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जब अपने पसंदीदा वैज्ञानिकों को हटा कर आइंस्टीन ने अपने घर में लगाई महात्मा गांधी की तस्वीर

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 October 2018, 12:57 IST

मोहनदास करम चंद्र गांधी को महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता यूं ही नहीं कहा जाता है. महात्मा गांधी जितना देशवासियों के प्रिय थे उतना की सम्मान उन्हें विदेशों में भी मिला है. इनमें से एक हैं दुनिया के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन. आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के विचारों और उनकी शख्सियत को अपना आदर्श माना. हमेशा से ही वैज्ञानिक और व्यवहारिक विचारधारा के समर्थक थे.

उनके बार में ऐसा कहा जाता था कि उन्होंने अपना आदर्श हमेशा दो महान वैज्ञानिकों को माना था. यहां तक कि हमेशा उन्होंने अपने घर में केवल दो ही पोट्रेट के लिए जगह बना कर रखी थी. और ये दो महान वैज्ञानिक थे आइज़क न्यूटन और जेम्स मैक्सवेल.

लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब आइंस्टीन ने दुनिया में अलग अलग तरह की त्रासदी देखी. इन घटनाओं ने उनको इतनी बुरी तरह से प्रभावित किया कि उन्होंने अपने घर में लगे अपने पसंदीदा पोट्रेट को हटा कर दो नई तस्वीरें लगा दीं. ये तस्वीरें किसी और की नहीं बल्कि दुनिया भर में शांतिदूत के रूप में पहचाने जाने वाले महात्मा गांधी की थी.

 

महात्मा गांधी की तस्वीर को अपने घर में लगाते वक़्त आइंस्टीन ने कहा था- ‘समय आ गया है कि हम सफलता की तस्वीर की जगह सेवा की तस्वीर लगा दें.’

आइस्टीन ने महात्मा गांधी के साथ जो दूसरी तस्वीर लगाई थी वो थी अल्बर्ट श्वाइटज़र की. गांधी के साथ अल्बर्ट श्वाइटज़र की तस्वीर लगाने को लेकर उन्होनें कहा था, ‘पश्चिम में अकेले अल्बर्ट श्वाइटज़र ही ऐसे हैं जिनका इस पीढ़ी पर उस तरह का नैतिक प्रभाव पड़ा है, जिसकी तुलना गांधी से की जा सकती हो. जैसा कि गांधी की ही तरह श्वाइटज़र का भी इस हद तक इतना ज्यादा प्रभाव इसलिए पड़ा है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन से इसका उदाहरण पेश किया.’

गौरतलब है कि महात्मा गांधी से कभी न मिलने वाले आइंस्टीन के जीवन और विचारों में महात्मा गांधी ने बहुत प्रभाव डाला. आइंस्टीन और महात्मा गांधी की उम्र में 10 साल का अंतर था. आइंस्टीन गांधी 10 साल छोटे थे. आइंस्टीन हमेशा गांधी से मिलने की इच्छा रखते थे. दोनों के बीच के भावपूर्व संबंधों को उनके बीच हुए पत्रों के आदान-प्रदान से लगाया जा सकता है.

 

गांधी और आइंस्टीन के खतों के कुछ अंश

एक दूसरे से कभी न मिलने वाले दुनिया के ये दो महान व्यक्ति अपने पत्रों में अपने विचार साझा करते थे. आइंस्टीन ने 27 सितंबर, 1931 को गांधीजी को एक चिट्ठी भेजी थी. इस चिट्ठी में आइंस्टीन ने लिखा- ‘अपने कारनामों से आपने बता दिया है कि हम अपने आदर्शों को हिंसा का सहारा लिए बिना भी हासिल कर सकते हैं. हम हिंसावाद के समर्थकों को भी अहिंसक उपायों से जीत सकते हैं. आपकी मिसाल से मानव समाज को प्रेरणा मिलेगी और अंतर्राष्ट्रीय सहकार और सहायता से हिंसा पर आधारित झगड़ों का अंत करने और विश्वशांति को बनाए रखने में सहायता मिलेगी. भक्ति और आदर के इस उल्लेख के साथ मैं आशा करता हूं कि मैं एक दिन आपसे आमने-सामने मिल सकूंगा.’

उस समय गांधी जी गोलमेज सम्मलेन में हिस्सा लेने लन्दन गए थे. 18 अक्टूबर, 1931 को लंदन से ही गांधी जी ने आइंस्टीन के इस पत्र का जवाब लिखा. अपने संक्षिप्त जवाब में उन्होंने लिखा- ‘प्रिय मित्र, इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है कि मैं जो कार्य कर रहा हूं, उसका आप समर्थन करते हैं. सचमुच मेरी भी बड़ी इच्छा है कि हम दोनों की मुलाकात होती और वह भी भारत-स्थित मेरे आश्रम में.’

उसी समय दुनिया में बढ़ते युद्ध के हालतों पर आइंस्टीन ने दुनिया की सेनाओं से अपील की कि वे युद्ध में शामिल होने से इंकार कर दें. आइंस्टीन की इस अपील से पहले लियो टॉल्सटॉय ने भी लोगों को सेना में न शामिल होने का आह्वान किया था. लेकिन आइंस्टीन की इस अपील ने यूरोप के कुछ शांतिवादियों को परेशां कर दिया.

उनमें से एक थे ब्रिटिश शांतिवादी रुनहम ब्राउन. ब्राउन ने इस मामले में महात्मा गांधी को चिट्ठी लिखी. ब्राउन आइंस्टीन की अपील के बारे में गांधी के विचार जानना चाहते थे. ये ऐसा पहला मौक़ा था जब जब गांधी और आइंस्टीन एक-दूसरे के विचारों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा कर रहे थे.

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ब्राउन के पत्र का जवाब देते हुए महात्मा गांधी ने लिखा- ‘मेरा ख्याल है कि प्रोफेसर आइंस्टीन का सुझाव सर्वथा तर्कसंगत है. और यदि युद्ध में विश्वास न करनेवालों के लिए युद्ध संबंधी सेवाओं में शामिल होने से इंकार करना उचित माना जाता है, तो इससे अनिवार्य निष्कर्ष यही निकलता है कि युद्ध का प्रतिरोध करनेवालों को कम से कम उनके साथ सहानुभूति तो रखनी ही चाहिए; भले ही उनमें अपने अंतःकरण की खातिर कष्ट सहन करने वाले लोगों के उदाहरण पर स्वयं अमल कर सकने जितना साहस न हो.’

 

First published: 1 October 2018, 12:51 IST
 
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