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राशन को आधार से जोड़कर गरीबों का राशनपानी बंद कर रही है सरकार

चारू कार्तिकेय | Updated on: 13 February 2017, 0:09 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

राशन का अनाज लेने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू करने का केंद्र सरकार का निर्णय गरीबों पर वज्रपात की तरह गिर सकता है. सरकार के इस निर्णय की अधिसूचना का भाव कुछ ऐसा है, जैसे कोई निष्ठुर सरकारी अधिकारी सरकारी योजना के लाभार्थी गरीब को कह रहा हो कि, अगर उसे इस योजना का लाभ उठाना है तो उसे दौड़-धूप करनी ही पड़ेगी वरना वह घर बैठे और अपना राशन भूल जाए.

यह निर्णय एक ऐसा व्यवस्था को अनिवार्य बना रहा है जो असल में पूरी तरह लागू भी नहीं हो सकी है पूरे देश में. यह कानूनी नजरिए से अवैध कदम भी साबित हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा?

पहली बात तो यह कि यह अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का साफ-साफ उल्लंघन है, जिसमें कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ‘जब तक सुप्रीम कोर्ट आधार पर अपना अंतिम फैसला नहीं दे देती तब तक इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता.’ मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है क्योंकि इस मामले में संवैधानिक पीठ का फैसला आना अभी बाकी है.

दूसरा, यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के साथ भी छेड़छाड़ करता है, क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत इसी अधिनियम के अनुसार अनाज वितरित किया जाता है और इस अधिनियम में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि राशन का सामान लेने के लिए आधार अनिवार्य है. इसके नियमानुसार, ‘केंद्र व राज्य सरकारों ने आधार इसलिए लागू किया है ताकि विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को उनकी बायोमेट्रिक व यूनीक पहचान के आधार पर समुचित लाभ दिया जा सके.’ 

तीसरा, इससे सीधे-सीधे 6 करोड़ लोग राशन का सामान लेने से वंचित हो जाएंगे. देश में 23 करोड़ लोगों के पास राशन कार्ड हैं. उनमें से केवल 16.64 करोड़ लोग ही ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड हैं. आधार को अभी तक पूरी तरह सुचारू व्यवस्था में लागू होने में वक्त लगेगा और इसके जरिये जिस तरह की सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की बात कही जा रही है वह फिलहाल दिवा स्वप्न ही है.

विशेषज्ञ भी विरोध में

सरकार अरसे से आधार को ‘सशक्त’ बनाने पर विचार कर रही है लेकिन जानकार विशेषज्ञ इसका विरोध कर रहे हैं.

जानी-मानी अर्थशास्त्री रीतिका खेरा ने एक साल पहले लिखा था, ‘आधार बिल्कुल भी जरूरी नहीं है. इसे काम में लेना भी अपने आप में जटिल ही है. वे लिखती हैं आधार से सरकार को बचत करने में मदद मिलेगी, यह भी फिलहाल बहस का मुद्दा है. इससे अनावश्यक फाइलिंग का भार बढ़ता है और निजता संबंधी चिंताएं रहती हैं. साथ ही ना तो यह योजनाओं का लाभ उठाने के लिए जरूरी है और ना ही कैश ट्रांसफर के लिए.’

और तो और खेरा ने इस संदर्भ में एक आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा किए गए एक प्रयोग का उदाहरण भी दिया. आंध्र प्रदेश सरकार ने जब आधार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जोड़ा तो 20 फीसदी राशन कार्ड धारकों ने राशन का सामान ही नहीं लिया. इसके अलावा आधार कार्ड और फिंगर प्रिंट न मिलने के भी कई मामले सामने आए. खेरा ने बताया राजस्थान और गुजरात में भी यही प्रयोग किया गया.

गुजरात में राशन की दुकानों पर ‘पॉइंट ऑफ सेल’’ (पीओएस) मशीनें लगाई गईं, लेकिन इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी के चलते राशन का वितरण ही नहीं हो पाया. राजस्थान में तो एक तरह से आधार से जुड़ी पीओएस मशीनें पूरी तरह ‘बकवास’ साबित हुईं क्योंकि इन मशीनों से फिंगर प्रिंट पहचान में ही खासी दिक्कतें पेश आईं. 

कुछ और विशेषज्ञों ने झारखंड और दिल्ली में भी ऐसी ही परेशानियों का जिक्र आई. जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने भी आधार के विरोध में ही लिखा है. उनका कहना है कि आधार को राशन वितरण से जोड़ने के लिए एक साथ बहुत सारी तकनीक एक ही वक्त में काम लेनी होती है और पिछड़े राज्यों के ग्रामीण इलाकों में तो यह तकनीक सफल होना एक तरह से नामुमकिन ही है.

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष प्रताप भानू मेहता ने भी आधार पर बहुत अधिक भरोसा ना करने की सलाह दी है. मेहता ने बताया शुरूआत में वे भी आधार के पक्ष में थे. उनका मानना था, ‘आधार कार्ड ऐसा सुरक्षित पहचान पत्र बनेगा जो देश के पात्र नागरिकों को योजनाओं का लाभ दिलवाएगा.’ लेकिन अब उन्हें आधार के बारे में अपनी ही राय गलत लगने लगी है और आधार पर भरोसा ना करने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

मेहता का मानना है कि आधार के साथ एक समस्या यह है कि इसके बनाने में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं अपनाई गई. इस प्रक्रिया में समानता, सूचना और निजता को लेकर नाम मात्र की भी पारदर्शिता नहीं बरती गई. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ‘अगर सरकार आपकी पहचान का दुरूपयोग करना चाहे तो उस स्थिति में आप क्या करेंगे?’

राजनीतिक विरोध

यहां एक बात तसल्ली देने वाली है वह यह कि अब आधार को राशन वितरण से जोड़े जाने वाले सरकार के इस कदम का राजनीतिक विरोध हो रहा है. तृणमूल कांग्रेस और जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने इसका खुल कर विरोध किया है. अब देखना यह है कि क्या बाकी विपक्षी दल भू अधिग्रहण कानून की ही तरह इस मुद्दे पर भी एकजुट होते हैं कि नहीं.

First published: 13 February 2017, 8:06 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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