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सूबा दर सूबा लोकायुक्त को ठेंगा दिखाता रहा है

सौरव दत्ता | Updated on: 31 January 2016, 21:37 IST
QUICK PILL
  • बहुत ही कम सरकारें एक ऐसे लोकपाल के लिए जवाबदेह होना चाहती हैं जिसकी नियुक्ति लोक सेवकों की प्रतिष्ठा और ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए की जाती है. लिहाजा कोई आश्चर्य नहीं कि तमाम राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्तियां विवाद का सबब बनीं.
  • भारत जहां भ्रष्टाचार के मुद्दों पर राजनीतिक लड़ाई लड़ने का पुराना रिवाज है, वहां पर लोकायुक्त की नियुक्तियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता को लागू करना एक बेहद कठिन काम है.

बहुत ही कम सरकारें एक ऐसे लोकपाल के लिए जवाबदेह होना चाहती हैं जिसकी नियुक्ति लोक सेवकों की शुचिता और और इमानदारी सुनिश्चित करने के लिए की जाती है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तमाम राज्यों में उनके लोकपाल यानी लोकायुक्त की नियुक्तियां विवादों का सबब बनीं.

जैसे उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति में असफलता ने एक शर्मनाक मोड़ ले लिया. जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार की इच्छा के विपरीत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया.

इसका कारण यह है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकायुक्त नियुक्ति समिति के एक सदस्य धनंजय चंद्रचूड़ ने निजी छवि का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति का विरोध किया. 28 जनवरी को दिए गए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देश को वापस लेते हुए एक और सेवानिवृत्त न्यायाधीश संजय मिश्रा की नियुक्ति की है. 

भले ही उत्तर प्रदेश में यह आग ठंडी होती दिख रही है लेकिन उत्तराखंड में एक ताजा तूफान आ रहा है.

उच्च न्यायालय के एक वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि सरकार न केवल लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी कर रही है, बल्कि अब तक के सबसे श्रेष्ठ, योग्य और सबसे सक्षम जवाबदेही कानूनों में से एक लोकायुक्त संस्था को ही कमजोर कर रही है. 

उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक, 2011

उपाध्याय ने अपनी याचिका में दावा किया कि यह विधेयक अनुकरणीय है क्योंकि इसके दायरे में मुख्यमंत्री कार्यालय, पूर्व मुख्यमंत्री, विधायक और यहां तक ​​कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है. 

उपाध्याय ने आरोप लगाया कि 700 से अधिक शिकायतों और 3 सितंबर 2013 को राष्ट्रपति से स्वीकृति पाने के बावजूद सरकार भ्रष्ट लोक सेवकों को बचाने में लगी रही और 21 जनवरी 2014 को एक नया कानून ले आई जो कि पुराने कानून की तुलना में काफी कमजोर था.

उपाध्याय की जनहित याचिका अभी स्वीकार नहीं हुई है. लेकिन अगर हुई तो यह एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की ही तरह राज्य सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की एक और जमीन तैयार कर देगी.

लोकायुक्त नियुक्ति के अन्य विवाद

यह स्थिति केवल उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की नहीं है. अन्य राज्यों में भी सरकार द्वारा लोकायुक्त कानूनों को कमजोर करने के संबंध में इसी तरह के झड़प और विवाद हो चुके हैं.

एक विवाद गुजरात लोकायुक्त का भी है. जब 2013 में राज्य सरकार द्वारा न्यायमूर्ति आरए मेहता को लोकायुक्त के रूप में नियुक्ति के विरोध की कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट ने गलत करार दिया. इस नियुक्ति को लेकर राज्यपाल कमला बेनीवाल और राज्य सरकार के बीच टकराव पैदा हो गया. राज्य सरकार ने राज्यपाल के ऊपर आरोप लगाया कि उन्होंने राजनीतिक विद्वेष के कारण यह किया. 

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जवाब में सरकार गुजरात लोकायुक्त आयोग अधिनियम ले आई. इसके जरिए राज्य सरकार ने लोकायुक्त नियुक्ति से जुड़े असीमित अअदिकार अपने हाथ में कर लिए और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल की शक्तियों को लगभग छीन लिया गया.

इस कानून को अभी चुनौती दी जानी है. लेकिन यह किसी को यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि सरकार की प्रतिष्ठा और नीयत का सवाल अब कहां बचा है जब वो अपने ही ऊपर निगरानी करने वाले की नियुक्ति की पूरी शक्ति अपने हाथों में ले लेती है.

इससे लोकायुक्त संस्था की उसकी साख ही सवालों के घेरे में आ गई

गुजरात की घटना से पहले 2011 में कर्नाटक में भी यह सब हुआ. पूरा मामला तत्कालीन लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश संतोष हेगड़े द्वारा एक बहुत बड़े खनन घोटाले के खुलासे से पैदा हुआ जिसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा को दोषी बताया. 

इसलिए सरकार को चोट पहुंची और इसने हेगड़े के उत्तराधिकारी की नियुक्ति को रोकने के लिए सभी दांवपेच अपनाए. सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश शिवराज पाटिल इस पद पर नियुक्त होने वाले थे लेकिन तभी एक अवैध भूमि आवंटन विवाद में उनका नाम सामने आ गया. इससे लोकायुक्त संस्था की साख ही सवालों के घेरे में आ गई. 

अंत में कर्नाटक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति वाई भास्कर राव को फरवरी 2013 में लोकायुक्त के रूप में नियुक्त किया गया. लेकिन बीते साल दिसंबर में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों पर इस्तीफा देना पड़ा.

भारत जहां भ्रष्टाचार के मुद्दों पर राजनीतिक लड़ाई लड़ी जाती है, वहां पर लोकायुक्त की नियुक्तियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि केवल सार्वजनिक जीवन में शुचिता को सुनिश्तित कर पाना बेहद कठिन काम है.

First published: 31 January 2016, 21:37 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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