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मालेगांव धमाका: अपने ही दावों में फंसती जा रही है मुंबई एटीएस

अश्विन अघोर | Updated on: 19 January 2017, 3:55 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

मालेगांव ब्लास्ट केस में मुंबई एटीएस यानि एंटी टेरेरिस्ट स्क्वायड की जांच और उसके द्वारा आरोपियों और भगोड़ों के बारे में किए गए दावों पर विवाद नहीं थम रहे. बार-बार ऐसे गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं जिससे जांच एजेंसी की साख पर दिन पर दिन संकट के बादल गहराते जा रहे हैं. 

यह हाई प्रोफाइल जांच एजेंसी उस समय सुर्खियों में आई थी जब स्वर्गीय हेमंत करकरे के नेतृत्व में इस एजेंसी ने बम ब्लास्ट की योजना बनाने तथा उसे अंजाम देने के आरोप में साध्वी प्रज्ञा सिंह तथा सेना के कार्यरत एक अधिकारी कर्नल प्रसाद पुरोहित को गिरफ्तार किया था. यह पहला मौका था जब देश में किसी सेवारत सेना के अधिकारी को आतंकवाद के मामले में और वह भी इतने जघन्य अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया था. 

एटीएस को पहला झटका

करकरे और उनकी टीम को एक साध्वी और सैनिक अधिकारी को गिरफ्तार करने के लिए दक्षिणपंथी संगठनों तथा राजनीतिक दलों जैसे शिवसेना की भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा था. लेकिन कांग्रेस—एनसीपी की गठबंधन वाली सरकार करकरे और उनकी टीम के समर्थन में मजबूती से खड़ी रही और उनको बिना किसी दबाव के इस केस की जांच करने और उसको तार्किक परिणति तक ले जाने की पूरी छूट दी. 

इस जांच को तब एक झटका लगा जब 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले में करकरे शहीद हो गए. इस धक्के के बावजूद एजेंसी इस जांच को आगे बढ़ाती रही, जिसको बाद में 2013 में नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी एनआईए को सौंप दिया गया. साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी को अतिवादी हिंदू संगठन अभिनव भारत की आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के पुख्ता सबूत के रूप में पेश किया गया था. एनआईए भी इसी लाइन पर जांच करती रही.

एटीएस की जांच पर सवाल

इस पूरी जांच में नाटकीय मोड़ तब आया जब एटीएस के सदस्य के रूप में मालेगांव बम विस्फोट की जांच से जुड़े एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने यह दावा किया कि दो ऐसे आरोपियों, जिनको कि पुलिस भगोड़ा बताती है, दरअसल उनको एटीएस के अधिकारियों ने ही 8 वर्ष पूर्व मार दिया था. 

पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने शोलापुर कोर्ट में इस आशय का एक शपथपत्र दायर किया था. इसी कोर्ट में मेहबूब पर आय से अधिक संपत्ति रखने तथा शस्त्र अधिनियम के अंतर्गत केस भी चल रहा है. इस शपथ पत्र में मुजावर ने दावा किया कि बम ब्लास्ट के आरोपियों के रूप में एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए रामजी कालसांगरा तथा संदीप डांगे को हिरासत के दौरान मार दिया गया था. 

यह शपथपत्र एटीएस की पूरी जांच और उसके दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. यह शपथ पत्र एनआईए के लिए भी एक बड़े झटके से कम नहीं था. इसके बाद एनआईए ने मंगलवार को मुजावर से पूरे आठ घंटे तक पूछताछ की. सूत्रों का कहना है कि जांच में मुजावर ने बताया कि एटीएस ने एक और आरोपी को भी हिरासत में मार दिया था. मुजावर ने आरोपी का नाम तो नहीं बताया लेकिन मुजावर ने उन एटीएस अधिकारियों के नाम जरूर एनआईए को सौंप दिए हैं.

दो नहीं तीन की हत्या हुई

मुजावर को मालेगांव विस्फोट की जांच के लिए तत्कालीन डीजीपी, महाराष्ट्र एसएस विर्क ने नियुक्त किया था. एटीएस से जुड़े और मालेगांव बम विस्फोट जांच दल के सदस्य दो पुलिस अधिकारी एसीपी राजन घुले तथा पीआई रमेश मोरे पर इंदौर से एक दिलीप पाटीदार नाम के व्यक्ति को इंदौर, मध्यप्रदेश से अपहरण करने का आरोप है. घुले और मोरे के नेतृत्व में ही एटीएस की टीम ने पाटीदार को इंदौर से गिरफ्तार कर मालेगांव ब्लास्ट प्रकरण में गवाह बनाया था. पाटीदार से एटीएस ने मुंबई में पूछताछ की थी, लेकिन इस पूछताछ के बाद ही पाटीदार लापता बताए जा रहे थे. 

पुलिस का दावा है कि उन्हें पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था जबकि पाटीदार कभी घर नहीं पहुंचे और न ही उन्हें उसके बाद देखा गया. जांचकर्ताओं का संदेह है कि जिस तीसरे व्यक्ति के पुलिस हिरासत में मारे जाने की बात हो रही है वह पाटीदार हो सकते हैं. कालसांगरा, डांगे और पाटीदार के बीच कुछ समानताएं भी हैं. तीनों ही इंदौर के रहने वाले हैं और तीनों को वहीं से गिरफ्तार किया गया था. 

कालसांगरा तो गिरफ्तार होने के पहले पाटीदार का ही किरायेदार था. एनआईए और एटीएस के रिकॉर्ड के अनुसार डांगे और कालसांगरा भागे हुए हैं और पाटीदार लापता. मालूम हो कि महाराष्ट्र के नासिक में मालेगांव क्षेत्र में 29 सितंबर 2008 को एक मोटरसाइकिल से बंधा हुआ बम फटने से 7 लोगों की मृत्यु हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हो गए थे.

मुजावर द्वारा शोलापुर कोर्ट में पिछले सप्ताह शपथपत्र दाखिल करने के बाद कलसांगरा, डांगे और पाटीदार के परिजनों ने दोषी पुलिसवालों को सजा ए मौत दिए जाने की मांग की है. मुजावर मार्च 2009 तक एटीएस की उस टीम का हिस्सा थे जो कि मालेगांव मामले की जांच कर रही थी. उनका मुख्य कार्य ब्लास्ट के संबंध में जरूरी सूचनाएं एकत्र करने का था. उन्हें सोलापुर में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति तथा आर्म्स एक्ट के मामले में केस दर्ज होने के बाद निलंबित कर दिया गया था.

First published: 19 January 2017, 3:55 IST
 
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