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मध्य प्रदेश: प्रेस के प्रेशर में फैला रियल एस्टेट का धंधा

शिरीष खरे | Updated on: 4 August 2016, 9:24 IST

इन दिनों जब कांग्रेस के बंद पड़े मुख्यपत्र 'नेशनल हेरल्ड' को दो अन्य समाचार पत्रों नवजीवन और कौमी आवाज के साथ फिर से शुरू करने के कयास लगाए जा रहे हैं. इस बीच मध्य प्रदेश सरकार के एक फैसले पर कम ही लोगों की नजर है जो इसी अखबार से जुड़ा है. 

दरअसल, प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा राजधानी भोपाल में तीन दशक पहले कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेरल्ड के हिंदी अखबार 'नवजीवन' को रियायती दर पर दी एक एकड़ से अधिक जमीन का आवंटन दो वर्ष पहले ही निरस्त कर दिया था. 

वजह यह बताई गई कि अखबार चलाने के नाम पर आवंटित इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग हुआ है और इसीलिए सरकार यहां खड़ी व्यावसायिक इमारतों को अधिग्रहित करने के बारे में सोच रही है.

मध्यप्रदेश में साजिशों का बीफ

मगर शहर के व्यावसायिक क्षेत्र महाराणा प्रताप नगर के नजदीक स्थित प्रेस कॉम्प्लेक्स में यह अकेला मामला नहीं है. सरकार की ही मानें तो यहां तीन दर्जन से अधिक अखबारों द्वारा जमीन की लीज संबंधी प्रावधानों का मनमाने तौर पर उल्लंघन जारी है. 

30 साल की लीज पर दिए गए अधिकतर भूखंडों की लीज साल 2012 के पहले समाप्त हो चुकी है

इसीलिए सरकार ने एक दशक पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अखबारों को व्यावसायिक गतिविधि मानते हुए सभी भूखंड आवंटियों को व्यावसायिक दर से रकम वसूलने के नोटिस जारी किए थे.

कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार अखबार मालिकों से 500 करोड़ रुपए से भी अधिक की यह रकम अब तक वसूल नहीं कर पाई है. 30 साल की लीज पर दिए गए अधिकतर भूखंडों की लीज साल 2012 के पहले समाप्त हो चुकी है.

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एक भी लीज का नवीनीकरण न होने के बावजूद प्रेस मालिकों के लिए प्रेस कॉम्प्लेक्स व्यावसायिक गतिविधियों का गढ़ बना हुआ है. वहीं, सरकार पर इसका सीधा असर हर वर्ष राजस्व में हो रहे करोड़ों रुपए के नुकसान के तौर पर पड़ रहा है.

मध्य प्रदेश के अखबार भोपाल में रियायती दर और सिर्फ प्रेस गतिविधियों के संचालन की शर्त पर हासिल भूखंडों का सालों से व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैं, लेकिन भूखंड आवंटन रद्द करना तो दूर सरकार उनसे अब तक जुर्माना भी वसूल नहीं कर पाई है.

किसने और कैसे शुरू किया खेल

रियायत पर हुई इस गड़बड़ी की शुरुआत अस्सी के दशक में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अर्जुन सिंह के उस फैसले से जुड़ी है जिसमें उन्होंने भोपाल की बेशकीमती जमीन के 22 एकड़ क्षेत्र को प्रेस परिसर बनाने के लिए आरक्षित किया. तब दो रुपए 30 पैसे प्रति वर्ग फुट के हिसाब से 39 भूखंड बांटे गए थे. 

भोपाल विकास प्राधिकरण ने इस बड़े क्षेत्र को विकसित करने का बोझ भी अपने खर्च पर उठाते हुए अखबारों के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति जैसी तमाम सुविधाएं दीं.

प्रदेश बनने के पहले मध्य भारत के तमाम नामी अखबारों का मुख्य केंद्र नागपुर था. 1956 में जब मध्य प्रदेश नक्शे पर आया और भोपाल उसकी राजधानी बनी तो अखबारों ने भोपाल की तरफ कूच किया. 1980 में सूबे की बागडोर दिवंगत अर्जुन सिंह के हाथों आई. उन पर आरोप है कि उन्होंने मीडिया को उपकृत करने के लिए यह योजना बनाई.

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हालांकि करार की शर्तों में साफ था कि अखबार मालिक अपने प्रेस से अलग कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं करेंगे. मगर समय के साथ रियल इस्टेट का कारोबार चढ़ते ही जब भूखंडों के भाव आसमान छूने लगे तो मुनाफा कमाने में अखबार मालिक भी पीछे नहीं रहे. 

प्रेस कॉम्प्लेक्स का मौजूदा भाव 15 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट से अधिक है और यही वजह है कि आज प्रेस कॉम्प्लेक्स में प्रेस से अधिक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स दिखाई देते हैं.

