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एक 'बे' बस मध्य-प्रदेश

शिरीष खरे | Updated on: 7 June 2016, 0:00 IST
(गेटी)

गणेश पाटीदार को मध्य-प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 350 किलोमीटर दूर बड़वानी पहुंचने में कोई 8 घंटे का समय लगना चाहिए, लेकिन सफर 12 घंटे से भी ज्यादा समय में पूरा होता है. वे बताते हैं, "प्रदेश में पहले राज्य परिवहन की बसों से घर तक पहुंचने की गारंटी तो होती थी, लेकिन प्राइवेट बस पता नहीं कब आपको पर्याप्त यात्री न होने की बात कहकर बीच रास्ते में छोड़ दें. भोपाल से बड़वानी पहुंचने के लिए दो-दो प्राइवेट बसें बदलनी पड़ती हैं. बस मालिक मनमर्जी से किराया वसूलने के बावजूद समय पर नहीं चलते."

गणेश पाटीदार की किस्मत तो फिर भी अच्छी है, प्रदेश के मंडला जैसे आदिवासी जिलों में चुटका जैसे कई गांवों में तो बस मालिक घाटे का मार्ग बताकर दूर-दराज के गांवों में जाना तक ठीक नहीं समझते. चुटका के मोती यादव बताते हैं, "हमें पास के शहर जैसे नारायणगंज तक पहुंचने के लिए निजी जीपों का दिन-दिनभर इंतजार करना पड़ता है. जीप किसी तरह मिल भी गई तो उसमें 25-30 लोगों को लादकर लाया-ले जाया जाता है. लोग भी जान हथेली पर रखकर यात्रा करने पर मजबूर हैं."

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यह स्थिति पूरे मध्य-प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की है जहां राज्य सड़क परिवहन निगम की सरकारी बसों को दस साल पहले पूरी तरह बंद किया जा चुका है. दरअसल, मध्य-प्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों का बंद होना आर्थिक भ्रष्टाचार की ऐसी कहानी है जिसने नेताओं के लिए करोड़ों रुपये के मुनाफे का एक नया रास्ता खोल दिया है. इसके साथ ही राज्य में खास तौर पर ग्रामीण आदिवासी आबादी के सामने हर दिन निजी बस मालिकों से किराये के मामले में लुटने की परिस्थितियां पैदा कर दीं.

राज्य सरकार ने दस साल पहले (2005) परिवहन निगम की बसों को पूरी तरह से बंद कर दिया है

मध्य-प्रदेश के बारे में यह जानकारी कई लोगों को हैरत में डाल सकती है कि यह प्रदेश देश का ऐसा प्रदेश है जहां राज्य सरकार ने दस साल पहले (2005) परिवहन निगम की बसों को पूरी तरह से बंद कर दिया है. अपने विस्तृत क्षेत्रफल और रेल लाइनों के कम घनत्व के बावजूद राज्य सरकार ने जनता को प्राइवेट बस ऑपरेटरों के सहारे छोड़ दिया है. इस सरकारी घोषणा का असर यह हुआ कि हर दिन लाखों यात्रियों को इसका खमियाजा भुगतना पड़ रहा है. वहीं प्रदेश के नेताओं और उनके रिश्तेदारों को इसका सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है.

मध्य-प्रदेश परिवहन विभाग के अनुसार प्रदेश की राजधानी भोपाल से गांवों की ओर प्रतिदिन करीब 450 बसें चलती हैं. लेकिन आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से एक विशाल राज्य के पचास जिलों के गांव-गांव से जुड़ने के मामले में यह संख्या बहुत कम लगती है. राज्य का क्षेत्रफल तीन लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक है और इसकी आबादी करीब साढ़े करोड़ है.

अहम बात है कि राज्य के निमाड़ (खरगौन, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर) और मालवा (देवास) के ग्रामीण इलाकों तक रेल लाईन नहीं पहुंची हैं. लिहाजा यहां लोग बसों को यात्रा के आखिरी उपाय के रुप में देखते हैं. लेकिन ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में बसों की संख्या कम पड़ने से यात्री ट्रैक्टर की ट्रॉली जैसे मालवाहनों में जबरदस्ती लदने को बेबस हो गए हैं.

