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महाराष्ट्र: अपने ही देश में क्यों परदेसी हो गए सैय्यद मदारी

शिरीष खरे | Updated on: 26 August 2016, 13:16 IST

बालीवुड में कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज बालीवुड का सुपर स्टार कहलाता है. मगर सैय्यद मदारी नाम की जमात से एक भी स्टार नहीं उभरता, ऐसा क्यों ?

दरअसल, आजादी के तीन दशक बीत जाने के बाद हिन्दी फिल्मों में जब जन आक्रोश को एक्शन का रंग-रूप दिया जाने लगा तो हीरो के ज्यादातर स्टण्ट सैय्यद मदारी ही किया करते थे. यह और बात है कि मायानगरी में 30 साल से ज्यादा बीताने पर भी इन्हें न शोहरत मिली, न दौलत. कुछ सैय्यद मदारी इसे अपनी बदकिस्मती मानते हैं तो बहुत से पहुंच न होने पर अफसोस जताते हैं.

हम हैं महाराष्ट्र के छोटे से शहर बीड़ से 80 किलोमीटर दूर आष्टी नाम के कस्बे में. यहां सैय्यद मदारी जमात की पूरी बस्ती है. अब्दुल, सैय्यद मदारी जमात का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा नौजवान है. सैय्यद अब्दुल 12वीं पार कर चुका है. वैसे तो देश के असंख्य बच्चे 12वीं पार कर चुके हैं.

अब्दुल की बात खास इसलिए है क्योंकि इससे पहले तक तो सैय्यद मदारियों ने काले अक्षर पढऩे की सोची भी न थी, लेकिन आज की पीढ़ी पढऩा चाहती है. वह क, ख, ग की रस्सियों पर चलकर बदलाव के नए खेल दिखाना चाहती है. सैय्यद अब्दुल से आगे अब कई नाम 12वीं की परीक्षा पास करने के लिए बेकरार हैं; मसलन- सैय्यद फातिमा, सैय्यद सिंकदर, सैय्यद फारूख, सैय्यद कंकर, सैय्यद शेख तय्यब, सैय्यद वंशी, सैय्यद वशीर...

कौन हैं सैय्यद

सैय्यद मदारी एक बंजारा जमात है. गली-मोहल्लों में हैरतअंगेज खेल दिखाना इनका खानदानी पेशा रहा है. मगर सबसे हैरतअंगेज खेल जो हुआ वो यह कि 'जाति शोध केन्द्रÓ और 'जाति आयोगÓ की सूचियों में 'सैय्यद मदारी' जमात का जिक्र तक नहीं मिलता है. इसलिए महाराष्ट्र में इनकी कुल संख्या का आंकड़ा भी लापता है.

अनुमान है कि महाराष्ट्र में महज 700 सैय्यद मदारी परिवार होंगे. थोड़े-थोड़े अंतराल से यह अपने ठिकाने बदलते चलते हैं. जाहिर है कि यह अपने बुनियादी हकों से दूर होते हैं.

ऐसे में जिला बीड़ से 80 किलोमीटर दूर सैय्यद खेड़करी बस्ती में आने के बाद मेरे जैसे कईयों की धारणा टूट जाती है.

यहां सैय्यद मदारी के 52 छोटे-छोटे और सुंदर झोपड़ों में 354 लोग रहते हैं. सैय्यद रफाकत से पता चला कि यह जमीन पहले दरगाह की थी. जिसे 1998 को 99 साल के लिए लीज पर लिया गया. तब पहली मर्तबा इन्हें चिट्ठी मंगवाने का पता नसीब हुआ.

आज हर घर में पीने का पानी और बिजली की रौशनी भी है.

1998 को ही बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए 'गैर-औपचारिक केन्द्र' खुला था. उस समय पढ़ाई-लिखाई की स्थिति जीरो थी, लेकिन इन दिनों 1 से 11 क्लास तक कुल 20 बच्चे पढ़ते हैं. यह बच्चे बचपन (स्कूल) से जवानी (कालेज) की सीढ़ी पर चढऩे के लिए हैं. और अब्दुल, इन्हीं में से एक है.

