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महाराष्ट्रः एमओयू के शोर के बीच अभूतपूर्व जलसंकट की चर्चा कौन करे

अश्विन अघोर | Updated on: 22 February 2016, 21:28 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र के कई जिलों में भूजल पूरी तरह सूख चुका है. मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन में हफ्ते में दो दिन पानी की आपूर्ति नहीं होगी.
  • राज्य सरकार ने जलसंकट से निपटने के लिए टैंकरों की व्यवस्था की है. राज्य द्वारा किए गए दूसरे उपायों का असर दिखने में कई साल लगेंगे.

महाराष्ट्र सरकार द्वारा अरबों रुपये के एमओयू पर दस्तखत की खबरों के बीच इस बात की खास चर्चा नहीं हो रही है कि राज्य अभूतपूर्व जलसंकट से जूझ रहा है.

राज्य के तीन ज़िलों में भूजल पूरी तरह सूख चुका है. नतीजतन, मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन में हफ्ते में दो दिन जल आपूर्ति नहीं होगी. राज्य की जल समस्या से निपटने के लिए अधिकारियों के पास कोई ठोस योजना नहीं है. अधिकारियों को बस मॉनसून आने का इंतजार है.

गर्मियों से पहले राज्य के मराठवाड़ा इलाके की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. जल और भूमि संरक्षण कार्य के तहत राज्य में जलायुक्त शिविर योजना पर काफी काम हुआ है. लेकिन इसका परिणाम करीब चार साल बाद दिखना शुरू होगा.

ये इलाका तीन सालों से कम बारिश और सूखे से पीड़ित रहा है. इस अवधि में इस साल औसत जल संरक्षण का 30 प्रतिशत जल संरक्षित हुआ है जबकि पिछले साल इस दौरान औसत का 50 प्रतिशत जल संरक्षण हुआ था.

महाराष्ट्र की जलायुक्त शिविर योजना का असर दिखने में करीब चार साल लगेगा

मराठवाड़ा के कुओं का जलस्तर सात प्रतिशत तक गिर चुका है. राज्य सरकार इन इलाकों के गांव में टैंकरों से पानी पहुंचा रही है. पिछले साल की तुलना में टैंकरों की जल आपूर्ति पांच गुना बढ़ा दी गयी है.

राज्य के जल आपूर्ति मंत्री बबनदारो लोनिकर ने कैच को बताया, "इलाके में जो भी पानी बचा है उसे पीने के लिए संरक्षित किया जा रहा है. जलायुक्त शिविर योजना के तहत किए कार्यों का परिणाम दिखने में वक्त लगेगा."

इसके अलावा राज्य सरकार ने जलस्रोतों के दोबारा भराव के लिए 600 करोड़ रुपये की नई योजना शुरू की है.
 
राज्य के अमरावती, नागपुर और विदर्भ इलाकों में भी जलस्तर चिंताजनक है. उत्तरी महाराष्ट्र के जलाशयों में 31 प्रतिशत, अमरावती में 35 प्रतिशत और नागपुर में 37 प्रतिशत जल है. 

जहां एक तरफ राज्य जल संकट के गुजर रहा है दूसरी तरफ वाटर टैंकर मालिक और टैंकर माफिया इसमें कारोबारी फायदा देख रहे हैं. एक टैंकर पानी 2500 रुपये तक में बिक रहा है.

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वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट(डब्ल्यूएएलएआई) के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर प्रदीप पुरंदरे कहते हैं, "राज्य के ज्यादातर इलाके सूखे की चपेट में हैं. कुछ इलाकों में ज्यादा पानी की खपत वाली गन्ने जैसी फसल उगा रहे हैं. सरकार को ऐसी चीजों पर रोक लगानी चाहिए."

राज्य के कृषि मंत्री एकनाथ खड़से कहते हैं कि राज्य के तीन जिले लातूर, बीड और उस्मानाबाद पूरी तरह सूखाग्रस्त हैं. वो कहते हैं, मराठवाड़ा जलसंकट से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका है. जलसंकट के कारण इलाके के लोग गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं. हमने इस स्थिति से निपटने के लिए एक योजना बनायी है."

खड़से कहते हैं कि सरकार की इस योजना के तहत राज्य में उपलब्ध जल पर पीने के अलावा अन्य किसी प्रयोग पर अंकुश रहेगा.

राज्य सरकार ने सूखा पीड़ित 1340 गांवों में जल आपूर्ति के लिए 1751 टैंकर तैनात किया है. गंभीर संकट को देखते हुए राज्य सरकार ने पिछले हफ्ते वाटर टैंकर के नियमों में ढील दी ताकि प्रभावित इलाकों में जनता को पीने का पानी मिलता रहा.

वाटर मैन राजेंद्र सिंह कहते हैं, 'महाराष्ट्र का करीब 70 प्रतिशत इलाका गंभीर सूखे की चपेट में है'

इससे पहले तक जलस्रोत से 50 किलोमीटर से ज्यादा दूर वाटर टैंकर से पानी ले जाने पर रोक थी. खड़से कहते हैं, "जिन इलाकों में इस सीमा में पानी नहीं उपलब्ध है वहां इसमें ढील दी गयी है."

खड़से ने बताया कि पानी की ढुलाई के लिए रेल के वैगन का भी प्रयोग किया जाएगा.

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और वाटर मैन कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह बताते हैं कि महाराष्ट्र का करीब 70 प्रतिशत इलाका गंभीर सूखे की चपेट में है. वो कहते हैं, "हालात बहुत गंभीर हैं. लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं है, पशुओं के लिए चारा नहीं है. लोग शहरों में पलायन कर रहे हैं ताकि किसी छोटी-मोटी नौकरी स गुजारा कर सकें. भूजल के अविवेकपूर्ण दोहन और विकास के नाम पर बिना सोच-समझे किया गया निर्माण कार्य इसकी मुख्य वजह है."

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सिंह कहते हैं कि इसका एकमात्र समाधान है विकेंद्रीकृत वाटर मैनेजमैंट. वो कहते हैं, "राज्य की जल समस्या से उबरने का मुझे यही एक समाधान दिखता है. हम राजस्थान में पिछले तीन दशकों से इसपर काम रहे हैं. जिसके नतीजे हौसला बढ़ाने वाले रहे हैं. महाराष्ट्र में भी यही करने की जरूरत है."

सिंह पिछले एक साल से राज्य की सूख चुकी नदियों को फिर से जीवित करने की योजना में मदद कर रहे हैं.

सिंह महाराष्ट्र की जलायुक्त शिविर योजना की तारीफ करते हैं. सिंह कहते हैं, "महाराष्ट्र सरकार को इस योजना को व्यापक बनाना चाहिए. इसमें सामुदायिक भागीदारी होती है. इससे मॉनसून के दौरान जलाशयों को फिर से भरा जाएगा जिससे जलसंकट से राहत मिलेगी."

सिंह कहते हैं कि सरकार को जलसंकट से निपटने के लिए दूसरे दीर्घकालीन प्रभाव वाले उपाय भी तलाशने होंगे. वो कहते हैं, "जलसंकट का कोई फौरी उपाय संभव नहीं. चाहे सरकार जितना भी पैसा झोंक दे. इसे समस्या हल हीं होगी."

First published: 22 February 2016, 21:28 IST
 
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