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माधुरी गुप्ता: भारतीय जासूस जिससे मैं पाकिस्तान में मिली

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • पाकिस्तान के बलोचिस्तान इलाके से पूर्व भारतीय नौसैनिक कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सनातन तल्खी थोड़ी और बढ़ गई है. पाकिस्तान का दावा है कि जाधव भारतीय जासूस और रॉ के एजेंट हैं. कुछ साल पहले एक अन्य भारतीय राजदूत माधुरी गुप्ता पर भी इसी तरह के आरोप लगे थे. लेकिन तब मामला उल्टा था. इस्लामाबाद स्थिति भारतीय उच्चायोग में नियुक्त राजनयिक माधुरी गुप्ता पर आरोप था कि वो पाकिस्तान के लिए भारत के खिलाफ जासूसी करती थीं.
  • फिलहाल माधुरी दिल्ली की जेल में हैं और उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत मामला चल रहा है. इस लेख की लेखिका अपने लंबे पाकिस्तान प्रवास के दौरान माधुरी गुप्ता को करीब से जानती थीं. यहां उन्होंने माधुरी गुप्ता के बारे में अपने अनुभव साझा किए हैं:

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पकड़े गए भारतीय नौसैनिक कुलभूषण जाधव की पिछले हफ्ते हुई गिरफ्तारी से माधुरी गुप्ता के बारे में मेरी यादें ताजा हो गईं. जी हां माधुरी गुप्ता. वो कथित जासूस जिसे मैं जानती हूं.

माधुरी की मई 2010 में जब गिरफ्तारी हुई वो पाकिस्तान के भारतीय उच्चायोग में सूचना और प्रेस विभाग में सेकंड सेक्रेटरी थी. उस पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को गोपनीय सूचनाएं देने का आरोप लगा था.

पिछले महीने दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत का जनवरी 2012 का फैसला पलटते हुए ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत माधुरी पर आरोप तय करने के निर्देश दिए.

पिछले महीने दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत माधुरी पर आरोप तय करने के निर्देश दिए

ये कानून काफी सख्त है और दोषी पाए जाने पर माधुरी को 14 साल तक की सजा हो सकती है. लेकिन मेरी नजर में माधुरी उस महिला की तरह थी जिसे खुफिया सूचनाओं के बजाए अपने कपड़ों और मेकअप के बारे में ज्यादा चिंता रहती थी.

'माधुरी' जिसे मैं जानती हूं

वह 14 फरवरी 2009 का दिन था. खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बने इस्लामाबाद के एक रेस्त्रां में कुछ भारतीय महिलाएं इकट्ठा हुई थीं. मारगल्ला हिल्स का ये नजारा उनकी शांत और सामान्य जिंदगी में रंग भरने जैसा था.

वैलेंटाइन डे के इस स्पेशल मौके का ड्रेस कोड पिंक कलर का था. खाने का भी खास इंतजाम था. यात्रा के बीच में महिलाओं को ला रही मिनी बस दमन-ए-कोह नाम की जगह पर थोड़ी देर के लिए रुकी.

यहां से ट्विन सिटी इस्लामाबाद और रावलपिंडी का बेहतरीन नजारा दिखता है. ज्यादातर महिलाएं बस से अपने कैमरों के साथ उतर गयीं. हम जैसे कुछ लोग बस में ही रहे. हम तो मारगल्ला हिल्स के अनोखे दृश्यों को निहारने में लगे थे.

माधुरी गुप्ता उनमें से एक थी

कुछ मिनट के बाद एक युवती हमारी मिनी बस में चढ़ी. उसने हमसे पूछा कि क्या हम लोग भारतीय हैं? पाकिस्तान में जरूरत से ज्यादा सावधानी बरतने की नसीहत के चलते हम चुप रहे.

लेकिन उस महिला की उत्सुकता थमने का नाम नहीं ले रही थी. उसका अगला सवाल स्तब्ध करने वाला था. क्या हम भजन गा सकते हैं? बॉलीवुड क्रेजी पाकिस्तान में लोग शाहरुख खान और सास-बहू टाइप के कभी ना थमने वाले सीरियल के बारे में पूछते हैं.