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यही वजह है कि 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ग्रामीण इलाकों में एक हजार छोटी बसें चलाने की घोषणा की थी. उन्होंने छोटी बसों को खरीदने के लिए 25 करोड़ रूपये राज्य सरकार से और बाकी 25 करोड़ रूपये अनुदान के तौर पर बैंकों से बस मालिकों को दिलाने की पहल की थी. लेकिन घाटे वाले मार्गों पर बस मालिकों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

वहीं, बीते 8 सालों में 8 बार किराया बढ़ाने से शहरी यात्रियों की यात्रा भी बहुत महंगी होती जा रही है. मध्य-प्रदेश अनुबंधित बस ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्याम सुंदर शर्मा का आरोप है, "परिवहन विभाग के किराये में बढ़ोत्तरी का सीधा लाभ बस मालिकों को मिला है."

दूसरी तरफ, राज्य सरकार के निर्धारित किराये के बावजूद बस मालिकों द्वारा इससे कहीं अधिक रुपया वसूलने की शिकायतें शासन को लगातार मिलती रही हैं. इसके बाद खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी बसों में किराया-सूची लगाने का सख्त निर्देश भी दिया.

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इस बारे में मध्य-प्रदेश परिवहन आयुक्त शैलेन्द्र कुमार श्रीवास्तव बताते हैं, "बसों में किराया-सूची लगाने की शिकायतें लगातार प्राप्त हो रही हैं. इसके लिए परिवहन विभाग के पास अलग से एक निगरानी टीम होनी चाहिए, जो अभी नहीं है. लेकिन विभाग निगरानी के लिए विशेष जांच दल बनाने पर विचार कर रहा है." जाहिर है सरकार के पास निर्धारित किराये से अधिक पैसा वसूलने को लेकर कोईं निगरानी तंत्र नहीं है. इसलिए यात्रियों द्वारा बसों में तय किराये से ज्यादा वसूली की शिकायतें आ रही हैं.

जब लगा था परिवहन निगम में ताला

मध्य-प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन की बदहाली का तार दस साल पहले भाजपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के उस फैसले से जुड़ा है जिसमें उन्होंने सड़क परिवहन निगम को बंद किया था. 2005 को बाबूलाल गौर के इस फैसले ने 11,500 कर्मचारियों को आर्थिक संकट में डाला दिया.

मध्य-प्रदेश अनुबंधित बस ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्याम सुंदर शर्मा के अनुसार, "राज्य सरकार ने घाटे के नाम पर निगम को बंद करने से पहले कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया था. मध्य-प्रदेश राज्य परिवहन अधिनियम के मुताबिक जब घाटे का संचय इतना बढ़ जाए कि वह निगम की कुल संपत्ति से अधिक हो जाए और सरकार के लिए निगम का चला पाना संभव नहीं है तो ही उसे बंद किया जा सकता है.

सरकार इस प्रक्रिया में जाने से इसलिए बची कि निगम इतने घाटे में था ही नहीं. वहीं औद्योगिक विवाद अधिनियम के मुताबिक किसी उद्योग को बंद करने से पहले संबंधित प्राधिकरण की मंजूरी लेना जरूरी होता है. लेकिन इस मामले में राज्य सरकार ने केंद्र के श्रम विभाग से मंजूरी नहीं ली."

ऐसे निगम सड़क पर आया

बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने बताया, "उनके सामने निगम को बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. हर साल करोड़ों रूपये का घाटा हो रहा था. इसलिए सरकार ने परिवहन सेवा की व्यवस्था से हाथ खींचने में ही अपनी भलाई समझी.

चुनाव से पहले सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ग्रामीण इलाकों में एक हजार छोटी बसें चलाने की घोषणा की थी

लेकिन निगम के कई पूर्व मुख्य प्रबंधकों का आरोप है कि नेताओं की बसें चलवाने के लिए यह खेल खेला गया. निगम के पूर्व मुख्य प्रबंधक केएल जैन बताते हैं, "प्रदेश में अवैध बसों का परिचालन तो शुरू से होता रहा और ये निगम की आय में सेंध भी लगाती रहीं. लेकिन जितनी आमदनी होती थी उससे निगम का खर्च आराम से चलता था. असल गड़बड़ी 1991 के बाद से तब हुई जब सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को परिवहन निगम का अध्यक्ष बनाया जाने लगा और और उन्होंने अधिकारियों से सारे अधिकार छीनते हुए कई गलत फैसले किए. फिर उन्होंने निगम के अधिकारीयों के साथ मिलकर ही कई गड़बड़ियां कीं जिससे निगम की बसों पर हमेशा के लिए ब्रेक लग गया."

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पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के मुताबिक, "इससे उसे प्रतिमाह पांच करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा था. निगम की प्रतिमाह की आमदनी 10 करोड़ 20 लाख रुपये थी. जबकि खर्च था प्रतिमाह 14 करोड़ रुपये. यानी आमदनी और खर्च के बीच का घाटा 3 करोड़ 80 लाख रुपये था."

