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साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मामले में एनआईए ने वही किया जिसका अंदेशा था

रजा नकवी | Updated on: 18 May 2016, 8:36 IST

एक तस्वीर ऐसी है जिसे हिंदुत्व ब्रिगेड और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता जनता की याद्दाश्त से मिटा देना चाहते होंगे. इस तस्वीर में एबीवीपी की पूर्व सदस्य साध्वी प्रज्ञा मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह और अन्य बीजेपी नेताओं के साथ दिखाई देती हैं. ये सभी लोग एक बीजेपी सांसद के निधन के मौके पर उनके परिवार को सांत्वना देने पहुंचे थे.

दिवंगत पुलिस अफसर हेमंत करकरे के नेतृत्व में एंटी टेररिस्ट स्वायड (एटीएस) ने 23 अक्टूबर 2008 को साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार किया था. उनपर 2008 में मालेगांव में हुए बम धमाकों में शामिल होने का आरोप था.

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उसके बाद ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी. उससे पहले कई बीजेपी नेताओं ने प्रज्ञा से किसी तरह की मुलाकात से इनकार किया था.

आतंकवाद के मामलों की जांच के लिए बनाए गए केंद्रीय जांच दल एनआईए ने हाल ही में साध्वी प्रज्ञा समेत मामले के कुछ अभियुक्तों को मालेगांव मामले में 'क्लीन चिट' दी है.

मालेगांव धमाके मामले में सरकारी वकील रही रोहिणी सैलियन ने बताया था कि एनआईए ने उसने सुस्ती बरतने के लिए कहा था

ऐसे में क्या बीजेपी नेताओं से साध्वी प्रज्ञा की नजदीकी दिखाती ये तस्वीरें फिर से मीडिया में प्रमुखता से दिखाई देंगी? याद रहे कि उस समय बीजेपी नेताओं ने प्रज्ञा की गिरफ्तारी को 'राजद्रोह' बताया था.

मालेगांव धमाका पिछले एक दशक के आतंकवाद के सबसे चर्चित मामलों में एक है. अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकी हमले के बाद एक समुदाय विशेष को आतंकवाद से जोड़ा जा रहा था. मालेगांव मामले में हुई गिरफ्तारियों को बाद इस प्रोपगैंडा को गहरा धक्का लगा था.

मालेगांव मामले में एनआईए के यू-टर्न के बरक्स हमें ये भी याद रखना चाहिए कि प्रज्ञा आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या मामले में भी मुख्य अभियुक्त है. माना जाता है कि खुद जोशी अजमेर शरीफ दरगाह और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए बम धमाकों से जुड़े हुए थे.

आतंकी नेटवर्क


हिंदुत्ववादियों से जुड़े आतंकी मामलों पर नजर रखने वालों को एनआईए के रवैये पर ज्यादा हैरानी नहीं हुई. एनआईए ने हेमंत करकरे पर भी सवाल उठाए हैं. वो भी तब जब वो अपनी सफाई देने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं.

करकरे ने ही हिंदुत्ववादी आतंकियों के भारत और उसके बाहर फैले नेटवर्क को उजागर किया था. इस नेटवर्क में आरएसएस पदाधिकारी, सैन्य अधिकारी, डॉक्टर, कुछ भगवाधारी साधु इत्यादि शामिल थे. इनमें से एक भोंसले मिलिट्री स्कूल का अधिकारी भी था. ये स्कूल प्रमुख हिंदुत्ववादी नेता बीएस मुंजे ने शुरू किया था.

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करकरे 26 सितंबर 2008 को मुबंई में हुए आतंकी हमले के दौरान अपने साथियों को बचाते हुए शहीद हो गए थे.

पिछले साल इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि हिंदुत्ववादी आतंकियों से जुड़े मामले की राह बदल रही है. पहला स्पष्ट संकेत दिया मालेगांव धमाके मामले में सरकारी वकील रोहिणी सैलियन ने. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि एनआईए ने उनसे मामले में सुस्ती बरतने के लिए कहा है. सेलियन को बाद में इस मामले से हटा दिया गया.

उसके बाद 2007 के अजमेर बम धमाके समेत हिंदुत्ववादी आतंकवाद से जुड़े मामले में कई गवाह अपने बयान से मुकरने लगे. एनआईए ने सुनील जोशी मामले को वापस मध्य प्रदेश ले जाने का फैसला किया. इसके बाद खबर आई कि मोदासा बम धमाका में 'पर्याप्त सुबूत' न होने के कारण एनआईए ने मामले को बंद करने की अनुशंसा की है.