और अगर आपके दिमाग में शाहरुख के साथ ट्रेन में होने जैसी कोई रुमानी कहानी चल रही हो तो ऐसा सवाल और ज्यादा बोरिंग हो जाता है. हां कभी-कभी अगर आप किसी सुपरमार्केट, रेस्त्रां या अस्पताल में हों तो ऐसे सवाल की अहमियत हो सकती है.

माधुरी गुप्ता से मैं इस्लामाबाद में रिपब्लिक डे समारोह के दौरान 2008 में पहली बार मिली थी

लेकिन इस तरह बिना इजाजत दखल कभी-कभी और मुश्किल से ही होता था. हमें आश्चर्य होता था कि महिलाएं कैसे चोरी-छिपे पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठानों की जासूसी कर सकती हैं जबकि वहां हमेशा हर भारतीय पर पैनी नजर होती थी.

उस वक्त हमारी सुरक्षा में करीब आधा दर्जन सुरक्षाकर्मी तैनात थे. इसके बावजूद उस महिला पर कोई असर नहीं पड़ा. वो जानना चाहती थी कि क्या वो भारतीयों से मिल सकती है. यही वो वक्त था जब माधुरी बस में दाखिल हुईं.

उसने अपना विजिटिंग कार्ड महिला के हाथ में रखते हुए उसे बाहर भेज दिया. उसे इसमें कुछ भी बुराई नजर नहीं आई जैसा कि हममें से ज्यादातर सोच रहे थे.

मेरी पहली मुलाकात

माधुरी से मैं इस्लामाबाद में रिपब्लिक डे समारोह के दौरान 2008 में मिली थी. पाकिस्तान में कुछ महीने पहले पहुंचने के बाद ये मेरा पहला औपचारिक फंक्शन था.

उसके तड़क-भड़क वाले अंदाज और उर्दू बोलने के लहजे से एकबारगी मुझे उसके पाकिस्तानी होने का भ्रम हुआ. वो कुछ स्थानीय पत्रकारों से बातचीत कर रही थी. उसी दौरान मेरा और उसका परिचय हुआ.

मैंने उससे कहा कि वो पाकिस्तानी महिला जैसी दिख रही है. मेरे इतना कहते ही वो जोर से हंसने लगी और अपने सुनहरे भूरे बाल पीछे की तरफ उछाल दिए. हम पाकिस्तानी अखबारों के बारे में बातचीत करने लगे.

उसने मुझसे कहा कि अंग्रेजी अखबार पढ़कर मैं अपना वक्त बर्बाद कर रही हूूं. "अगर तुम्हें असली ख़बर पढ़नी है तो उर्दू के अखबार पढ़ो. यहां पर तुम्हें गॉसिप पढ़ने को मिलेगी.”

मैं उस वक्त इस्लामाबाद में नई थी. माधुुरी ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने शहर घूमा है. जब मैंने ना में जवाब दिया तो उत्साहित होते हुए उसने मेरे सामने इस्लामाबाद घुमाने का प्रस्ताव रखा. मुझे थोड़ी घबराहट हुई.

उसने मुझसे कहा कि अंग्रेजी अखबार वक्त की बर्बादी है. अगर असली ख़बर पढ़नी है तो उर्दू के अखबार पढ़ो

माधुरी मेरी पसंद को लेकर ज्यादा उत्साह में थी और बाद में जब उसने मुझे कोई फोन नहीं किया तो मैं खुश होे गई. अगले दो साल के दौरान हम इक्का-दुक्का बार ही मिले.

वो मुझे अपनी हैरतअंगेज कहानियों के बारे में बताया करती थी कि कैसे उसने लाहौर-इस्लामाबाद हाईवे पर तेज रफ्तार में गाड़ी चलाई. कैसे उसने युवकों के एक ग्रुप को ड्राइविंग करते हुए पछाड़ दिया.

वो जगहें जहां उसे शॉपिंग करना पसंद था. कभी भी मुझे वो बहुत बुद्धिमान या करियर के बारे में चिंतित महिला नहीं नजर आई. मैं उसकी पोशाकों और बाल के रंगों की बेवकूफी भरी प्रशंसा करती थी लेकिन उसे इसमें भी खूब मजा आता था.

एक बार मैंने उससे पूछा कि क्या पाकिस्तान में एक अकेली महिला के लिए पहना मुश्किल है. तो उसने फौरन जवाब देते हुए कहा- "कभी-कभी मैं रात में खाना नहीं पकाती हूं."

