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बेजवाड़ा विल्सन: मेरा पुरस्कार उनको, जिन्होंने रोजी-रोटी के ऊपर स्वाभिमान को तवज्जो दी

श्रिया मोहन | Updated on: 30 July 2016, 7:38 IST

कर्नाटक के सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन को मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार की बात दृढ़तापूर्वक करने के लिए साल 2016 के मैग्सेसे पुरस्कार के लिए नामित किया गया है. 50 वर्षीय विल्सन ने अपना अधिकांश जीवन मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने में लगा दिया है.

1994 से वह सफाई कर्मचारी आन्दोलन (एसकेए) के संयोजक है. इसकी स्थापना उन्होंने हाथ से मैला सफाई और सूखा शौचालय निषेध कानून-1993 के पारित होने के तुरन्त बाद की थी. विल्सन का पूरा जीवन संघर्ष इसी उद्देश्य पर केन्द्रित रहा है कि मैला ढोने वालों को उनका अधिकार मिले, यह कुप्रथा खत्म हो और वे सम्मानजनक जीवन जी सकें.

विल्सन एक सच्चे आंबेडकरवादी हैं. उन्होंने इस साल आंबेडकर की 125वीं जयंती पर भीम यात्रा के जरिए मैला ढोने की प्रथा को बंद कराने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है. सफाई कर्मचारियों के साथ समानता और न्याय के अधिकार को लेकर मैला ढोने के काम में लगे लोगों से भरी बस निकाली गई है. यह बस यात्रा 125 दिनों में 30 राज्यों के 500 जिलों से होकर गुजरेगी.

विल्सन के साथ ही चेन्नई के शास्त्रीय संगीतकार टीएम कृष्णा को भी संगीत के माध्यम से समाज में बदलाव लाने के लिए किए गए प्रयासों के लिए मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया जाएगा.

विल्सन ने कैच से उन सब मुद्दों पर बात की कि यह पुरस्कार उनके लिए क्या मायने रखता है और आज भी उग्र सुधारवादी क्रांति की भारत में क्यों जरूरत है. वो कहते हैं कि भारत के संविधान प्रतिबंधित होने के बावजूद इस प्रथा का उन्मूलन नहीं हो सका है. विल्सन से बातचीत के अंश:

आपको मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने की बात करने के लिए मैग्सेसे पुरस्कार मिला है. इस पुरस्कार का आपके लिए क्या मायने है?

यह पुरस्कार उन महिलाओं को जाता है जो 4,000 साल की गुलामी के बाद अभी भी हिम्मत के साथ इंसान का मल-मूत्र अपनी टोकरी में उठाकर फेंकती हैं. और इसके बावजूद सरकार ने अभी तक उनके जीवनयापन के लिए कोई वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध नहीं कराई है. वे अपने जीवनयापन के लिए इसे अपनाती हैं, इसे तवज्जो देती हैं. ऐसे में मेरा यह सम्मान उनको ही जाता है.

विल्सन का लक्ष्य है, मैला ढोने वालों को उनका अधिकार मिले, यह कुप्रथा खत्म हो और वे सम्मानजनक जीवन जी सकें

शुष्क शौचालयों का मैला ढोने वालों के लिए सम्मान और न्याय सुनिश्चित कराने के दशकों लंबे संघर्ष के बाद आप भविष्य के अपने संघर्ष के मद्देनजर इस पुरस्कार को किस नजरिए से देखेंगे?

हम इस समय देश में सीवर और सैप्टिक टैंकों में गिर जाने के कारण होने वाली मौतों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं. आज यह मुद्दा सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है. सालों से इस मुद्दे को अनदेखा किया जाता रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय में मेहतरों के मैनहोल में जाने पर रोक भी लगा दी गई है, पर हकीकत में कुछ नहीं हुआ है. 1993 के बाद से होल में गिरकर मर जाने वालों को समुचित क्षतिपूर्ति राशि भी नहीं दी गई है. जहां थोड़ी बहुत क्षतिपूर्ति राशि दी भी गई है, वह सिर्फ दो-तीन लाख रुपए दी गई है. इतनी कम रकम देने के विरोध में आवाज उठी है. दस लाख की राशि तो हर परिवार को दी ही जानी चाहिए.

इस पुरस्कार से इन्हीं सब मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने में मदद मिलेगी. सिविल सोसाइटी को भी इस मुद्दे पर आगे आना चाहिए. सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम पर भी समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए. इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि किसी को जान जाने का डर नहीं रहेगा.

आपकी ऐसी कोई योजना जिस पर आप पुरस्कार की राशि खर्च करेंगे?

पुरस्कार की यह राशि प्रत्यक्ष रूप से सफाई कर्मचारियों के पुनरुद्धार में खर्च की जाएगी विशेषकर उन महिलाओं के ऊपर ताकि वे अपने जीवनयापन के लिए अन्य वैकल्पिक साधन उत्पन्न कर सकें. हम एक ट्रस्ट बनाएंगे और उस धन से ऐसे लोगों को समर्थ बनाएंगे ताकि वे अपने जीवनयापन के लिए अन्य साधन जुटा सकें.

जब से मुझे पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है, तब से ऐसे लोगों का तांता लगा हुआ है जो और ज्यादा राशि देना चाहते हैं. हम एक ट्रस्ट बनाएंगे और उनके संरक्षण के लिए व्यापक योजना तैयार करेंगे.

कुछ माह पहले आपने डॉ. आंबेडकर की 125वीं जयन्ती पर मैला ढोने वालों को एकजुट करने और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए महत्वाकांक्षी भीम यात्रा की शुरुआत की थी. संभवत: यह समाज में बदलाव लाने के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम था. एक सच्चे आंबेडकरवादी होने के नाते आप क्या यह सोचते हैं कि भारत में आज इसकी सर्वाधिक जरूरत है?

हमारे देश में आंबेडकर हमेशा से उतने ही प्रासंगिक हैं. दुर्भाग्य तो यह है कि केवल चुनावों के दौरान ही उनकी प्रशंसा में कसीदे पढ़े जाते हैं. उन नारों को याद किया जाता है. उनका वास्तविक मिशन तो बड़े पैमाने पर भुला दिया गया है. आंबेडकर ने संविधान में सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी के संरक्षण को प्रमुखता दी थी. हर किसी के मौलिक अधिकारों का संरक्षण संविधान की विशेषता है. आंबेडकर का खुद का मानना था कि भारतीय समाज लोकतांत्रिक बने. उनकी सुगंध तो संविधान में देखी जा सकती है. उनको सम्मानित करने का सबसे अच्छा रास्ता यही है कि उनके बनाए संविधान को पूर्णता में लागू किया जाए. यही सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्रांति होगी जिसकी भारत को जरूरत है.

आप अपने समर्थकों को आज क्या संदेश देना चाहेंगे?

आज हमें जो मान्यता मिली है, उससे हमारी जिम्मेदारियां और बढ़ गईं है. मैं अपनी सफाई कर्मचारी आन्दोलन (एसकेए) टीम से अनुरोध करूंगा कि वे और जिम्मेदारियां लेकर इस पुरस्कार को हमारे लोगों तक फिर से भेंट करें. हम यह सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक रूप से काम करेंगे कि इस देश की दो लाख महिलाएं जो अभी भी मानव के मल-मूत्र की सफाई के लिए अभिशप्त हैं, उन्हें जल्द से जल्द इस काम से झुटकारा मिले. यही हमारा सच्चे अर्थो में लिबरेशन डे होगा.

First published: 30 July 2016, 7:38 IST
 
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