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ही इस बात की आशंका जताई जाने लगी थी कि हिंदुत्वावादी आतंकवाद से जुड़े मामलों में नरमी बरती जाएगी. मोदासा मामला इसका पहला ठोस संकेत था.

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सरकार की मंशा का पता इससे भी चलता है कि एक वरिष्ठ मंत्री ने अपने बयान में कहा 'देश में हिंदू आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं है.' जबकि उस समय तक हिंदुत्ववादी आतंकवाद से जुड़े कम से कम 16 मामले विभिन्न भारतीय अदालतों में विचाराधीन थे.

बहुत से लोगों को नहीं पता है कि मालेगांव और मोदासा धमाके एक ही दिन और बिल्कुल एक ही तरीके से मुस्लिम-बहुल इलाकों में अंजाम दिए गए थे. फर्क बस इतना था कि मालेगांव महाराष्ट्र में है जहां तब कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार थी और मोदासा गुजरात में है जहां तब भी बीजेपी की सरकार थी. मालेगांव धमाके में सात लोग मारे गए थे और 80 से ज्यादा घायल हुए थे. मोदासा धमाके में एक किशोर मौत हो गई थी और 10 से अधिक लोग घायल हुए थे.

मालेगांव धमाके की जांच के दौरान एक व्यापक हिंदुत्ववादी आतंकी नेटवर्क से पर्दाफाश हुआ जबकि मोदासा की जांच अधर में लटकी रही. गुजरात पुलिस ने मालेगांव मामले में एटीएस को मिली सफलता के बाद भी उससे किसी तरह की मदद नहीं ली.

अजमर धमाके और समझौता एक्सप्रेस धमाके के कई गवाह अदालत में मुकर गए

कारवां पत्रिका की पूर्व एडिटोरियल मैनेजर लीना गीता रघुनाथ ने हिंदुत्ववादी आतंकवाद पर जुड़ी एक विस्तृत रिपोर्ट की थी. उन्होंने दिखाया था कि किस तरह से हिंदुत्ववादी आतंकी नेटवर्क से जुड़े मामलों की जांच विफल होती जा रही है.

अजमेर धमाके से जुड़े कई गवाह अपने बयानों से मुकर गए. इन गवाहों में आरएसएस कार्यकर्ताओं समेत झारखंड की बीजेपी सरकार के मंत्री भी शामिल थे. इसी तरह समझौता एक्सप्रेस ट्रेन धमाके मामले में भी गवाह मुकरने लगे हैं. समझौता धमाके में 68 लोग मारे गए थे.

एनआईए ने साध्वी को 'क्लीन चिट' देते हुए कहा कि मालेगांव धमाके में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा की थी लेकिन वो उसका इस्तेमाल नहीं करती थीं. ऐसे में सवाल ये है कि क्या अलग अलग मामलों में कानून बदल जाता है?

एनआईए: समझौता ब्लास्ट में कर्नल पुरोहित के खिलाफ सबूत नहीं

1993 में हुए मुंबई बम धमाकों में अभियुक्त रुबिना मेमन को इस लिए दोषी पाया गया क्योंकि धमाके में इस्तेमाल गाड़ी उनके नाम पर पंजीकृत थी.

फिल्मकार राकेश शर्मा ने हाल ही अपने एक फेसबुक पोस्ट में सवाल उठाया, "रुबिना को उम्र कैद की सजा हुई है. अगर बम धमाके में इस्तेमाल की गई गाड़ी का मालिक होना सजा के लिए काफी है तो साध्वी और रुबीना दोनों कानून की नजर में एक समान होने चाहिए, कानूनी समानता सभी भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है."

मालेगांव मामले में रोहिणी सैलियन का बयान सबसे मानीखेज है. एनआईए के फैसले पर जब इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने रोहिणी ने उनकी राय पूछी तो उन्होंने कहा, "एनआईए ने जो चार्जशीट दायर की है वो उनका विचार है, अदालत का फैसला नहीं. फैसला अदालत देगी जो सुबूतों के आधार पर निर्णय लेगी. अदालत को एटीएस और एनआईए दोनों द्वारा दायर चार्जशीट को सामने रखकर फैसला करना चाहिए."

(ये लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान की इनसे सहमति जरूरी नहीं है)

First published: 18 May 2016, 8:36 IST
 
रजा नकवी @Mir_Naqvi

Raza is an alumnus of the Indian Institute of Mass Communication (IIMC) and has worked with the Hindustan Times in the past. A passionate follower of crime stories, he is currently working as a Sub-Editor at the Speed News desk.

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