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पुणे के भीमा-कोरेगांव में भड़की जातीय हिंसा से सुलगा महाराष्ट्र, कई जगह हालात खराब

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 January 2018, 9:43 IST

महाराष्ट्र के पुणे में उस समय अफरा तफरी का माहौल हो गया जब 200 साल पुराने युद्ध की बरसी थी. इस बात को लेकर यहां एक बड़ा जातीय संघर्ष छिड़ गया. सोमवार को पुणे के भीमा-कोरेगांव में बरसी पर हुए कार्यक्रम ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हो गए. फिलहाल जगह-जगह हिंसक प्रदर्शनों के बाद पुणे के अलावा मुंबई में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है. साथ ही इस हिंसक मामले में राज्य सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं.

बता दें कि पुणे में हुई इस जातीय हिंसा का असर महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में भी देखा गया है. इसके बाद मंगलवार को मुंबई के समेत हड़पसर और फुरसुंगी में भी सरकारी और प्राइवेट बसों पर पथराव किया गया. महाराष्ट्र परिवहन की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग परिवहन 134 बसों को नुकसान पहुंचा है, जबकि सैकड़ों निजी वाहनों को भी क्षति पहुंची है. इस हिंसा के बाद से औरंगाबाद और अहमदनगर के लिए बस सेवा को निरस्त कर दिया गया है. हालांकि मंगलवार की शाम को पुणे से अहमदनगर के बीच सभी बस सेवाएं को बहाल कर दिया जिसके बाद यात्रियों को राहत पहुंची.

 

इस हिंसा को लेकर मुंबई के कई हिस्सों में धारा 144 लागू कर दी गई है. वहीं, मुंबई पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) ने जानकारी दी है कि महाराष्ट्र की अलग-अलग जगहों से 100 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है. महाराष्ट्र के गृह राज्यमंत्री दीपक केसरकार ने स्थिति को नियंत्रण में बताया है कि राज्य में किसी भी तरह का कोई गलत संदेश नहीं फैलना चाहिए. इस बाबत उन्होंने कहा, "मैं सभी से शांति बनाए रखने की अपील करता हूं."

महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने इस हिंसा को लेकर कहा कि, "भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर करीब तीन लाख लोग आए थे. हमने पुलिस की 6 कंपनियां तैनात की थीं. कुछ लोगों ने माहौल बिगाड़ने के लिए हिंसा फैलाई. इस तरह की हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हमने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. मृतक के परिवार वालों को 10 लाख के मुआवजा दिया जाएगा."

आखिर क्या है भीमा कोरेगांव की लड़ाई

भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पूर्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ 500 लड़ाके, जिनमें 450 महार सैनिक थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 पेशवा सैनिक थे, मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था.

इसी के बाद हर साल एक जनवरी को महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं. यहीं वो जयस्तंभ स्थित है जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. इसको लेकर कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं.

First published: 3 January 2018, 9:43 IST
 
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