ऐसा संभव हुआ बाल्मीक निकालजे नाम के दलित कार्यकर्ता के प्रयासों से. निकालजे बताते हैं, "जो काम हम करते थे, अब वही अब्दुल को करते हुए देखने से खुशी मिलती है. 11 साल पहले यहां के लोग शिक्षा के नाम पर पांच मिनिट भी नहीं बैठ पाते थे. इसलिए पढ़ाई-लिखाई को दिलचस्प बनाने और उसकी जरूरत का एहसास दिलाने में सालों खर्च हो गए. जब कुछ को शिक्षा की अच्छाईयां दिखने लगीं तो वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे." आज इन बच्चों की समझ बड़ी है, जमात में पूछ-परख भी.

बिन कागज सब सून

जैसा की ऊपर कहा जा चुका है कि 'जाति शोध केन्द्र' और 'जाति आयोग' की सूचियों में 'सैय्यद मदारी' जमात का जिक्र तक नहीं मिला. इसके चलते अब्दुल जैसे बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते थे. 

जाति प्रमाण-पत्र के बगैर सैय्यद मदारियों के यह बच्चे दूसरी जाति के बच्चों की तरह अधिकार और सुविधाएं नहीं पा सकते थे. सामाजिक कार्यकर्ता सतीश गायकबाड़ ने कहा, "हमने अपनी पहचान के कागज मांगने के लिए बहुत कोशिश की. 

यहां से 80 किलोमीटर दूर बीड़ जाकर कलेक्टर साहब को अपना हाल सुनाया.  उन्हें तो जाति का सबूत ही चाहिए था. जिले के ज्यादातर अफसर सैय्यद मदारियों को नाम से जानने के बावजूद कुछ नहीं कर सके. वो हर बार कानून में बंधे होने का हवाला देते और हम बार-बार खाली हाथ लौटकर आते." 

सवाल कि जो सैय्यद मदारी सरकार के काम-काज से जुड़े ही नहीं, वो अपने लिए जाति का कागज लाएं भी तो कहां से?

यही वो फोटो है

सैय्यद सिंकदर की सुने तो दो हाथ से मोटर साइकिल खींचने वाले दारासिंह को बच्चा बच्चा जानता है. पर एक हाथ से दो मोटर साइकिल रोकने वाले सैय्यद मदारियों को कोई नहीं जानता.

सैय्यद सिंकदर जैसे कई बच्चों के पास बालीबुड के स्टार और बड़े नेताओं के दर्जनों एल्बम हैं. हमने एक के बाद एक फोटो को पलटा तो जाना कि जो हम सोच नहीं पाते, सैय्यद मदारी कर दिखाते हैं. 

इस बीच कुछ धुंधले पड़ गए एल्बमों में इनके पिता अपनी ब्लेक-एण्ड-व्हाइड इमेज लिए अमिताभ, विनोद खन्ना, जितेन्द्र और धमेन्द्र के साथ खड़े दिखे. अबके लड़के रंगीन कपड़ों में शाहरूख, सलमान, गोविन्दा, संजय दत्त से बतियाते हैं. हीरोइनों में रेखा, हेमामालिनी, जीनत अमान, नीतू सिंह दिखती हैं.

एक फोटो ऐसा भी है जिसमें सोनिया गांधी पीठ ठोंकती हैं. हर फोटो के पीछे एक कहानी है. जिसे सुनाना यह नहीं भूलते. ऐसे सारे फोटो जोड़ो तो हजारों कहानियों जुड़ जाए. आखरी में सैय्यद फातिमा ने खिंचवाई एक फोटो निकाली और सबको बताते हुए कहा, "यही एक फोटो (कहानी) हमारे बदलाव से जुड़ी है."

First published: 26 August 2016, 13:16 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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