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मालदा, ममता और मुस्लिम

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • कट्टरपंथी मुस्लिमों की तरफ से की गई यह पहली हिंसक घटना नहीं है. हाल ही में तलपुकुर आरा हाई मदरसा के काजी मासूम अख्तर के साथ कुछ मौलानाओं और उनके समर्थकों ने मारपीट की क्योंकि उन्हें छात्रों को गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय गान गाने के लिए कहा था. 
  • ममता को नंदीग्राम आंदोलन के दौरान मुस्लिम मतदाताओं की ताकत का एहसास हो चुका है. पुलिस की गोलीबारी और माकपा के घेरेबंदी के बाद इलाके के मुसलमान तेजी से ममता के पक्ष में जा खड़े हुए.

बीते रविवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मुस्लिम बहुल इलाके सुजापुर में भय और आशंका का माहौल गर्म रहा. इदारा-ए-शरिया के बैनर तले करीब 2.5 लाख मुसलमानों ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणी के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग 34 को जाम कर दिया.

भीड़ ने उत्तरी बंगाल राज्य परिवहन निगम की बसों को आग लगा दिया. इसके अलावा उन्होंने सीमा सुरक्षा बल की एक जीप समेत पुलिस के दर्जनों वाहनों को फूंक दिया. एक पुलिस थाना और प्रखंड विकास पदाधिकारी के कार्यालय में भी जमकर तोड़फोड़ की गई. 

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक भीड़ के साथ हुई झड़प में पुलिस अधिकारी घायल हुए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता को गोली मार दी गई. अचानक हुई इस हिंसक वारदात ने लोगों को हक्का-बक्का कर दिया. 

कोलकाता के एक राजनीतिक विश्लेषक ने बताया, '2013 में मुजफ्फनगर दंगों के बाद कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ. हालांकि यह विरोध प्रदर्शन करीब एक महीने पुराने बयान पर हुआ है और वह भी जहां बयान दिया गया उससे सैंकड़ों किलोमीटर दूर. साफ संकेत है कि इसके पीछे राजनीतिक मंशा काम कर रही है.' 

कट्टरपंथी मुस्लिमों की तरफ से की गई यह पहली हिंसक घटना नहीं है. हाल ही में तलपुुकुर आरा हाई मदरसा के काजी मासूम अख्तर के साथ कुछ मौलानाओं और उनके समर्थकों ने मारपीट की क्योंकि उन्हें छात्रों को गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय गान गाने के लिए कहा था. 

ममता बनर्जी के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा के मामले में बढ़ोतरी हुई है. कैनिंग और देगांगा दंगे के साथ 2013 में 106 सांप्रदायिक दंगे हुए. जबकि पिछले पांच सालों में करीब 40 सांप्रदायिक दंगे हुए.

2007 में नंदीग्राम आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी को मुस्लिम मतदाताओं के सहयोग की ताकत का एहसास हो चुका है

कई लोगों को लगता है कि ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों को अपनाए जाने के बाद राज्य में मुस्लिम कट्टरपंथ में बढ़ोतरी हुई है. क्या कोई तुष्टीकरण हुआ है? अगर हां तो क्या खतरा है? उनकी राजनीतिक मजबूरियां क्या है? मां माटी और मानुष का उनका नारा क्या नजरअंदाज किया जा चुका है?

सरकार के एक करीबी सूत्र ने बताया, 'जब वह सत्ता में आईं थी तब पूरा राज्य उनके साथ था. लेकिन अब उनकी सरकार उम्मीदों को पूरा करने में असफल हो रही है. चुनाव करीब आते ही वह 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर भरोसा करने लगी हैं. बंगाल की 120-125 सीटों पर मुस्लिम निर्णायक मतदाता होते हैं. इसके अलावा वह कुछ मुस्लिम नेताओं और मौलवियों की ताकत पर भरोसा दिखा रही हैं. उन्होंने भस्मासुर पैदा कर दिया है.'

ममता की मुस्लिम तक पहुंच

ममता को नंदीग्राम आंदोलन के दौरान मुस्लिम मतदाताओं की ताकत का एहसास हो चुका है. पुलिस की गोलीबारी और माकपा के घेरेबंदी के बाद इलाके के मुसलमान तेजी से ममता के पक्ष में गोलबंद हुए थे.

ममता ने 2009 में रिजवानुर रहमान की संदिग्ध मौत के बाद अपने रुख में बदलाव किया. ऐसा आरोप था कि रिजवानुर ने राज्य के पुलिस अधिकारियों की तरफ से प्रताड़ित किए जाने के बाद खुदकुशी कर ली. जिन अधिकारियों पर आरोप लगा वह वाम मोर्चे की सरकार के करीबी थे.

ममता ने इस मौके का फायदा उठाया और वाम मोर्चे की सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने रिजवानुर के न्याय के लिए आवाज उठाई और फिर वह मुस्लिम समुदाय की नायिका बन गईं. 2011 के विधानसभा चुनाव के दौरान ममता ने फिरोजा बीबी (नंदीग्राम में मारे गए एक व्यक्ति की मां) और रिजवानुर के भाई को पार्टी का उम्मीदवार बनाया. दोनों उम्मीदवार जीतने में सफल रहे.

दोनों मामले में ममता ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हो रहे अन्याय के बारे में आवाज उठाई. लेकिन उसी वक्त मुस्लिमों के अधिकार की वकालत करते वक्त वह उनकी तुष्टिकरण में जुट गईं.

