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मराठवाड़ाः गांववालों ने दिया चार साल से सूखी हुई नदी को नया जीवन

अश्विन अघोर | Updated on: 15 June 2016, 8:25 IST
(विकास कुलकर्णी)

महाराष्ट्र पिछले चार साल से सूखे की विकट समस्या का सामना कर रहा है. राज्य के अनेक भाग ऐसे हैं जहां मानसून के आने तक के लिए पर्याप्त पानी है जबिक कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां पीने के लिए एक बूंद तक पानी नहीं है.

महाराष्ट्र के मराठावाड़ा क्षेत्र का लातूर जिला सबसे ज्यादा सूखा प्रभावित जिलों में एक है. लातूर शहर और जिला मीडिया की सुर्खियों में रहा है जब कुछ माह पहले ही यहां के अधिकांश जल संसाधन सूख गए और प्रशासन को पानी वितरण के समय कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए धारा 144 लागू करनी पड़ी.

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लातूर देश का पहला ऐसा शहर बन गया जहां वाटर टैंक के आसपास धारा 144 लागू करनी पड़ी. इसकी वजह यह थी कि पानी न मिलने से परेशान लोग पानी के लिए हमला कर सकते थे. अनेक राजनीतिक नेताओं ने पानी के सभी टैंकरों को अपने क्षेत्र की तरफ मोड़ लिया था. परिणामत: जिला प्रशासन को धारा 144 लागू करनी पड़ी.

लातूर में हालात के गम्भीर होते देख राज्य सरकार को शहर में ट्रेन से पानी लाने का निर्णय करना पड़ा. भयावह हालातों के चलते लातूर शहर और जिला महाराष्ट्र में सूखे के मामले में एक तरह का ब्रांड एम्बेसडर बन गया.

भयावह हालात

विकास कुलकर्णी

हालात भयावह थे और इसका कोई उपाय नहीं सूझ रहा था. इंसान, किसान और पशु प्यासे मर रहे थे और राज्य सरकार जनता को राहत दलाने के लिए सभी हर संभव प्रयास कर रही थी. फिर इसके बाद राज्य सरकार की फ्लैगशिप योजना जलयुक्त शिवार(पानी वाला खेत) आई. 

सूखे के कारण गांव के कई लोग जीविका की तलाश में पुणे और मुम्बई चले गए

योजना को काफी हर्षोल्लास के साथ लॉंच किया गया और उसे पूरे राज्य में जनता का व्यापक समर्थन मिला. लाखों लोग आगे आए और उन्होंने साइट पर काम करने के साथ ही आर्थिक सहयोग भी किया.

मराठावाड़ा के अन्य गांवों की तरह जिले के नीलांगा ताल्लुका का औराद शाहाजनी गांव भी सूखे की चपेट में था. गांव के कई लोग जीविका की तलाश में पुणे और मुम्बई चले गए थे. पशुओं को या तो बेच दिया गया था या भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था. गांव आदर्श रूप से तो तेरणा नदी के किनारे है और गांव के तीन हिस्से पानी से सराबोर रहते थे लेकिन चार साल पहले बारहमासी नदी तेरणा पूरी तरह सूख गई. 

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नदी के 70 किमी के इर्द-गिर्द पानी की एक बूंद भी खोदने पर भी नहीं मिलती थी. गांव के भयावह हालात से चिन्तित होकर मंगेशकर कालेज औराद के प्रोफेसर विकास कुलकर्णी ने कुछ करने और हालात बदलने की ठानी. उन्होंने निश्चय किया कि वे जितना कर सकते हैं, करेंगे. 

कुलकर्णी कहते हैं कि पिता के निधन के बाद मैंने कुछ समाज सेवा का काम करना शुरू किया था. उनकी पुण्यतिथि पर हर साल कुछ और भी सामाजिक कार्य कर दिया करता हूं. इसी तरह से मैंने और हमारे एक मित्र ने जल संरक्षण की परियोजना पर काम करने का निश्चय किया. हमने गांव के आसपास जन शिक्षा और जागरुकता लाने का काम करना शुरू किया. हमारा मकसद जलायुक्त शिवार योजना में भागीदारी निभाना और मृदा संरक्षण का काम करना था ताकि तेरणा नदी पुनर्जीवित हो सके.

कुलकर्णी कहते हैं कि तेरणा नदी गांव और आसपास के लिए जीवनदायनी साबित हो सकती है.

पैसे की किल्लत

विकास कुलकर्णी

नदी का उद्गम निकट के तेर गांव जैसा कि नदी के नाम से ही पता चल जाता है, से होता है. यह उस्मानाबाद जिले में है. औराद शाहाजनी गांव के पांच किमी तक नदी का पानी आसानी से मिल जाता था. चार साल पहले तक यह नदी पीने के पानी के लिए स्रोत थी. लेकिन पिछले पांच सालों से बारिश में गिरावट आती गई और नदी पूरी तरह सूख गई.

कुलकर्णी कहते हैं कि हमने तेरणा नदी के पुर्नरुद्धार के लिए धन जुटाने का प्रयास किया. इस काम में हमें जनता से ज्यादा आर्थिक सहयोग नहीं मिल सका. इसके पीछे वजह यह रही कि सूखे के चलते पहले से ही वे पीड़ित थे. वह कहते हैं कि पर उनके मित्रों जैसे माधव गोमारे, मकरन्द जाधव, त्रयमबकदास झांवेर जो 'आर्ट ऑफ लिविंग' के वालन्टियर हैं और विश्वनाथ ओलांडे जो गांव के एक ख्यातिलब्ध अध्यापक हैं, ने परियोजना के लिए आर्थिक सहायता जुटाने में बड़ी मदद की.

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नदी के 5 किमी विस्तार के लिए एक करोड़ रुपये की जरूरत थी जिसमें सोशल मीडिया से भी मदद मिली

वे कहते हैं कि इन दोस्तों और गांव वालों की मदद से इसी साल 19 फरवरी 2016 से काम शुरू हो गया और 31 मई 2016 को 3.5 किमी तक नदी को चौड़ा करने, गहरा करने का काम पूरा हो गया. कुलकर्णी कहते हैं कि शुरुआत में हम लोग परियोजन के लिए धन एकत्रित करने की समस्या से जूझ रहे थे.

नदी के पांच किमी तक के विस्तार के लिए लगभग एक करोड़ रुपए की जरूरत थी. हमने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया जहां हमें व्यापक समर्थन मिला. इसके अलावा हमें नागपुर, मुम्बई, पंजाब से भी आर्थिक सहायता मिली. दुबई के एक हितेन्द्र सिंह ने तो तीन लाख रुपए भेजे. उन्होंने अपनी शादी के खर्च के लिए जो बचाकर रखा था, उसे कम किया और जो पैसे बचे उसको परियोजना के लिए दान कर दिया.

औराद शाहाजनी गांव के निवासी प्रशान्त गिरबाने कहते हैं कि सैंकड़ों ग्रामीणों के कठिन परिश्रम के बाद जब चार साल में पहली बार प्री मानसून आने के तीन दिन पहले तेरणा नदी में पानी आया तो सभी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. कुलकर्णी कहते हैं कि इतने साल बाद नदी में पानी देखकर अपार संतुष्टि हुई. प्री मानसून की बारिश से उम्मीद की किरण जगी. यदि मानसून संतोषजनक रहा तो ग्रामीणों को पूरे साल पानी की कोई दिक्कत नहीं होगी और वे चार साल बाद अपने खेत जोत सकेंगे.

First published: 15 June 2016, 8:25 IST
 
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