मैं मैगी खाकर सो जाती हूं. उसने कहा, "अकेले रहने में यही एक समस्या है.”

ऊर्जा से भरपूर

माधुरी के बारे मेें जिस एक बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो थी उसकी ऊर्जा और आत्मविश्वास. भारी-भरकम होने के बावजूद वो आसानी से दोस्त बना लेती थी. वो काफी खुश रहती थी.

हमेशा अपने में खोई हुई महिला थी. माधुरी के साथ मेरी सबसे लंबी मुलाकात दिसंबर 2009 में हुई थी. वो उस वक्त भारत से लौटी ही थी. माधुरी ने एक खूबसूरत कोट पहना हुआ था.

उसने मुझे बताया, “ इसे मैंने लाजपतनगर से खरीदा है. " उसने बताया कि भारत के दौरे ने उसे थका दिया है,  इस्लामाबाद लौटकर वो खुश थी. उसने कहा, "मुझे लगता है कि मैं अपने घर लौट आई हूं.”

उसके जवाब पर मैं बगलें झांकने लगी. उसने जल्दी से बात को संभालते हुए कहा, " घर वो है जहां आप रहते हैं. अच्छा या बुरा ये घर है.” मैंने उससे पूछा कि इस्लामाबाद में वो और कितने वक्त तक रहेगी.

उसने मुझे बताया कि भारत की यात्रा ने उसे थका दिया. इस्लामाबाद लौटकर उसे लगा कि अपने घर लौट आई है

उसका जवाब था कि कुछ ही महीने में वो चली जाएगी. मैंने पूछा, “वापस दिल्ली?" उसका जवाब था, "नहीं. मुझे उम्मीद है कि लंदन या वाशिंगटन जाऊंगी.” मैं ये जानकर प्रभावित हुई कि वो बगदाद में भी काम कर चुकी थी.

पाकिस्तान में रहने के लिए उर्दू जरूरी

मुझे ये पक्का भरोसा था कि शेर-ओ-शायरी की शौकीन होने की वजह से माधुरी ने उर्दू सीखी. लेकिन उसके जवाब ने मुझे हैरानी में डाल दिया. "नहीं मुझे ये सब पसंद नहीं है. मैंने पाकिस्तान में नौकरी करने के लिए उर्दू सीखी है.”

माधुरी ने बताया कि उर्दू सीखने के लिए उसने एक मुस्लिम महिला को रखा है. वो दो साल के लिए घर आई थी. माधुरी ने कहा कि यहां आने से पहले मुझे अलिफ-बे तक नहीं आता था.

पाकिस्तान में रहना आसान नहीं है. हर किसी को अपनी सुरक्षा के लिए कहा जाता है. यहां आने के बाद पहले दिन मैं बोलना भूल गई थी. कई साल बाद अब मुझे लगता है कि हर भारतीय पर सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी नजर होती है

उनको जाल में फंसाना मुश्किल है- जब तक कि वो खुद मदद ना करें. किसी शख्स को दोस्त बनाने की बात भूल जाइए. किसी जानवर के साथ भी दोस्ती करने के लिए उसके बारे में जानकारी होनी जरूरी है.

मेरी आखिरी मुलाकात

जनवरी 2010 में माधुरी से मैं आखिरी बार मिली. लेकिन अब वो चिंतित नजर आ रही थी. जब माधुरी को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में मई 2010 में गिरफ्तार किया गया, तब जाकर मुझे इसकी वजह समझ में आई.

मैं भरोसा नहीं कर पा रही थी कि वो एक जासूस थी और वो हनी ट्रैप में शामिल थी. अब वो जावेरिया बन चुकी थी. वो जिम नाम के 30 साल के शख्स के हाथों जासूसी का जाल बुनती थी.

मुझे हमेशा माधुरी सुनहरे-भूरे बालों वाली महिला के रूप में याद रहेगी. जासूसी के बजाए माधुरी मुझे उस महिला के रूप में याद रहेगी जो पाकिस्तान में स्किन फ्रेंडली हर्बल रंगों से होली खेलकर खुमार ला देती थी.

First published: 31 March 2016, 1:04 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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