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मालेगांव धमाका: एनआईए की उलटबांसी उसकी साख पर बट्टा है

सुहास मुंशी | Updated on: 15 April 2016, 22:39 IST

वर्ष 2006 में मालेगांव में हुए बम धमाकों के मामले में नौ मुस्लिमों को क्लीन चिट देने के दो साल बाद एनआईए ने उनकी रिहाई का विरोध किया है.

इस मामले में देश की प्रतिष्ठित जांच एजेंसी एनआईए का व्यवहार शुरू से ही असंगत रहा है. अब एनआईए ने जो अपने पूर्व के कदम के विपरीत कदम उठाया है, उससे एक तूफान उठना तय माना जा रहा है.

एनआईए उन नौ मुसलमानों की रिहाई का विरोध कर उनके खिलाफ फिर से मुकदमा चलाने की बात कह रही है जिन्हें पहले गिरफ्तार किया गया था. लेकिन उनके खिलाफ कोई नए  पुख्ता सबूत तक दाखिल नहीं किए हैं.

नौ मुस्लिमों को क्लीन चिट देने के दो साल बाद एनआईए ने उनकी रिहाई का विरोध किया है

इसी मामले में पूर्व विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियान ने यह आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया था कि एनआईए इस मामले में उन हिन्दू कट्टरपंथियों के प्रति नरमी बरतने का दबाव बना रही है, जिन पर वास्तव में मालेगांव बम धमाकों का आरोप है.

सालियान यह आरोप भी लगा चुकी हैं कि इस्तीफा देने से कुछ साल पहले उन्होंने इस मामले में आरोपी बनाए गए मुस्लिमों को रिहा करने की अनुमति एनआईए से मांगी थी, लेकिन प्रभारी अफसर "इधर-उधर” टहलते रहे.

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12 अप्रैल को नए विशेष लोक अभियोजक प्रकाश शेट्टी ने मामले की सुनवाई कर रही अदालत को बताया कि दोनों आरोपी पक्षों (हिन्दू और मुस्लिमों) के खिलाफ सबूतों के अलग-अलग मूल्यांकन का यह "सही मंच” नहीं है. उन्होंने कहा, “इसलिए अदालत से मेरा विनम्र आग्रह है कि उनको (मुस्लिम आरोपियों को) रिहा नहीं किया जाना चाहिए.”

खून के निशान

2006 में मालेगांव में एक मस्जिद के पास हुए श्रंखलाबद्ध बम धमाकों में कम से कम 31 लोग मारे गए थे और 300 से अधिक घायल हो गए थे. महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते यानी एटीएस ने नौ आरोपियों (सभी मुस्लिम) को गिरफ्तार किया और 2006 के अंत में उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी. बाद में जब यह मामला जांच के लिए सीबीआई को सौंप दिया गया तो उसने 2010 में इन्हीं आरोपियों के खिलाफ एक और चार्जशीट दाखिल की.

एनआईए अब एक ही केस में आरोपियों के दो अलग-अलग गुटों पर मुकदमा चलाने के लिए बहस करेगी

2011 में मामले की जांच एनआईए ने अपने हाथ में ले ली. जब स्वामी असीमानंद ने स्वीकार कर लिया कि बम धमाकों की करतूत हिन्दू कट्टरपंथियों की थी तो जांच एजेंसी ने कुछ और लोगों को आरोपी बनाया जिनमें सेना के सेवारत अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी शामिल थीं. हाल तक, एनआईए को पक्का विश्वास था कि आरोपियों के इसी गुट ने बम धमाके किए थे.

एनआईए ने न सिर्फ एटीएस और सीबीआई द्वारा जांच में जुटाए गए तथ्यों को खारिज कर दिया, बल्कि इसने आधिकारिक तौर पर बयान दिया कि एटीएस द्वारा मुस्लिम आरोपियों के खिलाफ खड़े किए गए गवाहों पर "दबाव” बनाया गया था.

इसके बाद मुस्लिम आरोपियों ने रिहाई के लिए याचिका लगाई, लेकिन मंगलवार को एनआईए ने अदालत में अपने रुख से पलट गई.

निष्पक्ष जांच?

एनआईए के रुख में आए ताजा बदलाव का मतलब है कि एनआईए अब एक ही केस में आरोपियों के दो अलग-अलग गुटों पर मुकदमा चलाने के लिए बहस करेगी. यह सिर्फ सुनने में ही अतार्किक नहीं लगता बल्कि हो सकता है यह कानूनन भी सही न हो.

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इस मामले में एक आरोपी का प्रतिनिधित्व कर रहे सरीम नावेद कहते हैं, “आप अदालत को यह नहीं कह सकते कि आपको लगता है कि एक ही अपराध को दो अलग-अलग गुटों के लोगों ने अंजाम दिया है.”

नावेद ने कहा कि यदि एनआईए को आरोपियों के एक और गुट यानी मुस्लिमाें पर भी मुकदमा चलाना है तो उसे न सिर्फ नए सबूत पेश करने होंगे, बल्कि उसे अब तक की अपनी जांच की दिशा को भी कचरे में डालना होगा.

एटीएस द्वारा मुस्लिम आरोपियों के खिलाफ खड़े किए गए गवाहों पर "दबाव” बनाया गया था: एनआईए

नावेद कहते हैं, “एनआईए को यह विस्तार से बताना पड़ेगा कि उसके अधिकारी अब तक गलत दिशा में जांच क्यों कर रहे थे? यह सिर्फ अक्षमता का मामला नहीं हो सकता. उन्होंने अदालत के सामने ऐसे बयान रखे हैं जो मजिस्ट्रेट के सामने लिए गए थे. तो क्या असीमानंद और उसके साथियों ने इस वारदात को अंजाम दिया था, यह बात साबित करने के लिए एनआईए ने अब तक जितने भी साक्ष्य पेश किए हैं, वे सब बनावटी थे? क्या मजिस्ट्रेटों ने भी झूठ बोला था? ”

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि मालेगांव धमाकों के मामले में एनआईए ने खुद का ही खंडन किया है. फरवरी में एनआईए ने अदालत को बताया था कि वह लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सहित 11 आरोपियों पर मकोका के तहत लगाए गए आरोपों को वापस लेना चाहती है. जबकि उसने खुद ही सभी आरोपियों को मकोका के तहत पांच साल पहले पकड़ा था.

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एनआईए ने अब इस मामले में अटॉर्नी जनरल की राय मांगी है. एजेंसी के इस असामान्य कदम को चार्जशीट दाखिल करने में देरी करने की एक रणनीति भर माना जा रहा है.

एनआईए की ये उलटबांसी अब मामले के इस मूलभूत पहलू से जुड़ गए हैं कि वास्तव में यह मालेगांव में 31लोगों की हत्या के लिए किसे दोषी मानती है? साथ ही इससे एनआईए की स्वतंत्रता पर भी गंभीर संदेह पैदा हो गया है.

First published: 15 April 2016, 22:39 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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