अप्रैल 2012 में उन्होंने हर इमाम को हर महीने 2,500 रुपये का भत्ता दिए जाने की घोषणा की. बाद में उन्होंने मुइज्जिनों को भी हर महीने 1,500 रुपये का भत्ता दिए जाने का एलान किया. मुइज्जिन मस्जिद में नमाज पढ़ाते हैं.

2013 में कोलकाता हाई कोर्ट ने हालांकि अनुच्छेद 14 और 15/1 का हवाला देते हुए इस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता. हालांकि बाद में सरकार ने इस पैसे को वक्फ बोर्ड के जरिये दिए जाने का फैसला किया.

बनर्जी सरकार 10 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले जिलों में उर्दू को आधिकारिक भाषा का दर्जा दे चुकी है

इसके बाद सरकार ने बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की लिखी गई ड्रामा के प्रसारण को बंद कर दिया. सलमान रुश्दी के कोलकाता आने के फैसले का मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध किए जाने के बाद सरकार ने यह फैसला किया. सबसे अधिक चौंकानी वाली बात यह रही कि ममता बनर्जी सरकार ने उन जिलों में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषाा बनाने का फैसला लिया जहां मुस्लिमों की आबादी 10 फीसदी से अधिक है.

कोलकाता विश्विद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर रह चुके सत्यब्रत चक्रवर्ती बताते हैं, 'यह आम आरोप है कि तुष्टिकरण से भारत में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है. हालांकि ममता जो कर रही हैं वह सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता पर हमला है. बंगाल धीरे-धीरे धार्मिक राज्य बनता जा रहा है.' चक्रवर्ती का इशारा दुर्गा पूजा समितियों और इमामों को सरकारी खजाने से पैसे दिए जाने की तरफ है.

हालांकि कई मशहूर मुस्लिम नेता मसलन तोशा सिद्दीकी, सिदीकुल्लाह चौधरी और आईपीएस अधिकारी नजरुल इस्लाम और वाम नेता अब्दुर्रज्जाक मुल्ला ने वादों को पूरा किए जाने में विफल रहने को लेकर ममता बनर्जी सरकार की आलोचना की है.

कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाकों मेटियाबुर्ज, राजा बाजार और पार्क सर्कस में अवैध निर्माण में तेजी आई है

ममता की नीतियों को राजीव गांधी पैकेज का नाम दिया गया है. गांधी ममता के राजनीतिक गुरु थे और ऐसा माना जाता है कि उन्होंने हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथियों को साधने के लिए तुष्टीकरण की नीति अपनाई.

मुस्लिम नेताओं को क्या मिला

जवाब है, कोलकाता में शानदार कारोबार. ऐसे आरोप हैं कि कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाकों मसलन मेटियाबुर्ज, राजा बाजार, खिदेरपोर और पार्क सर्कस में अवैध निर्माण में तेजी आई है. इसके अलावा राजनीतिक संरक्षण में रियल एस्टेट की कंपनियां जमीन पर कब्जा कर रही हैं. 

कई बार तो सरकारी जमीन पर भी कब्जा किया जा रहा है. अधिकारी और पुलिस भी इस मामले में आंखें मूंदे रहते हैं. सीपीएम का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अहमद हसन इमरान प्रतिबंधित संगठन जमीयत-ए-इस्लामी बांग्लादेश के फ्रंट हैं और वह प्रतिबंधित संगठन सिमी के नेता भी रह चुके हैं.

ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सारदा कंपनी से करोड़ों रुपये के कर्ज ले रखे हैं जिसका इस्तेमाल बांग्लादेश की शेख हसीना वाजेद सरकार को अस्थिर  करने में किया गया. चक्रवर्ती को लगता है कि ममता की राजनीति खतरनाक होने के साथ नजरिया रहित भी है.

चुनाव की तैयारी

मौजूदा स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ममता विधानसभा चुनाव जीतने जा रही हैं. तो फिर वह ताकत और धुव्रीकरण की मदद क्यों ले रही हैं?

चक्रवर्ती बताते हैं, 'ममता को उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा कोई और चुनौती नहीं दे सकता. वह सरकार के मोर्चे पर विफल रही हैं. उन्होंने कई वादों को पूरा नहीं किया है. इसके अलावा पार्टी में जबरदस्त गुटबाजी चल रही है. कह सकते हैं कि उनकी पार्टी में आपसी भरोसे की भी कमी है.'

ममता बनर्जी के शासन में सांप्रदायिक हिंसा में बढ़ोतरी हुई है. 2013 में राज्य में महज 106 हिंसा की घटनाएं हुई थी

चक्रवर्ती बताते हैं कि आने वाले दिनों में राज्य की अर्थव्यवस्था बिगड़ेगी और सामाजिक एवं राजनीतिक अराजकता का माहौल बनेगा. इसके अलावा गलियों में हिंसा के मामले बढ़ेंगे.

तो क्या इससे बीजेपी को मदद मिलेगी?

प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर जैद महमूद बताते हैं, 'पश्चिम बंगाल सीमाई राज्य है और बीजेपी की ऐसे सभी राज्यों में मौजूदगी है. अभी तक वह अपनी जगह इसलिए नहीं बना पाए हैं क्योंकि राज्य में वामपंथ मौजूद रहा है. हालांकि ममता बनर्जी के धुव्रीकरण की राजनीति से लंबे समय में निश्चित तौर पर बीजेपी को मदद मिलेगी.'

कैच ने इस मामले में तृणमूल के कई नेताओं से बात करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिल सका. हालांकि यह साफ है कि ममता बनर्जी फिलहाल आग से खेल रही हैं.

First published: 8 January 2016, 5:16 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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