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गांधी की हत्या संघ के कंधे पर बेताल की तरह चिपक गई है

कुमार प्रशांत | Updated on: 31 July 2016, 7:47 IST
QUICK PILL
यह लेख गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने अपने मित्र वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी को प्रेषित किया था. लिहाजा इसके यहां प्रकाशन का श्रेय कुमार प्रशांत के साथ ओम थानवी को भी जाता है. गांधीजी की हत्या के संदर्भ में आरएसएस और अदालती तौर-तरीकों का बारीक मुआयना करता यह लेख मौजूदा जटिल, विभाजित और हिंसक समय में बहुत प्रासंगिक है.

महात्मा गांधी और अदालत का रिश्ता बहुत पुराना और बहुत लोमहर्षक है. गांधी ने जीवन-यापन के लिए यही अदालती पेशा चुना था और सम्मान भरे जीवन की लड़ाई में इसी अदालत को हथियार की तरह इस्तेमाल किया था. इसलिए आश्चर्य नहीं है कि आज फिर गांधी को अदालत ने अपने कठघरे में बुलाया है. बहाना बने हैं राहुल गांधी! और उन्हें बहाना बनाया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भिवंडी शाखा के सचिव राजेश कुंटे ने.

लेकिन आरएसएस जैसे संगठनों की कार्यप्रणाली से जो लोग परिचित हैं वे जानते हैं कि यहां सारे फैसले किसी बड़ी रणनीति के तहत, किसी एक ही जगह से तय किए जाते हैं, भले ही वे हमारे सामने बरास्ते राजेश कुंटे आएं. तो हम इसे इस तरह कहें तो बात गलत नहीं होगी कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने एक बार फिर गांधी से दो-दो हाथ करने का मन बनाया है और इस बार उसका आत्मविश्वास उफान पर है, क्योंकि आज सत्ता उसके पास भी है, साथ भी है. सवाल वही है पुराना कि महात्मा गांधी की हत्या किसने की?

हिंदुत्ववादियों को या कहूं कि संघ परिवार को अगर इसका थोड़ा भी इल्म होता कि इस आदमी की हत्या, विक्रमादित्य के कंधे पर लदे बेताल की तरह उससे चिपक जाएगी और लाख कोशिशें कर के भी वे उससे छूट नहीं पाएंगे तो शायद वे इस दिशा में नहीं जाते. हुआ ऐसा कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी को मारी गई तीनों गोलियां उलट पड़ी हैं और तब से ही अपना निशाना खोज रही हैं. गांधी न उगलते बनते हैं, न निगलते!

सर्वोच्च न्यायालय ने नाहक ही इस फटे में अपना पांव डाला है, क्योंकि गांधी नाम के इस आदमी ने एकाधिक बार अदालतों को इस तरह आईना दिखलाया है कि इसकी सूरत ही नहीं, सीरत भी गहरे सवालों से घिर गई है.

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इतिहास कहता है कि गांधी की हत्या किसी क्षणिक आवेश में की गई दुर्भाग्यपूर्ण कार्रवाई नहीं थी बल्कि लंबे दौर में सोच-समझ कर रचा गया वह षडयंत्र था जो पांच असफल प्रयासों के बाद जा कर सफल हो पाया था. इसमें से एक भी प्रयास ऐसा नहीं था जो हिंदुत्व की विचारधारा से नहीं जुड़े किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा किया गया हो.

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महात्मा गांधी ने अपने जीवन में तीन तरह की हिंसाओं का मुकाबला किया साम्राज्यवादी हिंसा जिसके दांत उन्होंने इस कदर खट्टे कर दिए थे कि वह समझ नहीं पा रहा था कि आत्मबलिदानियों की इस ताकत को वह कैसे काटे! दूसरी हिंसा वह थी जो व्यापक जनक्रांति के नाम पर छुप-छुप कर, जहां-तहां पटाखे फोड़ती थी.

गांधी ने इस हिंसा की व्यर्थता साबित कर दी थी और यह भी बता दिया था कि इसके गर्भ में से अंधा आतंकवाद पैदा होगा. आज सारी दुनिया जिस उद्देश्यविहीन हिंसा की चपेट में है, वह वहीं से पैदा हुई है, इसे समझने के लिए किसी गहन ज्ञान की जरूरत नहीं है.

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तीसरी हिंसा वह थी जिसने गांधी को लील लिया- सांप्रदायिक हिंसा. सांप्रदायिक हिंसा का हथियार दोनों इस्तेमाल करते हैं बहुसंख्यक भी और अल्पसंख्यक भी. गांधी इन दोनों हिंसाओं से जूझते रहे और अंतत: मारे गये. वे बहुसंख्यक की हिंसा को ज्यादा खतरनाक बताते रहे, क्योंकि बहुसंख्यक की हिंसा बड़ी आसानी से देशभक्ति करार दी जाती है.

