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महाजटिल हुआ 40 बरस से चल रहा महानदी विवाद

शिरीष खरे | Updated on: 28 July 2016, 7:39 IST
QUICK PILL
  • महानदी के कछार को लेकर ओडिसा और छत्तीसगढ़ के बीच करीब चार दशकों से विवाद चल रहा है.
  • केंद्र इस प्रकरण में कई बार हस्तक्षेप कर चुका है. 28 अप्रैल, 1983 को दोनों राज्यों के बीच समझौता भी हो चुका है.
  • तब अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिवंगत अर्जुन सिंह और ओडिसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत जेबी पटनायक ने हस्तक्षर भी किए थे.

महानदी के पानी को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिसा के बीच चल रही लड़ाई अब और गहराने लगी है. बीते दिनों दोनों राज्यों के सांसद, विधायक और आला अधिकारी कई बार इस मुद्दे पर आमने-सामने आ चुके हैं. छत्तीसगढ़ सरकार की प्रस्तावित जलाशय परियोजना का मुद्दा 25 जुलाई को संसद में भी गूंजा.

बीजू जनता दल के सांसद भर्तृहरि महताब द्वारा लाए गए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में महानदी पर बनाई जा रही परियोजनाओं पर रोक लगाने का दबाव बनाया गया. इसके बाद सदन में दोनों राज्यों के सांसद आपस में उलझ गए. रायपुर के सांसद रमेश बैस और राजनांदगांव सांसद अभिषेक सिंह ने ओडिसा के हितों को नुकसान पहुंचाए जाने के आरोपों को निराधार बताया. 

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करीब एक घंटे चली चर्चा के बाद लोकसभा में केंद्रीय जल संसाधन विकास मंत्री उमा भारती ने दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर उपजे विवाद का समाधान जल्द निकालने का आश्वासन दिया.

इसके लिए केंद्रीय जल संसाधन विकास मंत्रालय ने केंद्रीय जल आयोग की मध्यस्थता में 29 जुलाई को दोनों राज्यों के आला अधिकारियों की एक बैठक बुलाई है. मगर इन सबके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि यह विवाद जल्द सुलझेगा.

छत्तीसगढ़ पहुंचे ओडिसा के विधायक

जिस दिन यह पूरा मामला संसद में उठा ठीक उसी दिन यानी 25 जुलाई को ओडिसा विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष नरसिंह मिश्रा और छह कांग्रेस विधायक बांध विशेषज्ञों और अधिकारियों के साथ छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में पहुंच गए.

उनके दौरे के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाए. इस दौरान पार्टी के कई कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया. वहीं ओडिसा से आई टीम ने केलो, साराडीह बांध और कलमा बैराज का निरक्षण करने के बाद छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग के अधिकारियों से तकनीकी जानकारी मांगी.

इस प्रकरण में दोनों राज्यों के नेताओं के अपने-अपने तर्क और दावे हैं. ओडिसा विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष नरसिंह मिश्रा का कहना है, 'छत्तीसगढ़ सरकार को जनता की चिंता नहीं है. ऐसा यहां के बांध और बैराज को देखकर लग रहा है. यहां छह बैराज उद्योगों की राशि से बनाए जा रहे हैं. इससे फायदा उद्योगों को मिलने वाला है.' 

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वहीं, रायपुर से सांसद रमेश बैस मानते हैं, 'महानदी का 86 प्रतिशत जलग्रहण क्षेत्र छत्तीसगढ़ में होने के बावजूद वह केवल 20 प्रतिशत पानी का उपयोग कर पा रहा है. दो परियोजनाओं को छोड़कर शेष सभी परियोजनाएं लघु स्तर की है, जिसकी जानकारी ओडिसा को देना जरूरी नहीं.'

राजनांदगांव के सांसद अभिषेक सिंह ने बातचीत से समाधान निकालने के लिए नदी घाटी संगठन बनाने की मांग की है. दूसरी तरफ इस प्रकरण को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने प्रदेश में नई जल-नीति बनाने की मांग की है.

अंतरराज्यीय नदियों के पानी का बंटवारा संवेदनशील मामला है, इसका राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए

नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक टीएस सिंहदेव ने पत्र लिखकर कहा कि जल संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकताएं तय कर पाना एक चनौतीपूर्ण कार्य बन गया है. उन्होंने सवाल किया कि सरकार यह कैसे तय कर रही है कि लोगों को पेयजल, सिंचाई, निस्तार और व्यावसायिक जरुरतों को किस अनुपात और कितनी दर पर कितना पानी दिया जाए?

दूसरी तरफ, मुयख्मंत्री डॉ. रमन सिंह ने पूरे विवाद को महज राजनीति से प्रेरित बताते हुए इसे खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ इस मामले में पीछे हटने वाला नहीं है. 

उन्होंने कहा, 'अंतरराज्यीय नदियों के पानी का बंटवारा संवेदनशील मामला है, इसका राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए. सभी बैराज परियोजनाओं को मिलाने पर भी केवल 3,100 हेक्टेयर में सिंचाई संभव है. यह सभी लघु सिंचाई परियोजनाएं है. इसके लिए केंद्रीय जल आयोग से अनुमति अनिवार्य नहीं है.'

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वहीं, छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने तो महानदी प्रकरण में ओडिसा को ही जिम्मेदार ठहरा दिया. 

उनका कहना है, 'महानदी में अधिकतर पानी बरसात में आता है. दो वर्षों के दौरान सूखे की स्थिति के बावजूद हीराकुंड बांध में 80 प्रतिशत जलभराव था. सामान्य स्थिति में जलग्रहण क्षमाता का तीन गुना पानी हीराकुंड बांध से बहकर समुद्र में चला जाता है, पानी की इस बर्बादी को ओडिसा पहले रोके.'

ओडिसा की आपत्ति की वजहें

ओडिसा से बीजद सांसद दिलीप तिर्की के मुताबिक छत्तीसगढ़ की परियोजना के कारण ओडिसा में महानदी के जल में एक-तिहाई की कमी आई है. ओडिसा के 15 जिलों की दो-तिहाई आबादी महानदी के जल पर निर्भर है. उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने महानदी पर कोई भी योजना बनाने से पहले ओडिसा से संपर्क नहीं किया. ऐसा करके छत्तीसगढ़ ने दोनों राज्यों के बीच 1983 में हुई संधि का उल्लंघन किया है.

बीजद सांसद भर्तृहरि महताब के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार छोटी-छोटी परियोजनाओं के नाम पर महानदी पर सात बैराज बनाएगी और यदि ऐसा हुआ तो ओडिसा के लिए घातक साबित होगा. उनका दावा है कि गैर-मानसून समय में महानदी से ओडिसा को मिलने वाला पानी नगण्य हो जाएगा और हीराकुंड परियोजना पर ताला लग जाएगा.

दोनों ही राज्यों की जीवनदायनी

महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिसा की सबसे बड़ी नदी है. इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सिहावा नाम की पहाड़ी से हुआ है. महानदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की ओर है. बंगाल की खाड़ी में गिरने तक इस नदी की कुल लंबाई 855 किलोमीटर है. 55 प्रतिशत छत्तीसगढ़ का पानी महानदी में जाता है, जबकि हीराकुंड बांध का 86 प्रतिशत जलग्रहण क्षेत्र छत्तीसगढ़ में है. हीराकुंड बांध की उपयोगी जल भराव क्षमता 5.4 बिलियन घन मीटर है.

First published: 28 July 2016, 7:39 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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