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बेमौसम बारिश: रबी फसल बर्बाद और उदासीन सरकार

निहार गोखले | Updated on: 17 March 2016, 8:20 IST
QUICK PILL
  • बेमौसम बारिश की वजह से गेहूं और सरसों की फसल को 20 से 60 फीसदी तक नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि अभी तक इस बारे में कोई सरकारी आंकड़ा नहीं आया है.
  • सरकार के पास बारिश का अनुमान लगाने की क्षमता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि सूचनाएं किसानों तक नहीं पहुंच रही है और इस वजह से नुकसान बढ़ जाता है.

किसी बदलाव की दर 500 फीसदी नहीं हो सकती. लेकिन किसानों के लिए सच्चाई बन चुकी है. बल्कि यह कहें कि उन्हें इसकी आदत पड़ गई है. 

देश के आधे हिस्से में मार्च महीने में बारिश सामान्य से 300-500 फीसदी ज्यादा हुई. कई इलाकों में पत्थर भी पड़े. इससे छह राज्यों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में फसलों को बेहद नुकसान हुआ है.

दूसरी तरफ देश के अन्य हिस्से कम बारिश से जूझ रहे थे. कर्नाटक में सूखे की वजह से 7200 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. तो फिर सरकार ने क्या किया? पांच तरीकों से सरकार अपनी भूमिका निभा सकती थी लेकिन वह सभी मोर्चे पर विफल रही. वह भी तब जब पिछले साल मार्च में भी ऐसी तबाही आई थी और इससे पहले भी किसानों को लगातार प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा था.

नुकसान का दायरा

रबी फसल की बुआई मॉनसून के बाद होती है और इसकी कटाई अप्रैल में होती है. किसानों को उस वक्त बारिश की जरूरत होती है जब फसल बढ़ रही होते हैं. उस वक्त बिलकुल भी नहीं जब इसकी कटाई करने का वक्त हो.

लेकिन देश में 1-9 मार्च के बीच 36 में से 15 सबडिवीजन में सामान्य से 20 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. राजस्थान और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा एवं विदर्भ क्षेत्र में सामान्य से 581 फीसदी तक ज्यादा बारिश हुई.

कई रिपोर्ट्स के मुताबिक गेहूं और सरसों की फसल को 20 से 60 फीसदी तक नुकसान उठाना पड़ा. रबी की यह दोनों प्रमुख फसलें हैं. हालांकि अभी तक इस बारे में कोई सरकारी आंकड़ा नहीं आया है जिससे यह पता चल सके कि फसलों को कितना नुकसान हुआ है.

सरकार का साफ कहना है कि गेहूं के खिलाफ स्थिति बिलकुल भी खराब नहीं है क्योंकि गेहूं की अधिकांश बुआई देर से हुई है. इसलिए गेहूं की फसल को बहुत अधिक नुकसान नहीं हुआ है.

लेकिन इस साल गेहूं की बुआई के रकबे में करीब 10 लाख हेक्टेयर की कमी आई है और इसकी वजह पिछले साल का सूखा रहा.

राहत

विशेषज्ञों के मुताबिक पांच तरीके से सरकार स्थिति से निपट सकती है. बारिश के पहले वह किसानों को इस बारे में सूचना दे सकती थी ताकि वे समय रहते राहत के उपाय कर सकते. अगर नुकसान होता है तो उसका तेजी से आकलन किया जाना चाहिए. बीमा नीति को मजबूती से लागू करते हुए किसानों को तेजी से मुआजवा दिया जाना चाहिए.

अनुमान और सूचनाओं का प्रसार

सरकार के पास बारिश का अनुमान लगाने की क्षमता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि सूचनाएं किसानों तक नहीं पहुंच रही है. मौसम विज्ञान विभाग पांच दिन पहले बारिश का अनुमान जारी करता है. सरकार यह चेतावनी दूरदर्शन के किसान चैनल के जरिये देती है. 