गांधी का यह पक्का विश्वास था कि हिंसा स्वभाव से ही मानवद्रोही होती है और इसलिए देशद्रोही भी होती है. इसलिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों तरह की सांप्रदायिक ताकतों ने यही मान कर गांधी को मारने की बात तय की कि इस आदमी को और इसके बढ़ते प्रभाव को सामान्य तरीके से रोका नहीं जा सकता है, और इसे रोका नहीं गया तो हमारी अपनी जड़ों की सुरक्षा संभव नहीं होगी.

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मुझे नहीं लगता है कि इतिहास का कोई सामान्य विद्यार्थी भी, जिनमें हमारी अदालतों में बैठे जज और वकील साहबान भी शामिल हैं, हत्या के इस विश्लेषण से असहमत होंगे. हत्या जायज थी कि नहीं, इस पर भले हमारे मतभेद हों. अदालत ने हत्या के अपराध में भले ही नाथूराम गोडसे को फांसी की सजा दी लेकिन वृहत्तर भारतीय समाज ने तो अपनी चेतना में हमेशा-हमेशा के लिए यह दर्ज कर लिया कि इस धरती से निकली गंगा-जमुनी संस्कृति और पश्चिमी जीवन-दर्शन के तमाम मंगलकारी तत्वों की मिलावट से पैदा हुआ हमारी सदी का यह सबसे बड़ा आदमी हमारी सांप्रदायिक क्षुद्रता के हाथों मारा गया.

वह खलिश और वह पहचान आज भी, प्रभु कृष्ण के पांव में लगे जरा के जहरीले वाणों की तरह ही हमारे मन-प्राणों में बिंधा है. अदालत ने तो तब इस मुहर भर लगाई थी.

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राहुल गांधी की बात यहीं से शुरू होती है. सभी जानते हैं कि राहुल गांधी सत्ता की राजनीति के खिलाड़ी हैं. दुर्भाग्यवश चलन ऐसा बना है कि इस खेल में न कोई हथियार वर्जित है, न कोई काल बाध्यता मानी जाती है. यहां तो वही बाण सबसे मुफीद माना जाता है जो सबसे गहरा घाव देता हो. तो राहुल गांधी को लगा हो कि गांधी की हत्या का बाण सांप्रदायिक ताकतों को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाएगा तो इसमें आश्चर्य नहीं.

आश्चर्य अगर है तो इस बात का है कि देश की राजनीति में उतरे इन राहुलों को इस बात का अहसास क्यों नहीं है कि उन सबने जैसी राजनीति चलाई है उसमें सबसे पहली हत्या तो नैतिक मूल्यों की ही हुई है.

सामाजिक नैतिकता की कब्र पर खड़े हो कर, नैतिकता के सवाल उठाने से ज्यादा बड़ा विद्रूप क्या हो सकता है! लेकिन अभी मैं इस सवाल को नहीं उठा कर अदालत से सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि राहुल गांधी ने ऐसी क्या बेजा बात कही कि अदालत ने उन्हें कठघरे में खड़ा करने की धमकी दे डाली?

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ 1925 में अपने जन्म से आज तक हिंदुत्व की वर्चस्ववादी विचारधारा का सबसे बड़ा और सबसे संगठित पैरोकार रहा है.

देश के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में सांप्रदायिकता का बीजारोपण और उसके प्रभुत्व का संरक्षण करने का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का नाम उसमें जरूर आएगा. यह पूरी अवधारणा महात्मा गांधी की सामाजिक अवधारणा के विरोध में न केवल खड़ी होती है बल्कि उसे पराजित कर ही जीवित रह सकती है.

क्या संघ परिवार ने कभी भी नाथूराम की निंदा का प्रस्ताव पारित किया?

इसलिए जीवित महात्मा गांधी के खिलाफ राष्ट्रीय उन्माद खड़ा करना और उनकी हत्या के बाद भी वह अभियान पूरी तिक्तता से जारी रखना संघ का एजेंडा था और है. इसी अभियान के तहत उनकी हत्या का फैसला लिया गया और संघ के सदस्य नाथूराम गोडसे ने, संघ परिवार के सभी वरिष्ठ जनों की जानकारी व सहमति से उनकी हत्या की. यह बात समाज भी जानता है और अदालत भी.

#MahatmaGandhi तो महात्मा गांधी को गोडसे ने इसलिए मारा था

नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की यह जान कर और मान कर ही तो उसे इस अपराध में अदालत ने फांसी की सजा दी. नाथूराम गोडसे संघ का नियमित सदस्य था, यह बात भी इसी तरह प्रमाणित है.

ऐतिहासिक सच की इस पृष्ठभूमि में अदालत ने ऐसा बेतुका सवाल राहुल गांधी से कैसे कर दिया कि व्यक्ति हत्यारा था तो आपने सारे संगठन को इसमें कैसे लपेट लिया? जवाब में इतना ही पूछना चाहता हूं कि राहुल गांधी के मामले में यह फैसला न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा का निजी फैसला है या भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है?