करार के विरूद्ध अरबों का कारोबार

1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब इस कॉम्प्लेक्स का शिलान्यास किया तब पहला भूखंड नवजीवन को ही दिया गया. कहा जाता है कि कांग्रेस का अखबार होने के नाते दिवंगत अर्जुन सिंह सरकार 'नवजीवन' की प्रतियां खरीदकर उन्हें स्कूलों तक पहुंचाती थी. 

मगर वित्तीय दिक्कतों के चलते यह अखबार 1990 में बंद हो गया और आज भी इसके कर्मचारी अपने वेतन भत्तों के लिए श्रम न्यायालय में लड़ाई लड़ रहे हैं. जिस विशाल भूखंड पर कभी नवजीवन का बोर्ड लगा था, आज उसी पर विशाल मेगामार्ट और लोटस इलेक्ट्रॉनिक्स नाम के शोरूम हैं.

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इसी तरह, उदाहरण के लिए सबसे पुराने अखबारों में से एक 'नवभारत' को 1982 में जब बड़ा भूखंड दिया गया तब यह प्रदेश का सबसे तेजी से बढ़ता अखबार था. इसके मालिक स्व. रामगोपाल माहेश्वरी माहेश्वरी (बिड़ला) समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उनके पुत्र प्रफुल्ल माहेश्वरी कांग्रेस से राज्यसभा के सांसद. 

मगर अब प्रसार में यह अखबार पिछड़ गया. फिलहाल नवभारत परिसर में टाइम्स ऑफ इंडिया के अलावा वीडियोकॉन का कार्यालय है. भोपाल विकास प्राधिकरण को इसके अलावा कई अखबार मालिकों से 3 करोड़ से लेकर 50 करोड़ रुपए तक की राशि वसूलनी है.

इस मामले में नया मोड़ तब आया

एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल और अस्पताल से ठीक विपरीत मीडिया को व्यावसायिक गतिविधि मानते हुए रियायती दर पर आवंटित जमीन पर नाराजगी जताई.

साथ ही उसने राज्य सरकार को अखबारों से जमीन आवंटन की तारीख से व्यावसायिक दर पर रकम वसूलने का निर्देश भी दिया. इसके बाद आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2006 में एक सर्वे किया. 

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कैच को प्राप्त सर्वे की प्रति बताती है कि अखबार के संपादन और छपाई संबंधी कार्यों के लिए जारी हुए भूखंडों में यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर को प्रकाशकों द्वारा व्यावसायिक संपत्ति में बदल दिया गया है.

कुछ प्रकाशकों ने भूखंड बेच दिए हैं, जबकि कुछ ने उसके आधे से अधिक हिस्से पर आवासीय और व्यावसायिक परिसर बनाकर किराए पर दे दिए हैं. इसके अलावा कुछ ने अखबार के कार्यालय में ही अपनी दूसरी कंपनियों के कॉरपोरेट कार्यालय खोल दिए हैं.

भेजे जा चुके हैं नोटिस

वर्ष 2006 में बीडीए ने अनुबंध के विरुद्ध भूखंडों के उपयोग परिवर्तन को लेकर सभी प्रकाशकों को वसूली नोटिस भेजा था, लेकिन अब तक वसूली की रकम पांच गुना बढ़ने के बावजूद किसी से यह रकम नहीं ली जा सकी है.

प्रकाशकों का तर्क है कि यदि उन्हें आवंटन के दौरान ही यह स्पष्ट कर दिया जाता कि बाद में उनसे बाजार दर पर कीमत वसूली जाएगी तो हो सकता है कि वे अपना अखबार यहां की बजाय कहीं और से चलाते. सीधी टिप्पणी से बचते हुए कई प्रकाशक भी चाहते हैं कि कोई आसान रास्ता निकले, ताकि चुनाव के ठीक पहले सरकार द्वारा डाले जाने वाले दबाव से वे बच सकें.

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'नवजीवन' की लीज निरस्त करने वाले तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया बाकी अखबारों पर कार्रवाई के संबंध में यह तो बताते हैं कि उन्हें प्रेस के नाम पर चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की पुख्ता जानकारी है, लेकिन वे उन पर कार्रवाई की समय सीमा को लेकर कुछ नहीं बताते. इस प्रकरण में वर्तमान आवास एवं नगरीय विकास मंत्री माया सिंह कहती हैं, "राज्य सरकार इस संबंध में जल्द ही कोई फैसला लेगी."

दूसरी तरफ इस मामले में दिग्विजय सिंह से लेकर उमा भारती के कार्यकाल तक कई समितियां बनीं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. दरअसल, प्रेस मालिकों और सरकार के बीच यह जमीन सत्ता संतुलन का केंद्र बन चुकी है. 

अखबार मालिक जहां अपनी दुखती रग से बखूबी वाकिफ हैं, वहीं सरकार भी यह जानती है कि यदि उसने कार्रवाई की तो सारा प्रेस उसके खिलाफ एकजुट हो जाएगा.

First published: 4 August 2016, 9:24 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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