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लोया केस : क्यों सुप्रीम कोर्ट के जजों और वकीलों में फिर से टकराव शुरू हो सकता है ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 April 2018, 12:58 IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विशेष सीबीआई न्यायाधीश ब्रिजमोहन हरिकशन लोया की मौत की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया. शीर्ष अदालत ने कहा कि कि मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की जांच की मांग न्यायपालिका के खिलाफ है.

वकीलों पर हमला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देखने में आ रहा है कि बिजनेस और राजनीतिक हित साधने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दाखिल की जा रहीं हैं. जिनसे न्यायपालिका का वक्त बर्बाद होता है, जिससे दूसरे मामलों में न्याय देने में देरी होती है. उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों को लेकर बाजार या चुनाव में लड़ाई करनी चाहिए, उन मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए.

प्रशांत भूषण को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंह और प्रशांत भूषण को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप लोगों ने इस केस के बहाने न्यायपालिका पर सीधा हमला करना शुरू कर दिया. पीठ ने कहा कि जज लोया के मामले में एक पत्रिका और अखबार ने एकतरफा रिपोर्टिंग कर न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की कोशिश की.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की पीठ न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और डी वाई चंद्रचूड ने इस मामले पर सुनवाई की. रिकार्ड बताते हैं कि 1 अप्रैल 2014 को नागपुर महाराष्ट्र में जज लोया का दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. लेकिन याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत में आरोप लगाया था कि वह रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए थे.

2014 में उनकी मौत के समय, वह सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आरोपी थे. बाद में शाह को इस मामले में बरी कर दिया गया था. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और महाराष्ट्र सरकार के वकील के बीच गर्मा-गरम बहस भी हुई. इस दौरान याचिकाकर्ताओं ने जज लोया की मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाए.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला का कहना है कि ''फ़ैसले से उनका दिल टूट गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सर आंखों पर." जबकि इस मामले में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि "उन चार जजों के बयान के आधार पर फ़ैसला सुना दिया गया जिन्होंने कभी हलफ़नामा भी नहीं दिया. उस गेस्ट हाउस के तीन कमरे खाली थे, इस पर कहानी बना दी गई कि जज एक कमरे में सो रहे थे."

First published: 19 April 2018, 12:50 IST
 
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