इस फैसले की हैसियत ही कुछ नहीं है यदि दीपक मिश्राजी ने यह फैसला भारत की सबसे बड़ी अदालत की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठ कर नहीं दिया होता! यह फैसला हमारी सबसे बड़ी अदालत ने दिया है, इसलिए हमारी चिंता का विषय है, न कि इसलिए कि किन्हीं दीपक मिश्राजी की ऐसी राय है. व्यक्ति जिस संगठन का प्रतिनिधित्व करता है, उसका सारा यश-अपयश संगठन के खाते में भी जाता है.

आप देखते ही हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य कहीं राहत का काम अच्छा करते हैं तो संघ उसे अपने खाते में जमा कर लेता है. ऐसे ही यह हत्या भी संघ परिवार के खाते में इतिहास ने जमा कर दी है. अदालत चाहे तो इतिहास के पन्ने पलटे और खोजे कि क्या संघ परिवार ने कभी भी नाथूराम की निंदा का प्रस्ताव पारित किया. क्या संघ परिवार ने कभी भी, कहीं भी गांधी की हत्या के नाथूराम के पराक्रम का महिमामंडन करने वालों को अपने संगठन या अपनी पार्टी से बाहर किया, क्या संघ परिवार ने कभी भी और कहीं भी नाथूराम का मंदिर बनाने वालों का सार्वजनिक धिक्कार किया.

नाथूराम और उनके भाई गोपाल गोडसे ने अदालत में एक ही टेक रखी कि उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कोई नाता नहीं था. इस असत्य की काट का कोई ऐसा ‘प्रमाण’ नहीं मिला अदालत को, जिसके आधार पर वह संगठन को भी अपराधी बताती. इससे यह साबित नहीं होता है कि संगठन अपराध में शामिल नहीं था बल्कि यह साबित होता है कि अदालती सच और वास्तविक सच के बीच गहरी खाई हो सकती है. जो अदालत इस खाई को पाट न सके, वह न्याय का अधूरा ही दर्शन कर व करा पाती है.

इससे यह भी पता चलता है कि न्याय तक पहुंचने की कोशिश में अदालतों को ज्यादा सक्रिय व संलग्न होने की जरूरत है अन्यथा उनका फैसला एक तरफ और सच दूसरी तरफ छूट जाता रहेगा जैसा कई मामलों में हम देखते हैं.

पुलिस पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सकी इसलिए हमें आरोपी को लाचारी में छोड़ना पड़ रहा है, ऐसा अदालती बयान तो हम कई बार देखते है. पुलिस पेश नहीं कर सकी यह उसकी अक्षमता या गैर-ईमानदारी, और आप ऐसा कोई रास्ता नहीं खोज सके कि पुलिस लाचार हो कर प्रमाण तक पहुंचे, यह अदालत की अक्षमता व अधूरेपन का प्रमाण है.

जेल से छूटने के बाद गोपाल गोडसे ने पूरी न्याय-प्रणाली को करारा चांटा मारा जब उसने अपनी जीवनी में लिखा कि मैंने और नाथूराम ने कभी भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सदस्यता नहीं छोड़ी लेकिन हमें यह गलतबयानी करनी पड़ी क्योंकि हम पर इस बात का बहुत दवाब था कि हमें राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और सावरकर को हर हाल में बेदाग रखना है.

अदालत के बाहर, उसकी पूरी प्रक्रिया का उपहास करने वाले इस खुलासे से न्याय दागदार हुआ, क्योंकि समाज जिस सच को जान व मान चुका था, अदालत ने उस सच तक न पहुंच पाने की चुनौती स्वीकार नहीं की और एक निर्जीव फैसला सुना दिया. पुलिस, प्रमाण, गवाह आदि के साथ कठघरे में कहा गया सच ही तो सच नहीं होता है.

बारहा सच कहीं अदालत के बाहर ही भटकता मिलता है. महात्मा गांधी कि अब्राहम लिंकन कि जॉन केनेडी कि इंदिरा गांधी की राजीव गांधी, किसकी हत्या के बारे में कोई अदालत किसी निष्कर्ष पर पहुंची है? अपराधियों तक या उनकी कठपुतलियों तक ही अदालत पहुंच पाती है, खिलाड़ी तो कहीं बेदाग ही रह जाते हैं.

महात्मा गांधी की हत्या के मामले में भी ऐसा ही हुआ है. राहुल गांधी के पास एक मौका है कि वे अदालत को भी और संघ परिवार को भी आईना दिखा सकें बशर्ते कि वे खुद टिन की टूटी हुई तख्ती साबित न हों.

First published: 31 July 2016, 7:47 IST
 
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