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कांचा इलैया: दलित-ओबीसी संस्कृति पर हमले के खतरनाक परिणाम होंगे

कांचा इलैया | Updated on: 29 February 2016, 8:08 IST
QUICK PILL
  • दक्षिण भारत में द्रविड़ प्रतीकों को मनाने का उत्सव जारी रहा है. ओनम त्योहार बली राजा की याद में मनाया जाता है जिसे एक हिंदू वामन राजा ने आपराधिक षडयंत्र कर मार दिया था. मैसूर में महिषासुर, रावण और अन्य द्रविड़ देवी देवताओं का मंदिर है. लेकिन ऐसा करने वाले केवल दलित और शूद्र होते हैं. 
  • मैसूर में महिषासुर की बड़ी मूर्ति है. वास्तव में कई ऐसी कहानियां हैं जो आपको यह बताती हैं कि मैसूर नाम भी महिषासुर से आया है. पहले इस इलाके को महिषा मंडल कहा जाता था. यह एक तरह से हिंदुत्व ताकतों के गाय आधारित राष्ट्रवाद के खिलाफ भैंस आधारित राष्ट्रवाद का विरोध है. 

कुछ समय पहले प्रेम कुमार मणि ने महिषासुर और दुर्गा पर फॉरवर्ड प्रेस में एक लेख लिखा था. फॉरवर्ड प्रेस दिल्ली से निकलने वाली पाक्षिक पत्रिका है. उन्होंने शूद्रों के इतिहास के पुनर्लेखन की जिम्मेदारी ली थी क्योंकि इसका लेखन अभी तक ब्राह्मणवादी नजरिये से होता रहा है. उनका पूरा लेखन काल्पनिक कहानियों पर ही आधारित था जो समाज में आजादी की लड़ाई के दौरान लोकप्रिय रहा.

लेख में मणि ने बताया कि कैसे दुर्गा ने महिषासुर को मार गिराया. प्रेम कुमार मणि बिहार के ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. मणि, ब्रज रंजन मणि के बड़े भाई हैं जिन्होंने डिब्राम्हिनाइजिंग हिस्ट्री नाम से मशहूर पुस्तक लिखी है. 

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम ने जितेंद्र यादव की अध्यक्षता में इस लेख को पर्चे की शक्ल में छापा और फिर महिषासुर जयंती मनाई.

हिंदुत्व ताकतों को इस कार्यक्रम से बड़ी ठेस पहुंची क्योंकि यह एक तरह से उत्तर भारत में ओबीसी के लिए क्रांतिकारी ऐतिहासिक बदलाव था. उन्होंने इस बारे में पुलिस और जेएनयू प्रशासन से शिकायत की. 

जेएनयू प्रशासन को भी इस नए इतिहास लेखन से परेशानी हो रही थी क्योंकि वह भी ब्राह्मणवादी इतिहास में भरोसा करते थे. बहुसांस्कृतिक इतिहास लेखन मंडल के बाद के युग की देन है जिसने भारतीय शिक्षण संस्थानों को बदला.

जेएनयू की प्रॉक्टोरियल कमेटी ने पर्चे का अध्ययन किया और उन्होंने एआईबीएसएफ के नेताओं से उनका पक्ष सुना. उन्हें इस इतिहास लेखन में कुछ भी बुरा नहीं लगा. जब से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेतृत्व में सवर्ण छात्रों के समूहों ने राम नवमी, गणपति और दुर्गापूजा त्योहार मनाने की शुरुआत की तब से दलित और ओबीसी छात्रों ने अपने आइकन को लेकर त्योहार मनाना शुरू कर दिया है.

ओनम त्योहार बली राजा की याद में मनाया जाता है जिसे एक हिंदू वामन राजा ने आपराधिक षडयंत्र कर मार दिया था

दलित और ओबीसी छात्रों को लगता है कि इससे उन्हें ओबीसी के हिंदूकरण से निकलने का रास्ता मिलेगा. बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान हिंदुत्व की ताकतों ने दलितों और ओबीसी को आगे रखकर अपने मंसूबे को अंजाम दिया.

दक्षिण भारत में द्रविड़ प्रतीकों को मनाने का उत्सव जारी रहा है. ओनम त्योहार बली राजा की याद में मनाया जाता है जिसे एक हिंदू वामन राजा ने आपराधिक षडयंत्र कर मार दिया था. वहीं मैसूर में महिषासुर, रावण और अन्य द्रविड़ देवी देवताओं का मंदिर है. लोग यहां जाकर पूजा करते हैं. लेकिन ऐसा करने वाले केवल दलित और शूद्र होते हैं. 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कई द्रविड़ देवी-देवताओं की पूजा की जाती है जिनका दुर्गा की तरह कोई खूनी इतिहास नहीं है. लाखों लोग ऐसे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. हिंदू ताकतें समाज का ब्राह्मणीकरण चाहती हैं लेकिन वह अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाए हैं.

