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'जेहादी दीदी'

गर्ग चटर्जी | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • ममता बनर्जी की राजनीति को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह मुस्लिमों को अपने पाले में करने के लिए ऐसे काम कर रहीं हैं जिनका आने वाले समय में घातक परिणाम होगा.
  • बनर्जी की नीतियों से बेशक मुसलमानों को तात्कालिक फायदा हो सकता है लेकिन उनकी रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी.

एक अरसे से मुस्लिम हितों की राजनीति करने के कारण दक्षिणपंथी तबका मुलायम सिंह यादव को 'मौलाना मुलायम' कहता आ रहा है. अब पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी मुस्लिम आबादी के प्रति अतिशय झुकाव के चलते मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी इसी तरह का मिलते जुलते नाम से पुकारा जाने लगा है.

बीजेपी के लोग ममता बनर्जी को 'जेहादी दीदी' के नाम से संबोधित कर रहे है. दूसरी तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने भी उन पर बंगाल में सांप्रदायिकता की राजनीति को बढ़ाने का आरोप लगाया है.

जमीयत उलमा-ए-हिंद के हालिया अधिवेशन में उन्होंने हिजाब पहनकर और सिर ढंक कर हिस्सा लिया. इसके अलावा उन्होंंने पहले से ही कई प्रतिष्ठित मुस्लिम धर्मगुरुओं से फुरफुरा शरीफ दरगाह में मुलाकात करने की घोषणा कर रखी है. उनके इन कदमों से यह बात साफ हो गई है कि अगले साल प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में रहेंगे. 

कांग्रेस अभी भी पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में जबदस्त पकड़ रखती है लेकिन तृणमूल 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम मतों में जबरदस्त सेंध लगाने में सफल रही थी. मुस्लिम मतदाताओं की वजह से ही ममता 2011 में वामपंथियों के अभेद्य दुर्ग को ढहाने में सफल रही थीं.  

असम की कांग्रेस सरकार को अपवाद मानकर छोड़ दिया जाय तो दूसरी किसी भी सत्ताधारी पार्टी के पास इतना बड़ा मुस्लिम वोटर बेस नहीं हैं.

यह बंगाल की डेमोग्राफिक वास्तविकता को दिखाता है और साथ ही वोटों की जोड़तोड़ के लिए सेक्युलरिज्म के पारंपरिक विचार के साथ तृणमूल कांग्रेस द्वारा की जा रही छेड़छाड़ को भी दिखाता है. किसी 15 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में जो कामकाज तुष्टिकरण लग सकता है उसे 30 फीसदी मुसलिम आबादी वाले राज्य में तुष्टिकरण नहीं कह सकते. वह भी तब जब सच्चर समिति की रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की अति दयनीय स्थिति को बयान करती है.

बस दिखावा

ममता बनर्जी ने बेहद चालाकी से अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पैठ बनाई है. लेकिन पश्चिम बंगाल की खराब वित्तीय हालत के चलते वो उनके लिए दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं कर सकी हैं.

काजी नजरूल इस्लाम के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. नजरूल उन गिने चुने बंगाली मुस्लिमों में से एक हैं जिनका पूरे बंगाल में जाति-धर्म से ऊपर उठकर सम्मान किया जाता है. उन्होंने काली की प्रशंसा में गीत लिखे हैं साथ ही इस्लामी परंपरा के संगीत भी लिखे हैं.

पश्चिम बंगाल माइनॉरिटीज डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन की तरफ से नेताजी इनडोर स्टेडियम में आयोजित एक मुस्लिम रैली में ममता बनर्जी ने इस बात का बार-बार जिक्र किया कि किस तरह उनकी सरकार ने नजरूल रिसर्च सेंटर की योजना बनाई थी. 

ममता एक बेहद खतरनाक खेल खेल रही हैं. वो जिस नजरूल इस्लाम को उनकी मुस्लिम पहचान के जरिए भुनाना चाहती हैं वह विचार बंगाल में दम तोड़ चुका है. बंगाल के मुसलमान उन्हें उस रूप में देखते ही नहीं हैं. इसके अलावा उन्होंने ऐतिहासिक आलिया मदरसा को यूनिवर्सिटी बनाने की घोषणा भी की, विचित्र नाम के साथ - आलिया मदरसा युनिवर्सिटी. हज यात्रियों के लिए नया हाजी हाउस बनाना ऐसा ही दिखावा है.

ममता की पार्टी के लोग तुष्टिकरण के आरोपों से घबराए हुए हैं विशेषकर जब से बंगाल सरकार ने मस्जिदों के हजारों इमाम और मुइज्जिनों के लिए नगद भत्ते का एलान किया है.