दूसरी तरफ, पूर्व मुख्य प्रबंधक केएल जैन का कहना है, "राष्ट्रीयकृत मार्गों पर निजी वाहनों के अवैध संचालन के कारण सरकारी बसें घाटे में चलने लगीं. ऐसी स्थिति में यदि सिर्फ अवैध बसों से होने वाले घाटे को ही ठीक किया जाता तो निगम घाटे के बजाय लाभ में आ सकता था. निगम ने ऐसी अवैध बसों की सूची भी राज्य सरकार को सौंपी थी. लेकिन राज्य सरकार ने निगम को ही बंद कर दिया."

पूर्व मुख्य प्रबंधक केएल जैन इसके लिए नीचे बताई जा रहीं अनियमितताओं को जिम्मेदार मानते हैं:

निगम के पूर्व मुख्य प्रबंधक भागीरथ प्रसाद के कार्यकाल 1992-94 में बसों की संख्या 1,800 थी और कर्मचारियों की संख्या थी साढ़े 10 हजार. इनमें से डेढ़ हजार कर्मचारियों को कम किया जाना था. लेकिन उल्टे राजनीतिक फैसले के चलते 450 कर्मचारियों की भर्ती की गई. इसमें विधायक, मंत्रियों के करीबियों को भर्ती के आरोप सामने आएं. इससे बस और कर्मचारी के बीच का अनुपात इस हद तक बिगड़ गया कि एक बस पर कई-कई कर्मचारी सवार हो गए.

''राष्ट्रीयकृत मार्गों पर निजी वाहनों के अवैध संचालन के कारण सरकारी बसें घाटे में चलने लगीं''

पूर्व मुख्य प्रबंधक यूके सॉमल के कार्यकाल 1995-97 में निगम की तीन वर्कशॉप ऐसी थीं जिनसे निगम खुद प्रतिमाह बसों का निर्माण कर सकता था. इसके बावजूद सॉमल ने गोवा की एक निजी कंपनी से दोगुनी कीमत पर 400 से अधिक बसें खरीदीं.

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इसी तरह, के. सुरेश के कार्यकाल 1998-2001 में 16 निजी वित्तीय कंपनियों से एक हजार बसें खरीदने के लिए 90 करोड़ रुपये का कर्ज ऊंची ब्याज दर पर लिया गया. 16 प्रतिशत ब्याज दर पर तीन साल के लिए लिये गए इस कर्ज में शर्त यह रखी गई कि यदि किस्त समय पर नहीं चुकाई तो निगम को 18 से 36 प्रतिशत ब्याज की दर से भुगतान करना पड़ेगा. जबकि उस समय राष्ट्रीयकृत बैंकों की अधिकतम ब्याज दर 10 प्रतिशत थी. यह मामला इस समय मध्य-प्रदेश लोकायुक्त विभाग में लंबित है.

निजीकरण को बताया आखिरी मार्ग

निगम से जुड़े कुछ बड़े फैसलों ने ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया. घाटे की स्थिति से उबरने के लिए राज्य सरकार के पास तीन मार्ग थे. इसमें से उसने कम आर्थिक बोझ वाले दो मार्गों को छोड़कर सबसे अधिक बोझ वाले मार्ग को चुना.

पहला मार्ग निगम की बसों का पूर्ण सुदृढ़ीकरण करके संचालन का था. इसमें 1,400 करोड़ रुपये का खर्च आता.

दूसरा मार्ग निगम को पुनर्गठित करके बसों को सीमित मार्गों में चलाना था. इसमें 900 करोड़ रुपये का खर्च आता.

लेकिन राज्य सरकार ने 1,600 करोड़ रुपये के खर्च वाला आखिरी मार्ग चुनते हुए निगम में ताला डाल दिया.

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मप्र अनुबंधित बस ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्याम सुंदर शर्मा कहते हैं, "यदि निगम में घाटा था तो सरकार को बताना चाहिए था कि उसने उबारने के लिए क्या किया. घाटे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने की बजाय उसने ऐसे अधिकारियों को ऊंचे पदों पर बैठाया. इससे लगता है कि नेताओं ने एक साजिश के तहत निगम बंद करवाया."भले ही नेताओं के लिए निगम एक चरागाह रहा हो, लेकिन जिन अधिकारियों पर इसे बचाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी थी उन्होंने भी इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

First published: 7 June 2016, 0:00 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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