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मुसलमान नहीं होते तो सिमी सदस्यों को बचाव का मौक़ा मिलता: वीएन राय

राजीव खन्ना | Updated on: 13 November 2016, 1:48 IST
QUICK PILL
  • भोपाल सेंट्रल जेल से कथिततौर पर फ़रार के बाद मारे गए सिमी कार्यकर्ताओं की कार्रवाई पर पूर्व आईपीएस अफ़सर विभूति नारायण राय ने सवाल उठाए हैं. 
  • उन्होंने कहा कि सिमी सदस्यों का मुसलमान होना उनपर भारी पड़ा, वरना उन्हें अपने बचाव के मौक़े मिलते. 

खरी-खरी कहने के लिए मशहूर लेखक और भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी विभूति नारायण राय ने आशंका जताई है कि हाल ही भोपाल मुठभेड़ में मारे गए सिमी के आठ पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद नजर नहीं आती. चंडीगढ़ में चल रहे साहित्य महोत्सव 2016 के सत्र में अपनी पुस्तक, 'हाशिमपुरा मई 22' पर चर्चा के दौरान उन्होंने हाशिमपुरा और हाल ही भोपाल के घटनाक्रम की समानताओं पर प्रकाश डाला. पुलिस के साम्प्रदायिक, जातीय और लिंगभेदी रवैये का ज़िक्र करते हुए राय ने कहा कि मुठभेड़ के शिकार सिमी कार्यकर्ताओं को बचाव के कई मौके मिलते अगर वे गैर मुस्लिम होते.

सुरक्षा बलों विशेषकर सेना की ओर से देशभक्ति के नाम पर की जा रही हत्याओं पर राय ने कहा कि इस पर सवाल उठाने से सेना और सुरक्षा बलों का मनोबल गिरने की दलील दी जाती है. उनका कहना है कि 'अगर वे गलत करते हैं तो उनको हतोत्साहित होने दें. जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्व में सेना की भूमिका पर हम बहस करना चाहते हैं. देश भक्ति के नाम पर उन्हें बेलगाम नहीं कर सकते.' भोपाल में हुई हत्याओं पर कुछ नहीं होने वाला क्योंकि जो हुआ है कुल मिलाकर उससे समाज सुकून में है. 

ज़रूरत ईमानदार पुलिसवालों की

हाशिमपुरा कांड के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वहां सेना की भूमिका तो दुखद थी ही जबकि पीएसी ने 'भाड़े के हत्यारे' का काम किया. हालात से निपटने में विफल सेना के अफसरों को हटाया क्यों नहीं किया गया?पुलिस के सांप्रदायिक, जातिवादी और लिंगभेदी पूर्वाग्रह के सवाल पर उन्होंने कैच न्यूज से साफ़ कहा कि लोगों को पुलिस से काम लेने का हक़ है. पुलिस में भर्ती का जो तौर-तरीका है, वही उसके पूर्वाग्रहों की वजह है. 

अल्पसंख्यक या अनुसूचित जाति के अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के साथ अधिकारी कैसा सलूक करते हैं, सब जानते हैं. यहां यह सवाल उठना लाज़िमी है कि ब्रिटिश हुक़ूमत से चले आ रहे पुलिस ढांचे में मूलभूत बदलाव क्यों नहीं किए जाते? यह कभी चुनावी मुदृा नहीं होता कि हमें सभ्य पुलिस की जरूरत है, ऐसी पुलिस जो कानून और संविधान का सम्मान करे.

हाशिमपुरा के दोषी बेगुनाह कैसे?

1987 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा की घटना इस बात की गवाह है कि 42 युवा और स्वस्थ मुस्लिमों की हत्या का आरोप पीएसी के जवानों पर है. भोपाल की ताजा मुठभेड़ इसी से मिलती-जुलती वारदात है. हाशिमपुरा में मुस्लिम समुदाय को सबक सिखाया गया. अगर भोपाल कांड के पीड़ित गैर मुस्लिम होते तो उन्हें बचने के कई मौक़े मिलते. वे पकड़े भी जा सकते थे. वर्ष 2008 में मुंबई आतंकी हमले के बाद केवल अजमल कसाब को कई सूचनाओं के आधार पर जिंदा पकड़ा गया.

भोपाल की हत्याओं से जुड़ी जानकारी पर बात करते हुए वीएन राय ने कहा कि अधिकांश सीसीटीवी काम नहीं कर रहे हैं और निगरानी चौकियों पर कोई पुलिसकर्मी नजर नहीं आता क्योंकि ऐसे 80 फीसदी मुलाज़िम मंत्रियों और अफ़सरों के घरों पर बेगार कर रहे थे. 

उन्होंने हाशिमपुरा के पीड़ितों के प्रति सरकार और उसके तंत्र की नाकामी पर गुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा कि हर स्तर पर लापरवाही रही और तंत्र पूरी तरह फेल रहा. यह मीडिया, राजनीतिक नेतृत्व और न्याय व्यवस्था की भी विफलता है जिससे सभी अभियुक्तों को पिछले साल बेगुनाह करार दे दिया गया. 

दोहरापन

भारतीय सिस्टम में मौजूद कुचक्र और कई खामियों का जिक्र करते हुए राय ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के न्याय के प्रति उत्साही होने के बावजूद हाशिमपुरा के पीड़ित इंसाफ पाने में विफल रहे. लेकिन वे एक राजनेता भी थे और डेढ़ साल में उन्हें उत्तर प्रदेश में चुनाव का सामना करना था. राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह उस दुनिया के इंसान थे जिनका शगल सिर्फ चुनाव जीतना था. 

इसी तरह उनका विश्वास था कि देश के मुसलमानों को धर्मनिर्पेक्ष बनने के लिए बाध्य किया गया क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि धर्मनिर्पेक्ष सरकार का पतन होने पर हिन्दुत्ववादी ताकतें सत्ता पर काबिज हो जाएंगी. यह अनूठा दोहरापन है. इसका प्रमाण पिछले लोकसभा चुनाव हैं जब सभी हिन्दूवादी भाजपा के साथ हो गए. 

दोबारा सत्ता और उसके दबंग हथियार पुलिस और सेना के व्यवहार पर वापस लौटते हुए उन्होने कहा कि ये संस्थाएं सत्तारूढ़ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए बनी हैं और पुलिस तो आवश्यक बुराई है. इन्हीं दो क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बने हुए हैं. राय का मानना है कि ये सुरक्षा बल अपनी मर्जी से नहीं चलते और उनकी कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं होती. वे वही करते हैं जो सत्ता चाहती है. अपनी मर्जी जाहिर करने का माध्यम केवल हिंसा नहीं है. सत्ता की भाव-भंगिमा, बोलचाल का तौर-तरीका और अभिप्राय भी बहुत कुछ कह देते हैं.

राय ने आगे और खुलासा किया कि साल 1990 तक हुए 12 बड़े सांप्रदायिक दंगों में महज एक सहायक पुलिस निरीक्षक को सज़ा मिली, वह भी भागलपुर आंखफोड़वा कांड में. सिर्फ़ पुलिस को सज़ा देने से मामला नहीं सुलझेगा क्योंकि यह राजनीतिक नेतृत्व, न्यायपालिका और पुलिस की सामूहिक विफलता है. अब तक सिस्टम तो जनता को सज़ा करने वाला बना हुआ है. 

                         

First published: 13 November 2016, 1:48 IST
 
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