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मध्य प्रदेशः शिवराज के ज्ञान के आगे विज्ञान भी असफल है

शिरीष खरे | Updated on: 10 July 2016, 16:07 IST
(गेट्टी)

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल 29 नवंबर, 2012 का दिन और स्थान था इंदौर जिले का उज्जैनी गांव. तब इस गांव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी के साथ नर्मदा नदी को क्षिप्रा नदी से जोड़ने की एक बड़ी योजना का धूमधाम से शिलान्यास किया था. 

इसी दिन यहां चौहान ने नर्मदा नदी से क्षिप्रा नदी की पुरानी रवानी लौटाने की घोषणा की थी और जल संकट से घिरे सूबे के पश्चिमी अंचल मालवा को हरा-भरा बनाने का भी सपना दिखाया था. उनका दावा था कि मालवा के सैकड़ों गांवों को रेगिस्तान बनने से बचाने के लिए उन्होंने योजना को तेजी से अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है. और इसी के चलते अगले एक साल में नर्मदा मैया क्षिप्रा मैया से मिलने आ जाएंगी.

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योजना का सारा काम करीब साल भर पहले पूरा किया जा चुका है, लेकिन हकीकत यह है कि करीब एक महीने तक चले सिंहस्थ कुंभ आयोजन को छोड़ दिया जाए तो नर्मदा का पानी क्षिप्रा में बहाया नहीं जा रहा है. वजह है कि इस योजना को यदि साल भर भी चलाया गया तो संचालन पर करीब साढ़े पांच सौ रुपए का खर्च आएगा. यह पूरी योजना ही करीब 450 करोड़ रुपये की है.

इसलिए नदी-जोड़ समर्थक कई विशेषज्ञ भी इस योजना के पक्ष में नहीं दिखते. इस बारे में उनकी साफ राय है कि भौगोलिक नजरिए से नर्मदा को क्षिप्रा से जोड़ना अपनेआप में एकदम उलटी कवायद है. और इसलिए इसकी तकनीक में बहुत अधिक पैसा खर्च होने के चलते यह योजना घाटे का सौदा है. 

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मप्र में नर्मदा जहां सतपुड़ा पर्वतमाला की घाटियों में बहने वाली नदी है वहीं क्षिप्रा मालवा के पठार पर स्थित है.

योजना कितनी जटिल और खर्चीली

योजना के मुताबिक क्षिप्रा को सदानीरा बनाये रखने के लिए उससे काफी नीचे स्थित नर्मदा के पानी को काफी ऊंचाई पर चढ़ाया और फिर उसे क्षिप्रा में डाला जाता रहेगा. इस ढंग से क्षिप्रा को 24 घंटे जिंदा रखने के लिए भारी मात्रा में नर्मदा का पानी डालते रहना अपनेआप ही दर्शाता है कि यह योजना कितनी जटिल और खर्चीली है.

पानी हमेशा गुरूत्वाकर्षण के अनुरुप बहता है. किंतु मप्र की सियासत में नर्मदा के पानी को गुरूत्वाकर्षण के सर्वमान्य सिद्धांत के खिलाफ बहाने का दावा किया जा रहा है. इस तस्वीर को साकार करने के लिए पैसा, मशीनरी, समय और श्रम की बेहिसाब बर्बादी को देखते हुए इसे अक्लमंदी वाली जद्दोजहद नहीं कही जा सकती.

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नर्मदा नदी को क्षिप्रा से जोड़ने के लिए 50 किलोमीटर लंबी पाईपलाइनबनाई गई है. योजना के तहत नर्मदा के पानी को नर्मदा की घाटी से मालवा के पठार तक ले जाने के लिए तकरीबन 550 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ाया जाना है.

तकनीशियनों के मुताबिक एक नदी के बहाव को इस ऊंचाई तक खींचने के मामले में यह एक बहुत बड़ा फासला है. इतनी ऊंचे फासले को पाटने के लिए इस योजना में भंयकर बिजली इस्तेमाल की जाएगी. 

इसके लिए 2 स्थानों पर पंपिंग स्टेशन बनाए गए हैं, अब नर्मदा की धारा को अनवरत पठार तक पहुंचाने के लिए इन पंपिंग स्टेशनों को हमेशा चालू हालत में भी रखना पड़ेगा.

बिजली की कीमत बढ़ेगी तब

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इस योजना के निर्माण से जुड़े कामों के लिए जिम्मेदार नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के सूत्र बताते हैं कि नर्मदा का पानी पठार तक पहुंचाने में कुल 36 रूपये प्रति हजार लीटर का खर्च आएगा. 

जाहिर है कि बिजली से चलने वाली मशीनों को रात-दिन चलाते हुए नर्मदा नदी का पानी चढ़ाना किस हद तक खर्चीला है. इसके तहत हर दिन तीन लाख 60 हजार घनमीटर पानी नर्मदा से क्षिप्रा में डालकर बहाया जाना है.