महाराष्ट्र के किसानों को स्वतंत्र रूप से जानकारी देने वाले अक्षय देवरस बताते हैं कि सरकार के सूचना तंत्र की मदद से किसानों को समय पर जानकारी नहीं पहुंच पाती है.

सरकार के पास एसएमएस के जरिये मौसम की जानकारी देने की सुविधा है लेकिन इस सुविधा के तहत महज 20 लाख किसानों को ही पंजीकृत किया गया है. 

देवरस पूछते हैं, 'ऐसे में अगर हम अनुमान लगा भी लेते हैं तो उसका क्या मतलब जब हम उसे किसानों तक पहुंचा ही नहीं पाए.' सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाना चाहिए. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने पिछले 9 महीनों में 39 लाख किसानों को पंजीकृत किया है.

आकलन

बेमौसम बारिश और प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान का आकलन किए जाने की प्रक्रिया में जबरदस्त भ्रष्टाचार है. फिलहाल स्थानीय अधिकारी नुकसान का जायजा देते है और इस दौरान जबरदस्त भ्रष्टाचार होता है. उत्तर प्रदेश योजना आयोग के सदस्य सुधीर पंवार बताते हैं कि इस दिशा में सुधार का प्रस्ताव है लेकिन अभी कोई फैसला नहीं लिया जा सका है. 

प्रस्ताव में कहा गया है कि नुकसान का आकलन सैटेलाइट इमेज और कैमरे की मदद से किया जाएगा. हालांकि अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं किया जा सका है.

मुआवजा

नुकसान की स्थिति में मिलने वाला मुआवाज बेहद कम है. सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में किसानों की रबी की पूरी फसल बर्बाद हो गई लेकिन उन्हें उनकी लागत का महज 28-67 फीसदी ही बतौर मुआवजा मिला. 

मुआवजे की रकम को बढ़ाए जाने की मांग हो रही है. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कहा कि उसने मुआवाज नहीं बल्कि राहत दी. लेकिन इसमें किसानों को उनके नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी. बाकी की भरपाई बीमा से होती है.

बीमा

क्या बेमौसम बारिश से हुए नुकसान के मामले में किसानों को बीमा से मदद मिलती है? जवाब है नहीं. प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना आने वाले खरीफ मौसम से लागू होगी. इसके अलावा बीमा योजना को लेकर कई सारे मसले हैं. 

मसलन बीमा योजना के तहत मिलने वाली रकम के लिए किसानों को अभी भी अधिकारियों के आकलन पर ही निर्भर रहना पड़ता है. आलोचकों का कहना है कि ऐसे संकट से निपटने की दिशा में बीमा से मदद नहीं मिलती है.

स्वराज्य अभियान ने कहा, 'किसानों की जिंदगी बचाने की दिशा में पर्याप्त और तत्काल मुआजवा दिया जाना समय की जरूरत है.'

इसके अलावा मुआवजा केवल उन किसानों को मिलता है जिन्होंने बैंकों से कर्ज ले रखा है. लेकिन इस दायरे में 80 फीसदी छोटे और मझोले किसान आते हैं.

खाद्य सुरक्षा

कृषि संकट के साथ देश भर में भूखमरी की समस्या बढ़ रही है. लेकिन राज्य अभी तक किसानों को सस्ते दर पर अनाज पहुंचाने में विफल रहे हैं. 2015 में खराब मॉनसून के बाद कई राज्यों को सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद किसानों को सस्ते में अनाज उपलब्ध कराने के लिए मजबूर होना पड़ा. 

फरवरी में कोर्ट ने कई राज्य सरकारों और केंद्र की खिंचाई की क्योंकि उन्होंने इस एक्ट को लागू नहीं किया. इस मामले की सुनवाई 30 मार्च को होने जा रही है.

अनुमान के मुताबिक आने वाले दिनों में ओले के साथ और अधिक बारिश की संभावना है. क्या सरकार सुन रही है?

First published: 17 March 2016, 8:20 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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