माकपा और भाजपा की चुनौतियों से निपटने के लिए ममता बनर्जी बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर खतरनाक खेल कर रही हैं

दुर्भाग्यवश ममता के आस पास ऐसे मुस्लिम नेताओं की भरमार है जो उनसे दिखावे की मुस्लिम हितैषी राजनीति जारी रखवाना चाहते हैं. बंगाल में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है. यहां साल भर मजदूरों का पलायन होता है. बंगाल जैसे राज्य में जहां रोजगार एक्सचेंज की स्कीम से नौकरियां नहीं मिल पा रही है वहां पर ममता सरकार ने 'अल्पसंख्यकों के लिए रोजगार एक्सचेंज' नाम से नई योजना शुरू कर दी है.

सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत लड़कियों को बांटी जाने वाली साइकिल योजना में भी धार्मिक आधार पर भेदभाव की शिकायतें मिल रही हैं. ममता ने हाल ही में आठवीं से बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए हर साल 40 लाख साइकिल वितरित करने की योजना बनाई है.

ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए उर्दू को मुसलमानों की विरासत से जोड़कर दिखाने की कोशिश कर रही हैं

इन सभी योजनाओं की वजह से 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के वोट बैंक में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. यह देखते हुए कि उनसे अलग हो चुके मुकुल रॉय और सीपीएम भी मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, ममता एक बार फिर से वहीं काम कर रही हैं.

उर्दू भाषी को मुस्लिम समझने की भूल

इसके अलावा ममता की मुस्लिम नीति उसी पुरानी परंपरा पर आधारित है जिसमें मुस्लिम पहचान को उर्दू यानी गैर बंगाली से जोड़कर देखा जाता है. 2011 में पार्टी के विजन डॉक्यूमेंट के पेज 42 को ध्यान से पढ़ने पर यह बात साफ हो जाती है. 

एक्शन एजेंडा में पार्टी ने सरकार बनने के 200 दिनों के भीतर 'नए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और स्कूलों को बनाने का वादा किया था ताकि लोगों की आकांक्षाओं को पूरा किया जा सके.' इन 10 मुद्दों में से छह का जिक्र नीचे किया गया है:

  • मुस्लिम विश्वद्यिालय और कॉलेज
  • मदरसों और उर्दू स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी
  • सच्चर समिति और रंगनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करना जहां 10 फीसदी उर्दू भाषी मुसलमानों की आबादी है
  • मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक हालत में सुधार के लिए राज्य के बजट का एक हिस्सा अलग रखना
  • बिना किसी बाधा के उर्दू शैक्षणिक संस्थाओं को आधिकारिक मान्यता देना ताकि उन्हें संवैधानिक अधिकारों का लाभ दिया जा सके
  • मदरसों में तकनीकी शिक्षा देने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किए जाएंगे

इस साल की शुरुआत में सरकार ने उर्दू कवि मोहम्मद इकबाल के पोते का जोरदार स्वागत किया था. सरकारी फंड का इस्तेमाल करते हुए किसी भी जिंदा बंगाली मुस्लिम लेखक का इस तरह जोरदार स्वागत नहीं किया गया. इससे यह पता चलता है कि पार्टी का थिंक टैंक पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की आकांक्षाओं को लेकर किस तरह का विचार रखता है.

पश्चिम बंगाल में 10 में से 9 मुस्लिम मूल रूप से बंगाली हैं जिनकी जुबान बांग्ला है. ममता की कैबिनेट में भी गैर बंगाली मुसलमानों को ज्यादा जगह मिली है

ममता की राजनीति से जो तस्वीर उभर रही है वह बेहद चिंताजनक है. साफ तौर पर पार्टी मुस्लिम और उर्दू को जोड़कर देख रही है. एक तरह से मदरसों और उर्दू को आपस में सान दिया गया है.

यहां इस बात को समझना जरूरी है कि पश्चिम बंगाल के अधिकांश मुसलमानों का उर्दू से कोई जुड़ाव नहीं है. पश्चिम बंगाल में 10 में से 9 मुस्लिम मूल रूप से बंगाली है, उनकी जुबान बांग्ला है. इसके उलट ममता की कैबिनेट और सासदों में गैर बंगाली मुसलमानों का प्रभुत्व है.

ममता की मुस्लिम नीति बीजेपी के खिलाफ मुसलमानों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करके उसका फायदा उठाने की है. लेकिन अंत में इसका खामियाजा मुसलमानों को ही उठाना होगा. कुछेक स्वार्थी मुस्लिम नेताओं को भले ही इससे तात्कालिक फायदा हो जाय लेकिन आने वाले समय में मुसलमानों की मूल समस्याओं का कोई समाधानन नहीं निकलेगा. खाद्य असुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी और अशिक्षा ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान किए बिना ममता कितने भी मदरसे और स्वागत समारोह कर लें, मुसलमानों की दशा नहीं सुधरेगी.

First published: 5 December 2015, 8:24 IST
 
गर्ग चटर्जी @GargaC

दक्षिण एशिया की राजनीति और संस्कृति पर लिखते हैं. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के कई अखबारों में लेख प्रकाशित होते हैं. हार्वर्ड से पीएचडी करने के बाद एमआईटी से पोस्ट-डॉक्टोरल फ़ेलोशिप की. फ़िलहाल कोलकाता में रहते हैं.

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