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जम्मू-कश्मीर पुलिस: आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं हम?

गौहर गिलानी | Updated on: 9 April 2016, 23:06 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर पुलिस को वहां की स्थानीय आबादी पहले से ही शक की निगाहों से देखती रही है. एनआईटी विवाद के बाद राज्य के बाहर उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाने के मामले से जम्मू-कश्मीर पुलिस बेहद आहत है.
  • श्रीनगर एनआईटी में तिरंगा फहराए जाने के बाद राज्य पुलिस ने विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे छात्रों पर लाठियां भांजी थी. इसके बाद पुलिस पर गैर कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगा था.

एनआईटी विवाद के बीच जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारियों की स्थिति आगे कुंआ पीछे खाई की तरह हो गई है. एक तरफ पुलिस को वहां की स्थानीय आबादी हत्या करने वाली फौज की तरह देखती है जो चरमपंथियों को मारनेे के काम में लगी है तो वहीं दूसरी तरफ नई दिल्ली ने स्थानीय पुलिस की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करते हुए एनआईटी की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोेर्स (सीआरपीएफ) को थमा दी है.

कुछ नेता और टीवी एंकरों ने जहां जम्मू-कश्मीर पुलिस की भारत के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए हैं क्योंकि वह कथित तौर पर श्रीनगर एनआईटी में पढ़ रहे गैर कश्मीरी छात्रों को सुरक्षा देने में विफल रही है.

कुछ दिनों पहले जब एनआईटी श्रीनगर के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन करने की कोशिश की तो पुलिस ने उन पर लाठियां चलाई थीं. 

क्षमता और देशभक्ति पर सवाल उठाए जाने के बाद राज्य पुलिस गुस्से में है और यह जम्मू-कश्मीर की नई बनी पीडीपी-बीजेपी सरकार के लिए ठीक संकेत नहीं हैं. कुछ शीर्ष अधिकारियों ने यहां तक कह डाला कि वह इस प्रकरण की वजह से अपमानित महसूस कर रहे हैं.

डिप्टी सुपरिटेंडेंट फिरोज याहया ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा, 'मेरे कई सहयोगी पूछ रहे हैं और कई इस बारे में सोच रहे हैं कि हम दरअसल किसके लिए लड़ रहे हैं? मैं बस इतना कह सकता हूं कि एक बुरा समय है जो जल्द ही गुजर जाएगा. इसके आगे जम्मू-कश्मीर पुलिस को अर्नव गोस्वामी जैसे लोगों से प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है.'

याह्या ने लिखा, 'जम्मू-कश्मीर पुलिस एक राष्ट्रवादी और देशभक्त फौज है. इसके सिपाहियों ने धार्मिक विभेद से ऊपर उठकर इस देश के लिए खून बहाया है और अपनी जान दी है. इनकी वजह से राज्य में शांति आ सकी है.'

उन्होंने कहा, 'जो लोग हमारी पुलिस की क्षमता और योग्यता पर संदेह कर रहे हैं उन्हें हमारे बारे में कुछ भी बेहूदा टिप्पणी करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए. उन्हें एनआईटी मसले का राजनीतिककरण करने से बचना चाहिए.'

याह्या ने कहा, 'हमारेे डीजीपी के राजेंद्र कुमार हैं जिन्हें गोली लग चुकी है और वह आंध्र के रहने वाले हैं. दूसरे डीजीपी एस पी वैद हैं जिन्हें गोली लग चुकी है. एक आईजीपी जावेद मुजतबा गिलानी है जिनकी सभी इज्जत करते हैं. इसके अलावा राज्य और दूसरे राज्यों के दर्जन भर ऐसे आईपीएस अधिकारी हैं जिन्होंने राष्ट्रनिर्माण, शांति और राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने में अपनी मदद दी है. बेहतर कल के लिए इन सभी अधिकारियों ने अपने दिन का चैन और रातों की नींद को दांव पर लगाया है.'

अधिकारी ने हालांकि इस बात को माना कि कश्मीरी जनता सुरक्षा बलों को लेकर उतनी सकारात्मक राय नहीं रखते हैं. उन्होंने लिखा, 'अच्छे लोग जिनकी हम सेवा करते हैं वह हमसे कई कारणों से अलग हो सकते हैं और हमारा बेहतर काम निश्चित तौर पर उनका दिल जीतने में हमारी मदद करेगा.'

1993 में जम्मू-कश्मीर के जवानों ने सेना की गोली से हुई कॉन्सटेबल की मौत का 6 दिनों तक विरोध किया था

एसएसपी क्राइम मुबासिर लतीफी भी मीडिया के रवैये से नाराज दिखते हैं. उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर अपनी नाराजगी जताई थी लेकिन बाद में उन्होंने इसे हटा दिया. उन्होंने लिखा, 'जम्मू-कश्मीर पुलिस को वैसे किसी व्यक्ति से राष्ट्रवाद और तटस्थता का प्रमाण पत्र नहीं चाहिए जो अपने कीपैड से बाहर नहीं निकल पाते हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस का बलिदान और साहस का इतिहास रहा है. हमने राज्य को आतंकवाद के चंगुल से निकाला है.'

अन्य अधिकारियों ने भी पुलिस की वफादारी पर उठाए गए सवालों को लेकर नाराजगी जाहिर की. एक अधिकारी ने कहा, 'यह हमारे लिए दुधारी तलवार की तरह है. हमारा समाज हमें हत्यारे की तरह देखता है. हमारी एक छवि बनाई जा चुकी है. और अब हमें राज्य के बाहर के लोग राष्ट्रविरोधी बता रहे हैं. हमने हजारों आतंकियों को मारा है जिसमें स्थानीय और विदेशी मूल के आतंकी शामिल थे. विडंबना देखिए कि हजारों की संख्या में लोग मारे गए आतंकियों की शव यात्रा में शामिल होते हैं लेकिन हमारी शवयात्रा में बमुश्किल चार से पांच लोग जाते हैं.'

नेताओं और मशहूर शख्सियतों के बयान से भी पुलिस में नाराजगी है

नेताओं और मशहूर शख्सियतों के बयान से भी पुलिस में नाराजगी है. मधु किश्वर ने कहा कि कश्मीर की पुलिस में 'अलगाववादियों की संख्या बेहद बढ़़ चुकी है.' बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए एक पुलिस अधिकारी पूछते हैं, 'क्या बातों को घुमा फिराकर कहने वाले लोग 1993 के पुलिस आंदोलन का दोहराव चाहते हैं.'

अप्रैल 1993 में जम्मू-कश्मीर के पुलिसकर्मियों ने छह दिनों लंबा विरोध प्रदर्शन किया था. सेना की गोली से मरे पुलिसकर्मी रियाज अहमद को लेकर पुलिस ने विरोध प्रदर्शन किया था. इस दौरान पुलिसवालों ने अपने हथियार लहराते हुए भारत विरोधी और आजादी के समर्थन में नारे लगाए थे. 

स्थिति बिगड़ती देख सेना को श्रीनगर के पुलिस कंट्रोल रूम की कमान लेनी पड़ी और फिर विरोध कर रहे पुलिस वालों के हथियार लिए गए. कह सकते हैं कि छोटे विद्रोह को बातचीत से सुलझा लिया गया.

First published: 9 April 2016, 23:06 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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