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महाराष्ट्र निकाय चुनावः नागपुर में आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार को वोट देंगे मोहन भागवत

अश्विन अघोर | Updated on: 15 February 2017, 8:18 IST

 

2014 में लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी का मनोबल काफी ऊंचा है. भाजपा नेता दावा करते आए हैं कि इस जीत ने साबित कर दिया है कि भाजपा ही वोटरों की पहली पसंद है. पार्टी दावा कर रही है कि हाल ही हुए नगर पंचायत और नगर पालिका चुनाव के नतीजे इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं.

पिछले चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरने के बाद से ही दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट नेताओं ने भाजपा में शामिल होना शुरू दिया था. भाजपा ने भी दिल खोल कर दूसरी पार्टियों से आए सैंकड़ों नेताओं का स्वागत किया और पार्टी में शामिल कर लिया. इनमें से ज्यादातर नेता आपराधिक रिकॉर्ड वाले थे.


उन्हें पार्टी में केवल इसी आधार पर शामिल किया गया कि वे सभी निकाय चुनाव में जीत के दावेदार थे. साथ ही इन सभी को पार्टी ने टिकट भी दिया. यहां तक कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भी इनमें से एक को वोट देना ही पड़ेगा क्योंकि वे नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन से चुनाव लड़ रहे हैं और भागवत इसी वार्ड में मतदान करते हैं.


बृहन् नगर मुंबई नगरपालिका (एमसीजीएम) चुनाव जीतने के प्रयास में भाजपा ने बहुत से ऐसे बाहरी उम्मीदवार खड़े कर दिए, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं. ये सारे लोग अपनी पार्टियां छोड़ कर भाजपा में सिर्फ इसलिए आए कि उनकी अपनी पार्टियों ने उन्हें टिकट नहीं दिए. अब भाजपा अपनी जीत के प्रति तो आश्वस्त हो गई लेकिन बहुत सारे वोटरों की कीमत पर.


भाजपा में आपराधिक नेताओं की फ्री इनकमिंग भाजपा के लिए बहुत अच्छी नहीं रही क्योंकि भले ही इन नेताओं को पार्टी में शामिल करने का मापदंड भाजपा ने इनके ‘चुनाव जीतने की क्षमता’ रखा हो लेकिन भाजपा को जनता की नाराजगी भी झेलनी पड़ सकती है. हो सकता है मतदाता वोट देने ही नहीं आएं.

 

शिवसेना का घर-घर प्रचार


दूसरी ओर शिवसेना के लिए उसके कार्यकर्ताओं का मजबूत वोटर आधार ही उसका मजबूत पक्ष है. सेना के कार्यकर्ता घर-घर जाकर मतदाताओं से उनके पक्ष में वोट डालने को कह रहे हैं. यही कारण है कि सेना एमसीजीएम चुनाव में सर्वाधिक सीटें
जीत पाई.

मुंबई भर में शिवसेना की शाखाएं आम जनता से सम्पर्क का सशक्त माध्यम रही हैं. ये शाखाएं पार्टी पदाधिकारियों और संबंधित क्षेत्र के लोगों के लिए मिलने का केंद्र रहे हैं. शिवसेना में यह परम्परा भी रही है कि यह पार्टी चुनावों के लिए एक साल पहले ही सक्रिय हो जाती है. साल भर पहले से ही शिव सैनिक अपने अपने क्षेत्र में वोटरों को रिझाने के लिए महिला, पुरुषों और युवाओं से मिलना शुरू कर देते हैं. इसी दौरान वे अपने वोटर ‘पक्के कर लेते’’ हैं और मतदान की तिथि तक उनका ‘‘खास खयाल’’ रखा जाता है.


वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार गणेश तोर्सेकर ने कहा, ‘शिवसेना कभी भी विशुद्ध रूप से राजनीतिक पार्टी नहीं रही. यह सामाजिक कार्यों को समर्पित एक पार्टी रही है. ठाकरे हमेशा यही कहते थे कि शिवसेना का ध्येय सदा यही रहेगा कि वह 80 प्रतिशत समाज सेवा करेगी व 20 प्रतिशत राजनीति.


सेना की शाखाएं दरअसल सामाजिक कार्यों का केंद्र रही हैं. आम मराठी कोई भी विवाद सुलझाने के लिए पुलिस स्टेशन के बजाय पहले शिवसेना की शाखा पर जाते हैं. लोग सेना की शाखा में घरेलू से लेकर कामकाज तक की समस्या हल करवाने आते हैं. मुंबई में शिवसेना की इसी लोकप्रियता के चलते भाजपा पीछे छूट जाती है.


भाजपा को 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इसलिए आसान जीत मिली क्योंकि उस वक्त देश भर में मोदी लहर चल रही थी. इसी लहर के चलते भाजपा केंद्र और राज्य में सरकार बनाने में कामयाब रही. परन्तु आज स्थिति अलग है. कुछ दोस्त अब दुश्मन हो चले हैं. गठबंधन टूट चुके हैं. इससे भाजपा की चिंताएं बढ़ी ही हैं. पार्टी के जिन कार्यकर्ताओं को निकाय चुनाव में टिकट की आस थी, उनकी उम्मीदों पर भी पानी फिर गया.

इन मुसीबतों से पार पाने के लिए भाजपा को अब आरएसएस का ही सहारा है. महाराष्ट्र में संघ के स्वयंसेवक मतदाताओं को वोट करने के लिए मनाएंगे. निकाय चुनाव में कार्यकर्ताओं की मेहनत ही वोटें में बदलती है. पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच बड़े पैमाने पर असहमति भाजपा को भारी पड़ सकती है. लगभग सारे ‘बाहरी’ नेताओं को पार्टी ने टिकट दिया है.


नाम न बताने की शर्त पर एक भाजपा पदाधिकारी ने कहा ‘हालांकि पार्टी ने जीत के लिए ऐसा किया है लेकिन पार्टी के इस कदम ने कई पार्टी कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया है. इनमें से कुछ ऐसे हैं जो पिछले बीस साल से पार्टी को सेवाएं दे रहे है.’

 

संघ का सहारा


भाजपा हर बार की तरह इस बार भी निकाय चुनाव के लिए संघ की ओर देख रही है. संघ के समाज के साथ जुड़ाव और स्वयंसेवको के सम्पर्कों के चलते भाजपा को ज्यादा से ज्यादा वोट मिलेंगे. 2014 के चुनावों में संघ की ताकत आजमाई जा चुकी है. उस वक्त ठाणे के पास डोंबी वली में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने संघ के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर दी थी. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप स्वयंसेवकों ने ऐसा जनसम्पर्क किया कि हर भाजपा मतदाता को एनसीपी के खिलाफ वोट करने के लिए तैयार कर लिया गया. उन्होंने कहा, इस बार भी हम संघ की मदद लेंगे.


अपनी चुनावी रणनीति के तहत भाजपा ने हिन्दी, गुजराती भाषी क्षेत्रों और दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में संभावित वोटरों के बारे में मालुमात करने के लिए स्वयंसेवकों को तैनात कर दिया है. इससे भाजपा को शिवसेना और मनसे के गढ़ माने जाने वाले मराठी प्रभुत्व वाले इलाके में सेंध लगाने का मौका मिल सकता है. भाजपा ने बृहन् मुंबई निकाय चुनाव प्रचार पर निगरानी रखने के लिए एक वार रूम भी बनाया है, इसमें दिन-रात 200 लोग काम कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर विरोधियों को जवाब देने के लिए तकनीकी तौर पर कुशल युवाओं को नियुक्त किया गया है.

 

First published: 15 February 2017, 8:18 IST
 
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