प्रतिशत. आरबीआई के आंकड़ों के हिसाब से देश के 2.15 लाख एटीएम में से ग्रामीण इलाकों में महज 20 प्रतिशत हैं.

सारी बातों को उस संदर्भ में देखें, तो बैंक में जमा पैसे का 40 प्रतिशत डिमांड डिपोजिट (मांग जमा) कहलाता है. सरल शब्दों में ग्राहक बैंक शाखा में जाकर या एटीएम जाकर पैसा निकाल सकता है और ग्राहकों की मांग का बैंक को सम्मान करना होगा. ये मांग जमा चालू या बचत खाते में ही होते हैं.

सीआईआई का विरोध

एटीएम से पैसा निकालने का चलन ग्रामीण भारत में अब भी बहुत कम है. आरबीआई के आंकड़ों के हिसाब से देश के 2.15 लाख एटीएम में से ग्रामीण इलाकों में महज 20 प्रतिशत हैं. मोटे तौर पर बैंकों में जमा पैसों का 11 प्रतिशत (या 11.46 लाख करोड़ रुपए) ग्रामीण इलाके से है. देश का सबसे बड़ा व्यापारी संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने इन प्रस्तावित शुल्कों का विरोध किया है. उसने आरबीआई को एक चिट्टी लिखी है कि इस मामले में हस्तक्षेप के लिए नियामक की व्यवस्था की जाए.

लाभ बचाने की जुगत

पिछले कई सालों से बैंकों में एक ओर ऋण के लिए ग्राहकों में कमी आ रही है, तो दूसरी और ऐसे ऋण बढ़े हैं, जिनका पैसा लौटना संदिग्ध है. इस स्थिति के मद्देनजर बैंक बिना ब्याज के आय पर जोर दे रहे हैं. ग्राहकों के हर 1 रुपए जमा पर बैंक को खुद को चलाने के लिए कुछ ब्याज कमाना जरूरी है. पिछले दिनों बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (निम) कम हो गया है. (निम या ऋण पर कमाया ब्याज माइनस जमा और उधार ली गई रकम पर खर्च किया ब्याज).

केयर रेटिंग की रिपोर्ट के अनुसार 2014 में अक्टूबर से दिसंबर तक निम में बढ़त 8.1 प्रतिशत थी. यह भारत के बैंकों में 3.4 प्रतिशत रह गई है. पब्लिक सेक्टर बैंकों में बढ़त 2016 के 4.6 प्रतिशत की तुलना में -0.8 प्रतिशत रह गई. प्राइवेट सेक्टर के बैंक अपेक्षाकृत ज्यादा कमा रहे हैं. प्राइवेट सेक्टर वालों के लिए 2014 में निम की बढ़त 2016 के 11.5 प्रतिशत से ज्यादा 17.5 प्रतिशत थी. प्रोविजन और नॉन-परफोर्मिंग एसेट्स की संख्या भी बढ़ रही है (जहां, ऋण लेने वाला मूल और ब्याज दोनों का वापस भुगतान नहीं करता).

इन सब तथ्यों से जाहिर है कि अब बैंक अन्य स्रोतों से आय करने पर क्यों ध्यान दे रहे हैं. आय के अन्य स्रोतों में आमतौर पर ट्रेजरी लाभ (शेयर्स और बॉन्ड्स को खरीदने और बेचने की लागत पर लाभ), ग्राहकों से सेवा शुल्क (बैंक खाता, जमा, एटीएम का इस्तेमाल करने और चैक बुक जारी करने पर) और बीमा या तीसरी पार्टी के उत्पाद बेचने पर शुल्क शामिल हैं. इस आय में पिछले कुछ सालों से ही बढ़ोतरी हुई है. 2014 में बैंक में अन्य स्रोतों से आय 27.6 प्रतिशत थी, जो अक्टूबर-दिसंबर 2016 में 43.8 प्रतिशत हो गई.

First published: 8 March 2017, 8:21 IST
 
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