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शरणार्थियों से निपटने के लिए भारत से काफी कुछ सीख सकता है यूरोप

रणबीर समद्दर | Updated on: 29 June 2016, 13:52 IST
QUICK PILL
  • महाद्वीप में बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से यूरोप को संकट का सामना करना पड़ रहा है.
  • 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले एक करोड़ शरणार्थियों को भारत ने आसरा दिया.

यूरोपीय मीडिया, सोशल मीडिया और नीति निर्माता इस बात को लेकर परेशान हैं कि शरणार्थी समस्या से कैसे निपटा जाए. इस मसले पर लोगों की राय भी बंटी हुई है.

शरणार्थियों की भारी तादाद से कई यूरोपीय मुल्कों को काफ़ी मुश्किल हो रही है. उनके लिए उन्हें ये जानना मुश्किल हो रहा है कि इनमें से कौन किस मक़सद से आ रहा है. वो इन्हें पनाह माँगने वाले, रिफ्यूजी, मज़दूर, अवैध प्रवासी इत्यादि में वर्गीकृत नहीं कर पा रहे हैं.

भूमध्य सागर पर सुरक्षा बलों की गश्त और इंग्लिश चैनल को बंद करने की रणनीति भी शरणार्थियों को आने से रोकने में कारगर साबित नहीं हो सकी है. हालांकि यूरोपीय सरकार को छोड़कर हर किसी को ये पता है कि इससे समस्या खत्म होने वाली नहीं.

अब इन सरकारों के लिए इतनी भारी संख्या में भूमि, ट्रेन, जुलूस के जरिये आने वाले लोगों से निपटने में काफी संकट का सामना करना पड़ रहा है. कई देशों की स्थिति विचारशून्य जैसी हो गयी है.

शायद, ऐसे में यूरोप शायद भारत से कुछ सीख सकता है.

पूरब की सीख

हिंदुस्तान ने १९७१ में बांग्लादेश(तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से आए क़रीब एक करोड़ शरणार्थियों को पनाह दी थी.

मुझे याद है कि भारत में आज के यूरोप जैसी भय की स्थिति नहीं थी. न ही भारत उनकी तरह बेहाल और परेशानी महसूस कर रहा था. ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही. आज भी बढ़ रही है. आखिर ४० साल पहले भारत वो काम कैसे कर सका जिससे यूरोप आज जूझ रहा है.

इसे समझने के लिए हमे पहले ये जानना होगा कि किसी सत्ता और हाशिए के लोगों की जिम्मेदारी की प्रकृति क्या है.

भारतीय उपमहाद्वीप में अब तक दो बार विभाजन हो चुका है. कोई कैसे नागरिक बनता है और कोई नहीं बन पाता इसी धुरी पर राष्ट्रियता की राजनीति टिकी होती है.

भारत ने रिफ़्यूजी कन्वेंशन १९५१ या एडिशनल प्रोटोकॉल ऑफ १९६७ पर हस्ताक्षर नहीं किया था. भारतीय नीति के बारे में कहा जाता है कि वो 'नपीतुली दया' से प्रेरित थी. जिसके अंतर्गत कुछ शरणार्थियों को बचाया गया, उनकी देखभाल की गई और उनका पुनर्वास करवाया गया. जबकि इसी दौरान तमाम को बाहर ही छोड़ द�%

First published: 29 June 2016, 13:52 IST
 
रणबीर समद्दर @catchhindi

लेखक इतिहासकार हैं.