मैसूर में महिषासुर की बड़ी मूर्ति है. वास्तव में कई ऐसी कहानियां हैं जो आपको यह बताती हैं कि मैसूर नाम भी महिषासुर से आया है. पहले इस इलाके को महिषा मंडल कहा जाता था. 

यह एक तरह से हिंदुत्व ताकतों के गाय आधारित राष्ट्रवाद के खिलाफ भैंस आधारित राष्ट्रवाद का विरोध है. महिषासुर को भैंस की तरह काले रंग में दिखाया जाता है.

पेरियार रामासामी नाइकर ने भी ऐसे कई द्रविड़ प्रतीकों को खोज निकाला था जो हिंदू ब्राह्मणवाद से लड़ते रहे हैं. शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने जिस तरह से संसद में चुनिंदा तरीके से पर्चे को पढ़ा, उसने बीजेपी सरकार और दलित-ओबीसी संस्कृति के बीच वैचारिक संघर्ष को तेज कर दिया है.

द्रविड़ इतिहास का विरोध कर मंत्री ईरानी ने एक तरह से असहिष्णुता ही दिखाई है. संघ परिवार दलित संस्कृति को गैर-भारतीय संस्कृति की तरह देखता है जैसा कि वह इस्लाम और ईसाईयत के साथ करते हैं. इनके विचार में भारतीय संस्कृति ब्राह्मणवादी संस्कृति है. ईरानी ने ही यूनिवर्सिटी को चिट्ठी लिखकर हॉस्टल की कैंटीन में केवल शाकाहारी भोजन परोसने के लिए कहा था. 

महिषासुर और दुर्गा को लेकर मूल वैचारिक संघर्ष हिंसा और उसका शिकार होने का है

ईरानी के विचार में केवल दुर्गा ही भारतीय है न कि महिषासुर. उनके मुताबिक केवल वामन ही भारतीय है न कि बाली राजा. उनके विचार में राम भारतीय है न कि रावण. उनके विचार में सीता केवल भारतीय हैं न कि शूपर्णखा. इसलिए महिषासुर और दुर्गा राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी का प्रतीक है. 

महिषासुर रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अन्य छात्रों की तरह राष्ट्रविरोधी है. महिषासुर और दुर्गा को लेकर मूल वैचारिक संघर्ष हिंसा और उसका शिकार होने का है. ब्राह्मण विचारधारा इस मसले को धर्म और अधर्म से जोड़कर देखती है और वह अधार्मिकों को मारने का आदेश देता है.

अगर आप इस तरीके को उचित ठहराएंगे तो सभी अधार्मिकों को खत्म कर दिया जाएगा. सभी दलित बहुजनों के पास वैकल्पिक इतिहास है और उन्हें खत्म करना होगा क्योंकि वह ब्राह्मण हिंदू धर्म को नहीं मानते हैं. 

इसी आधार पर  मुस्लिम और ईसाईयों को खत्म करना होगा क्योंकि उनकी मान्यता राम और दुर्गा के मुकाबले गॉड और अल्लाह में है. उन्होंने कलबुर्गी, अखलाक और रोहित वेमुला को मारकर ऐसा किया भी.

2014 में आम चुनावों के दौरान हिंदुत्व ने नरेंद्र मोदी को आगे रखा क्योंकि वह ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे. हालांकि सत्ता में आने के बाद वह हर संभव दलित और ओबीसी की संस्कृति पर हमला कर रहे हैं. वह उनकी संस्कृति, इतिहास, मान्यताएं, खाना और उनके प्रतीकों पर हमला कर रहे हैं.

स्मृति ईरानी का दलित-ओबीसी संस्कृति पर हमला करने का भयानक परिणाम होगा जैसा कि रोहित वेमुला की मौत के बाद हुआ है. अगर स्मृति ईरानी दलित-ओबीसी की पारंपरिक संस्कृति को खत्म करना चाहती हैं तो बीजेपी को यह समझना होगा कि इससे नरेंद्र मोदी के 'मेक इन इंडिया' प्रोजेक्ट को कितना बड़ा नुकसान होगा.

दलित बहुजन और सवर्णों के बीच अगर पंचायत स्तर से लेकर संसदीय स्तर पर सांस्कृतिक संघर्ष की शुरुआत हो गई तो कोई इस सांस्कृतिक संघर्ष को रोक नहीं पाएगा.

First published: 29 February 2016, 8:08 IST
 
कांचा इलैया @@catchnews

लेखक मशहूर दलित चिंतक है. फिलहाल वह सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूजन एंड इनक्लूसिव पॉलिसी में डायरेक्टर हैं. 'व्हाई आई एम नॉट हिंदू' इनकी मशहूर कृति है.

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