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस पूरी कवायद में रोजाना किस हद तक बिजली फूंकी जानी है. जानकारों की राय में आगे जाकर बिजली की कीमत बढ़ेगी और इसी नजरिए से यह योजना ठीक नहीं कही जा सकती.

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जल क्षेत्र में शोध से जुड़ी संस्था 'मंथन अध्ययन केंद्र, बड़वानी' के रहमत के मुताबिक, ‘क्षिप्रा सहित मालवा की तमाम नदियां यदि सूखीं तो इसलिए कि औद्योगिकीकरण के नाम पर इस इलाके में जंगलों की सबसे ज्यादा कटाई हुई और उसके चलते नदियों की जलग्रहण क्षमता कम होती गई. 

कायदे से मालवा की नदियों को जिंदा करने के लिए उनके जलग्रहण क्षेत्र में सुधार लाने की जरूरत थी. लेकिन इसके उलट अब दूसरे अंचल की नदी का पानी उधार लेकर यहां की नदियों को जीवनदायनी ठहराने की परिपाटी डाली जा रही है.' सवाल है कि उधार के पानी से क्षिप्रा जैसी बड़ी नदियों को कब तक जिंदा रखा जा सकता है.

नदी-जोड़ योजना का एक आम सिद्धांत है कि किसी दानदाता नदी का पानी ग्रहणदाता नदी में तभी डाला जा सकता है जब दानदाता नदी में अपने इलाके के लोगों की आवश्यकताओं से ज्यादा पानी उपलब्ध हो. सवाल है कि क्या नर्मदा में पेयजल, खेती और उद्योगों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता से ज्यादा पानी उपलब्ध है?

नर्मदा का क्या होगा

'वाशिंगटन डीसी के वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट' के मुताबिक नर्मदा दुनिया की 6 सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल है. 'केंद्रीय जल आयोग' के मुताबिक बीते सालों में नर्मदा में पानी की आपूर्ति आधी रह गई है, जबकि 2026 तक नर्मदा घाटी की आबादी 5 करोड़ हो जाएगी. और ऐसे में यहां पानी जैसे संसाधनों पर भारी दवाब पड़ेगा.

योजना को लेकर जल वैज्ञानिक केजी व्यास का मानना है, ‘नर्मदा का पानी जिस जगह से उठाया जाएगा उसके बारे में यह नहीं बताया गया है कि वहां लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उससे अधिक पानी उपलब्ध है भी या नहीं?’

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इसी तरह, इस नदी-जोड़ योजना में करीब 450 करोड़ रुपये खर्च किया जाएगा. लिहाजा खर्च के अनुपात में समस्या के निराकरण के भरोसे को कम करके नहीं तौला जा सकता. लेकिन यहां यह भी नहीं बताया गया है कि इस लेन-देन में नर्मदा घाटी को कितना घाटा और सूबे को कुल कितना मुनाफा होने वाला है.

पहल नई नहीं

पत्रिका

नर्मदा नदी को मालवा की जीवनरेखा बनाने की पहल नई नहीं है. किंतु 2002 में सूबे की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने जरूरत से ज्यादा बिजली खर्च होने की दलील देकर ऐसी योजना को खारिज कर दिया था. 2002 को विधानसभा में सिंह ने इस योजना से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि इसके लिए पैसा जुटाना बड़ी चुनौती है.

दूसरी तरफ, विधानसभा चुनाव के समय मुख्यमंत्री चौहान का कहना था, ‘मालवा में नर्मदा का पानी लाने के लिए एक लाख करोड़ रूपये भी खर्च करने पड़े तो हंसते-हंसते खर्च किये जाएंगे.’ साथ ही चौहान ने दोनों नदियों के बीच एक भव्य मंदिर बनाने की घोषणा भी की थी. 

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जल नीतियों पर अध्ययन करने वाली संस्था 'सैंड्रप, दिल्ली' के हिमांशु ठक्कर के मुताबिक, ‘पानी से उठने वाले विवादों के बाद हल ढूढ़ना काफी मुश्किल हो जाता है.’ जैसे कि दक्षिण भारत में कावेरी नदी के विवाद के बाद कर्नाटक और तमिलनाडू राज्यों के बीच पनपी पानी की लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं लेती.

तजुर्बे बताते हैं कि भले ही पानी आग ठंडा करने के काम आता हो, लेकिन सियासत में यह आग लगाने के काम आ रहा है.’ अब यह सियासतदारों को सोचना है कि वे निमाड़ और मालवा इलाके की नदियों के पानी के साथ ऐसा कोई खेलेंगे?

First published: 10 July 2016, 16:07 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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