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बिहार का महागठबंधन: संविधान बचाने की लड़ाई या जान बचाने की लड़ाई !

आदित्य साहू | Updated on: 20 December 2018, 18:30 IST

बिहार में साल 2019 लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन का एलान हो गया है. इसके साथ ही बीजेपी और एनडीए गठबंधन के लिए खतरे की घंटी बज गई है. अभी तक एनडीए में शामिल रहे आरएलएसपी पार्टी के अध्यक्ष उपेेंद्र कुशवाहा काग्रेस नेता अहमद पटेल, शक्ति सिंह गोहिल, राजद नेता तेजस्वी यादव और हम पार्टी के अध्यक्ष और बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी के सामने महागठबंधन में शामिल हो गए.

इस दौरान तेजस्वी यादव ने कहा कि हम सब सत्ता के लिए नहीं बल्कि संविधान बचाने के लिए एक साथ आ रहे हैं. तेजस्वी ने कहा कि चाचा नीतीश में मैनडेट का रेप करने का काम किया. इस सरकार में कुछ लोगों का हित सोचने का काम हुआ है. देश में तानाशाही, और घटक दलों का पर भी तानाशाही चलाई जा रही है.

महागठबंधन में शामिल होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि उनका एनडीए में अपमान किया जा रहा था. कुशवाहा का कहना था कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें नीच कहकर अपमानित किया है. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और लालू यादव की जमकर तारीफ भी की. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और लालू जी ने उदारता दिखाई. 

इस मौके पर राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि यह संविधान को बचाने की लड़ाई है. यह देश को बचाने की लड़ाई है. उन्होंने कहा कि यह उनके खिलाफ लड़ाई है, जिन्होंने जनता को सिर्फ धोखा देने का काम किया है. इस पर सवाल उठ रहा है कि क्या यह संविधान बचाने की लड़ाई है या दल बचाने की लड़ाई है?

दरअसल, आरएलएसपी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा अभी तक एनडीए का हिस्सा रहे हैं. वह केंद्र की मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा एनडीए गठबंधन से तब अलग हुए जब उन्हें लगा कि उन्हेें उतनी सीटें नहीं मिल रही हैं जितनी सीटें वह चाहते थे. वह साल 2014 लोकसभा चुनाव में मिली सीटों के हिसाब से ही इस बार भी सीटेंं मांग रहे थे. इस दौरान वह कई दिनों तक पीएम मोदी से मिलने का इंतजार करते रहे.

आखिर में जब उपेंद्र कुशवाहा को महसूस हुआ कि उन्हें उनके हिसाब से सीटें नहीं मिलीं तो वह एनडीए गठबंधन से अलग हो गए. बता दें कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत हासिल हुई है. वहीं बीजेपी को 22 और राम विलास पासवान की पार्टी एलजेपी को 6 सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

वहीं पिछली बार एनडीए गठबंधन से अलग रही नीतीश कुमार की पार्टी को 2 सीटों से संतोष करना पड़ा था. इसके अलावा राजद को 4 सीट, कांग्रेस को 2 सीट और एनसीपी को एक सीट मिली थी. साफ है कि पिछली बार एनडीए गठबंधन से अलग रही पार्टियों ने मिलाकर कुल 9 सीटें जीती थीं. वहीं एनडीए में बीजेपी को छोड़कर दो दलों ने ही अकेले 9 सीटें जीत ली थीं.

एक बीजेपी नेता ने इस बाबत कहा कि आज जरूर देश में पीएम मोदी की उस तरह की लहर नहीं है जिस तरह की साल 2014 के आम चुनाव में थी. लेकिन फिर भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता आज भी पीएम मोदी ही हैं. अगर पिछली बार की ही तरह इस बार भी उनकी आंधी चल गई तो बाकी पार्टियों को अपना अस्तित्व बचाने के लाले पड़ जाएंगे. यही वजह है कि सारी पार्टियां चुनाव से पहले बीजेपी के खिलाफ इकट्ठी होकर संविधान बचाने की नहीं बल्कि अपनी जान बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं.

First published: 20 December 2018, 18:10 IST
 
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